6 महीने बाद शिशु को पूरक आहार कब और कितना दें? महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की गाइडलाइन
सारांश
मुख्य बातें
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार, जन्म के 6 महीने पूरे होते ही शिशु के आहार में पूरक ठोस भोजन शामिल करना आवश्यक हो जाता है, क्योंकि इस उम्र के बाद केवल माँ के दूध या फॉर्मूला दूध से शरीर की बढ़ती पोषण-आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो पातीं। मंत्रालय ने 14 मई 2025 को अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर यह जानकारी साझा कर माता-पिता को उम्र के अनुसार सही मात्रा और खाद्य पदार्थ अपनाने की सलाह दी।
पूरक आहार की शुरुआत कैसे करें
विशेषज्ञों के अनुसार, 6 महीने के बच्चे को पहले दूध पिलाना चाहिए और उसके बाद ठोस भोजन देना चाहिए — इससे शिशु को दोनों स्रोतों से पोषण मिलता है। शुरुआत में मात्र 3 से 4 चम्मच से शुरू करें और बच्चे की प्रतिक्रिया देखें। यदि वह भोजन आसानी से पचा रहा है, तो धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाई जा सकती है।
घर का बना हल्का और पौष्टिक भोजन सबसे उपयुक्त माना जाता है। इसमें गाढ़ी दाल के साथ चावल, खिचड़ी, हरी सब्जियाँ, दही, घी और थोड़ी मात्रा में तेल शामिल किया जा सकता है। केला, पपीता, गाजर और कद्दू जैसे पीले-नारंगी फल व सब्जियाँ आवश्यक विटामिन और ऊर्जा प्रदान करती हैं।
उम्र के अनुसार भोजन की मात्रा
6 से 7 महीने के शिशु को दिन में दो बार एक छोटी कटोरी भोजन दिया जा सकता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, भूख और पोषण की ज़रूरतें भी बढ़ती हैं।
7 से 8 महीने की उम्र में यह मात्रा दो कटोरी प्रतिदिन तक बढ़ाई जा सकती है। 9 से 11 महीने के बच्चे को तीन कटोरी तक भोजन दिया जा सकता है। 12 से 24 महीने के बच्चे के लिए यह मात्रा चार से पाँच कटोरी प्रतिदिन तक हो सकती है।
माता-पिता के लिए ज़रूरी सावधानियाँ
हर बच्चे की भूख और पाचन क्षमता अलग होती है, इसलिए जबरदस्ती खिलाने की बजाय बच्चे के भूख के संकेतों को समझना ज़रूरी है। बच्चे को खेल-खेल में और प्यार से खाना खिलाने से वह खाने में रुचि लेता है और खाने की आदत स्वस्थ बनती है।
गौरतलब है कि यह दिशा-निर्देश ऐसे समय में आए हैं जब भारत में 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में कुपोषण अभी भी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। सही उम्र में पूरक आहार की शुरुआत बच्चे के दीर्घकालिक शारीरिक और मानसिक विकास की नींव रखती है।
आम जनता पर असर
यह जानकारी विशेष रूप से पहली बार माता-पिता बने दंपतियों के लिए महत्वपूर्ण है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ पोषण संबंधी जागरूकता सीमित है, वहाँ इस तरह की सरकारी गाइडलाइन बच्चों की सेहत सुधारने में सहायक हो सकती है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का यह कदम पोषण अभियान के व्यापक लक्ष्यों के अनुरूप है।