बांग्लादेश में खसरे से 583 बच्चों की मौत, 24 घंटे में 8 और की गई जान; कुल मामले 69,612
सारांश
मुख्य बातें
बांग्लादेश में खसरे का प्रकोप थमने का नाम नहीं ले रहा। स्वास्थ्य महानिदेशालय (DGHS) के आंकड़ों के अनुसार, 30 मई 2025 तक देश में खसरे और इससे मिलते-जुलते लक्षणों के कारण कुल 583 बच्चों की मौत हो चुकी है। शुक्रवार से शनिवार सुबह 8 बजे तक के महज 24 घंटों में 8 और बच्चों ने दम तोड़ा। 15 मार्च से अब तक कुल संदिग्ध मामलों की संख्या 69,612 तक पहुँच चुकी है।
मुख्य घटनाक्रम
DGHS के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, पिछले 24 घंटों में 1,033 नए संदिग्ध मामले सामने आए और 53 नए पुष्ट खसरा मामले दर्ज किए गए। कुल मौतों में से 90 मौतें सीधे खसरे से और 493 मौतें खसरे से मिलते-जुलते लक्षणों के कारण हुई हैं। बांग्लादेशी मीडिया संस्थान यूएनबी के अनुसार, ढाका डिवीजन में संदिग्ध मौतों की संख्या सर्वाधिक रही, जहाँ 24 घंटे में 3 बच्चों की जान गई।
संक्रमण की रफ्तार
स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस महीने लगभग हर दिन 1,000 से अधिक नए मामले सामने आए हैं — केवल 9, 16 और 23 मई को यह आंकड़ा इससे नीचे रहा। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने ईद की छुट्टियों से पहले ही चेतावनी दी थी कि लंबी यात्राओं, पारिवारिक जमावड़ों और भीड़भाड़ वाले आयोजनों के कारण संक्रमण और तेज़ी से फैल सकता है। उन्होंने छोटे बच्चों वाले परिवारों को अनावश्यक भीड़ से बचने की सलाह दी।
सरकार की प्रतिक्रिया और टीकाकरण अभियान
स्वास्थ्य अधिकारियों ने बताया कि संक्रमण नियंत्रण के लिए निगरानी, टीकाकरण और उपचार संबंधी प्रयास तेज़ कर दिए गए हैं। सरकार की विशेष खसरा-रूबेला टीकाकरण मुहिम का पहला चरण 20 मई को पूरा हो चुका है। प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करने पर विशेष ज़ोर दिया जा रहा है।
विवादित नीति और प्रकोप की जड़
द डेली स्टार की रिपोर्ट और Science.org में 30 अप्रैल को प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, खसरे ने महामारी का रूप इसलिए लिया क्योंकि कथित तौर पर मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने यूनीसेफ के माध्यम से वैक्सीन खरीद रोककर उसकी जगह ओपन टेंडर प्रणाली अपनाने का निर्णय लिया था। विशेषज्ञों ने पहले ही आगाह किया था कि इस बदलाव से नियमित टीकाकरण बाधित होगा और प्रकोप का खतरा बढ़ेगा — और आखिरकार ऐसा ही हुआ।
आगे की चुनौतियाँ
यह संकट ऐसे समय में और गहरा हो रहा है जब बांग्लादेश पहले से ही राजनीतिक अस्थिरता और स्वास्थ्य ढाँचे की कमज़ोरियों से जूझ रहा है। हर गुज़रते दिन के साथ मौत का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों की नज़र अब इस संकट पर टिकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक टीकाकरण कवरेज में तेज़ी से सुधार नहीं होता, बच्चों की मौतों का सिलसिला थमना मुश्किल होगा।