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बीकेएस अयंगर पुण्यतिथि: बीमारी और कुपोषण से उठकर जिन्होंने दुनिया को योग सिखाया

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बीकेएस अयंगर पुण्यतिथि: बीमारी और कुपोषण से उठकर जिन्होंने दुनिया को योग सिखाया

सारांश

बीमारी और कुपोषण से ग्रस्त एक कमज़ोर बच्चे से विश्व के सबसे प्रभावशाली योग गुरु तक — बीकेएस अयंगर की जीवन-यात्रा असाधारण है। 20 अगस्त को उनकी पुण्यतिथि पर याद आता है वह सफर, जिसने 'अयंगर योग' को भारत से यूरोप और अमेरिका तक पहुँचाया।

मुख्य बातें

बीकेएस अयंगर का निधन 20 अगस्त 2014 को पुणे में 95 वर्ष की आयु में हुआ।
बचपन में मलेरिया, टाइफाइड, टीबी और कुपोषण से जूझने वाले अयंगर ने 18 वर्ष की आयु में पुणे में योग शिक्षण आरंभ किया।
1952 में वायलिन वादक यहूदी मेनुहिन से मुलाकात के बाद उनका अंतरराष्ट्रीय सफर शुरू हुआ।
1966 में प्रकाशित 'लाइट ऑन योगा' योग जगत की सर्वाधिक पठित संदर्भ पुस्तकों में से एक बनी।
भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री (1991) , पद्मभूषण (2002) और पद्मविभूषण (2014) से नवाज़ा।
2004 में टाइम मैगज़ीन ने उन्हें विश्व के 100 सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल किया।

बेल्लूर कृष्णमाचार सुंदरराज अयंगर — जिन्हें दुनिया बीकेएस अयंगर के नाम से जानती है — की 20 अगस्त 2014 को पुणे में 95 वर्ष की आयु में निधन हुई थी। यह पुण्यतिथि उस असाधारण जीवन-यात्रा की याद दिलाती है, जो कुपोषण और गंभीर बीमारियों से शुरू होकर वैश्विक योग आंदोलन की नींव बनी। जिस व्यक्ति ने करोड़ों लोगों को शरीर और मन की शक्ति का मार्ग दिखाया, उसका अपना बचपन अत्यंत कठिन परिस्थितियों में बीता था।

संघर्षपूर्ण बचपन और योग की शुरुआत

14 दिसंबर 1918 को कर्नाटक के बेल्लूर में एक सामान्य परिवार में जन्मे अयंगर अपने 13 भाई-बहनों में 11वें थे। परिवार की आर्थिक स्थिति सीमित थी और बचपन में ही उन्हें मलेरिया, टाइफाइड, तपेदिक (टीबी) और कुपोषण जैसी गंभीर बीमारियों से जूझना पड़ा। अयंगर ने स्वयं अपने बचपन को याद करते हुए बताया था कि उनकी बाहें बेहद पतली, पैर कमज़ोर और पेट असामान्य रूप से बाहर निकला हुआ था।

जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया जब उनके बहनोई और प्रसिद्ध योगाचार्य तिरुमलाई कृष्णमाचार्य ने उन्हें योग सीखने के लिए मैसूर बुलाया। कृष्णमाचार्य का अभ्यास अत्यंत कठोर था और अयंगर को प्रारंभिक वर्षों में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यही कठिन दौर आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुआ।

अयंगर योग की विशिष्ट पहचान

1937 में मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्हें पुणे भेजा गया, जहाँ उन्होंने योग शिक्षण आरंभ किया। वर्षों के अनुभव और गहन अध्ययन से उनकी अपनी शैली विकसित हुई, जो आगे चलकर 'अयंगर योग' के नाम से विश्वविख्यात हुई। इस पद्धति में शरीर के सटीक एलाइनमेंट और सही स्थिति पर विशेष बल दिया जाता है। विभिन्न आयु वर्ग और शारीरिक क्षमता के लोग योगाभ्यास कर सकें, इसके लिए बेल्ट, ब्लॉक, कुर्सी और अन्य प्रॉप्स के उपयोग को उन्होंने व्यवस्थित रूप दिया।

अंतरराष्ट्रीय पहचान और प्रसिद्ध शिष्य

1952 में विश्वप्रसिद्ध वायलिन वादक यहूदी मेनुहिन से उनकी मुलाकात ने उनके वैश्विक सफर की नींव रखी। कहा जाता है कि मेनुहिन ने कहा था कि उनके पास केवल पाँच मिनट हैं, किंतु अयंगर द्वारा शवासन में लिटाए जाने के बाद वे लगभग एक घंटे बाद तरोताज़ा होकर उठे। इस अनुभव ने दोनों के बीच गहरा संबंध बनाया और मेनुहिन के निमंत्रण पर अयंगर स्विट्जरलैंड पहुँचे, जहाँ से उनके अंतरराष्ट्रीय दौरों का सिलसिला आरंभ हुआ।

उनके शिष्यों की सूची उल्लेखनीय है — बेल्जियम की महारानी एलिजाबेथ, दार्शनिक जिद्दू कृष्णमूर्ति, लेखक एल्डस हक्सले, अभिनेत्री एनेट बेनिंग, फिल्मकार मीरा नायर, डिज़ाइनर डोना करन और क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर जैसी विश्वप्रसिद्ध हस्तियाँ उनके प्रशंसकों और शिष्यों में रहीं।

साहित्यिक योगदान और संस्थान की स्थापना

1966 में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'लाइट ऑन योगा' योग जगत की संदर्भ पुस्तक बन गई, जिसमें आसनों को अत्यंत व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया गया। इसके बाद प्राणायाम और योग दर्शन पर भी उनकी कई महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुईं। 1975 में उन्होंने पुणे में अपनी दिवंगत पत्नी रामामणि — जिनका निधन 1973 में हुआ था — की स्मृति में रामामणि अयंगर मेमोरियल योग इंस्टीट्यूट की स्थापना की। उनकी पुत्री गीता और पुत्र प्रशांत ने भी इस योग परंपरा को आगे बढ़ाया।

सम्मान और विरासत

भारत सरकार ने उन्हें 1991 में पद्मश्री, 2002 में पद्मभूषण और 2014 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया। 2004 में टाइम मैगज़ीन ने उन्हें विश्व के 100 सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में स्थान दिया। आज उनकी पुण्यतिथि पर उनकी यह विरासत — कि एक रोगग्रस्त बच्चा योग की शक्ति से विश्व का मार्गदर्शक बन सकता है — करोड़ों अभ्यासकर्ताओं को प्रेरणा देती रहती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस भारतीय ज्ञान परंपरा की है जिसे पश्चिम ने पहले अपनाया और भारत ने बाद में सम्मान दिया। गौरतलब है कि उन्हें पद्मश्री 1991 में मिली — तब तक वे दशकों से यूरोप और अमेरिका में योग का परचम लहरा चुके थे। यह प्रश्न उठता है कि क्या भारत अपने सांस्कृतिक निर्यातकों को वह मान्यता समय पर देता है जिसके वे हकदार हैं। अयंगर की विरासत यह भी याद दिलाती है कि योग का वैश्वीकरण किसी सरकारी अभियान से नहीं, बल्कि एक व्यक्ति की साधना और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों से हुआ।
RashtraPress
4 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बीकेएस अयंगर कौन थे और उनकी पुण्यतिथि कब है?
बेल्लूर कृष्णमाचार सुंदरराज अयंगर (बीकेएस अयंगर) विश्वविख्यात भारतीय योग गुरु थे, जिन्होंने 'अयंगर योग' पद्धति विकसित की। उनकी पुण्यतिथि 20 अगस्त को है — इसी दिन 2014 में पुणे में 95 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ था।
अयंगर योग क्या है और यह अन्य योग पद्धतियों से कैसे अलग है?
अयंगर योग में शरीर के सटीक एलाइनमेंट और सही स्थिति पर विशेष बल दिया जाता है। इसमें बेल्ट, ब्लॉक, कुर्सी जैसे प्रॉप्स का उपयोग किया जाता है ताकि विभिन्न आयु और शारीरिक क्षमता के लोग भी योगाभ्यास कर सकें — यह इसे अन्य पारंपरिक पद्धतियों से अलग बनाता है।
बीकेएस अयंगर का बचपन कैसा था?
अयंगर का बचपन अत्यंत कठिन था। 14 दिसंबर 1918 को कर्नाटक के बेल्लूर में जन्मे वे 13 भाई-बहनों में 11वें थे। बचपन में उन्हें मलेरिया, टाइफाइड, टीबी और कुपोषण से जूझना पड़ा, जिससे उनका शरीर बेहद कमज़ोर हो गया था।
बीकेएस अयंगर को कौन-कौन से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले?
भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री (1991) , पद्मभूषण (2002) और पद्मविभूषण (2014) से सम्मानित किया। 2004 में टाइम मैगज़ीन ने उन्हें विश्व के 100 सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों की सूची में शामिल किया।
यहूदी मेनुहिन से मुलाकात ने अयंगर के जीवन को कैसे बदला?
1952 में विश्वप्रसिद्ध वायलिन वादक यहूदी मेनुहिन से हुई मुलाकात अयंगर के अंतरराष्ट्रीय सफर का आरंभिक बिंदु बनी। मेनुहिन के निमंत्रण पर अयंगर स्विट्जरलैंड गए और इसके बाद उनकी योग पद्धति यूरोप और अमेरिका में फैलने लगी।
राष्ट्र प्रेस
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