बीकेएस अयंगर पुण्यतिथि: बीमारी और कुपोषण से उठकर जिन्होंने दुनिया को योग सिखाया
सारांश
मुख्य बातें
बेल्लूर कृष्णमाचार सुंदरराज अयंगर — जिन्हें दुनिया बीकेएस अयंगर के नाम से जानती है — की 20 अगस्त 2014 को पुणे में 95 वर्ष की आयु में निधन हुई थी। यह पुण्यतिथि उस असाधारण जीवन-यात्रा की याद दिलाती है, जो कुपोषण और गंभीर बीमारियों से शुरू होकर वैश्विक योग आंदोलन की नींव बनी। जिस व्यक्ति ने करोड़ों लोगों को शरीर और मन की शक्ति का मार्ग दिखाया, उसका अपना बचपन अत्यंत कठिन परिस्थितियों में बीता था।
संघर्षपूर्ण बचपन और योग की शुरुआत
14 दिसंबर 1918 को कर्नाटक के बेल्लूर में एक सामान्य परिवार में जन्मे अयंगर अपने 13 भाई-बहनों में 11वें थे। परिवार की आर्थिक स्थिति सीमित थी और बचपन में ही उन्हें मलेरिया, टाइफाइड, तपेदिक (टीबी) और कुपोषण जैसी गंभीर बीमारियों से जूझना पड़ा। अयंगर ने स्वयं अपने बचपन को याद करते हुए बताया था कि उनकी बाहें बेहद पतली, पैर कमज़ोर और पेट असामान्य रूप से बाहर निकला हुआ था।
जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया जब उनके बहनोई और प्रसिद्ध योगाचार्य तिरुमलाई कृष्णमाचार्य ने उन्हें योग सीखने के लिए मैसूर बुलाया। कृष्णमाचार्य का अभ्यास अत्यंत कठोर था और अयंगर को प्रारंभिक वर्षों में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यही कठिन दौर आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुआ।
अयंगर योग की विशिष्ट पहचान
1937 में मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्हें पुणे भेजा गया, जहाँ उन्होंने योग शिक्षण आरंभ किया। वर्षों के अनुभव और गहन अध्ययन से उनकी अपनी शैली विकसित हुई, जो आगे चलकर 'अयंगर योग' के नाम से विश्वविख्यात हुई। इस पद्धति में शरीर के सटीक एलाइनमेंट और सही स्थिति पर विशेष बल दिया जाता है। विभिन्न आयु वर्ग और शारीरिक क्षमता के लोग योगाभ्यास कर सकें, इसके लिए बेल्ट, ब्लॉक, कुर्सी और अन्य प्रॉप्स के उपयोग को उन्होंने व्यवस्थित रूप दिया।
अंतरराष्ट्रीय पहचान और प्रसिद्ध शिष्य
1952 में विश्वप्रसिद्ध वायलिन वादक यहूदी मेनुहिन से उनकी मुलाकात ने उनके वैश्विक सफर की नींव रखी। कहा जाता है कि मेनुहिन ने कहा था कि उनके पास केवल पाँच मिनट हैं, किंतु अयंगर द्वारा शवासन में लिटाए जाने के बाद वे लगभग एक घंटे बाद तरोताज़ा होकर उठे। इस अनुभव ने दोनों के बीच गहरा संबंध बनाया और मेनुहिन के निमंत्रण पर अयंगर स्विट्जरलैंड पहुँचे, जहाँ से उनके अंतरराष्ट्रीय दौरों का सिलसिला आरंभ हुआ।
उनके शिष्यों की सूची उल्लेखनीय है — बेल्जियम की महारानी एलिजाबेथ, दार्शनिक जिद्दू कृष्णमूर्ति, लेखक एल्डस हक्सले, अभिनेत्री एनेट बेनिंग, फिल्मकार मीरा नायर, डिज़ाइनर डोना करन और क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर जैसी विश्वप्रसिद्ध हस्तियाँ उनके प्रशंसकों और शिष्यों में रहीं।
साहित्यिक योगदान और संस्थान की स्थापना
1966 में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'लाइट ऑन योगा' योग जगत की संदर्भ पुस्तक बन गई, जिसमें आसनों को अत्यंत व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया गया। इसके बाद प्राणायाम और योग दर्शन पर भी उनकी कई महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुईं। 1975 में उन्होंने पुणे में अपनी दिवंगत पत्नी रामामणि — जिनका निधन 1973 में हुआ था — की स्मृति में रामामणि अयंगर मेमोरियल योग इंस्टीट्यूट की स्थापना की। उनकी पुत्री गीता और पुत्र प्रशांत ने भी इस योग परंपरा को आगे बढ़ाया।
सम्मान और विरासत
भारत सरकार ने उन्हें 1991 में पद्मश्री, 2002 में पद्मभूषण और 2014 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया। 2004 में टाइम मैगज़ीन ने उन्हें विश्व के 100 सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में स्थान दिया। आज उनकी पुण्यतिथि पर उनकी यह विरासत — कि एक रोगग्रस्त बच्चा योग की शक्ति से विश्व का मार्गदर्शक बन सकता है — करोड़ों अभ्यासकर्ताओं को प्रेरणा देती रहती है।