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क्या भूलने की आदतों का नया नाम 'डिजिटल डिमेंशिया' है?

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क्या भूलने की आदतों का नया नाम 'डिजिटल डिमेंशिया' है?

सारांश

क्या आपने कभी सोचा है कि हमारी याददाश्त पर डिजिटल तकनीक का क्या प्रभाव पड़ रहा है? आजकल के स्मार्टफोन्स और सोशल मीडिया के चलते हम छोटी-छोटी बातें भूलने लगे हैं। जानिए इसके कारण और इससे बचने के उपाय।

मुख्य बातें

डिजिटल उपकरणों पर निर्भरता से याददाश्त कमजोर होती है।
एकाग्रता की कमी मानसिक थकान बढ़ाती है।
डिजिटल डिमेंशिया से बचने के लिए जीवनशैली में बदलाव जरूरी हैं।
किताबें पढ़ने और दिमागी खेल खेलने से मस्तिष्क को सक्रिय रखा जा सकता है।

नई दिल्ली, २४ दिसंबर (राष्ट्र प्रेस)। आज के डिजिटल युग में हमारी याददाश्त पर तकनीक का प्रभाव स्पष्ट है। पहले हम छोटे-छोटे कार्य, जैसे किसी नंबर को याद रखना, बच्चों को पहाड़े सिखाना या हाल ही में देखी गई फिल्म को याद करना सरलता से कर लेते थे। लेकिन अब, स्मार्टफोन, इंटरनेट और एप्स के इस दौर में मस्तिष्क को लगातार सुविधा मिल रही है, जिससे इसकी स्वाभाविक क्षमता धीरे-धीरे कमजोर हो रही है।

जब हर जानकारी केवल एक क्लिक पर उपलब्ध हो, तो मस्तिष्क को उसे याद रखने की आवश्यकता कम पड़ती है। इसी कारण लोग अक्सर यह महसूस करते हैं कि हाल ही में कौन-सा मैसेज पढ़ा या कौन-सी फाइल सेव की, इसे याद रखना कठिन हो गया है।

तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता का सबसे बड़ा प्रभाव एकाग्रता पर पड़ता है। लोग एक साथ कई कार्य कर लेते हैं। स्क्रीन पर लगातार स्क्रॉल करना और सोशल मीडिया पर समय बिताना मस्तिष्क पर दबाव डालता है, जिसके चलते सोचने-समझने, तर्क करने और फैसले लेने की क्षमता धीरे-धीरे प्रभावित होती है। जब दिमाग किसी कार्य पर पूरी तरह केंद्रित रहता है और उसे पूरा करने की संतोष मिलती है, तभी स्मरण शक्ति मजबूत होती है। लेकिन तकनीक की सुविधा ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया है।

याद रखने की प्रक्रिया दो चरणों पर आधारित होती है। पहले मस्तिष्क किसी चीज को दर्ज करता है, फिर उसे दोबारा स्मरण करता है। डिजिटल उपकरणों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण यह प्रक्रिया प्रभावित होती है। लोग अब छोटी-छोटी बातें भूलने लगे हैं और लंबे समय तक ध्यान केंद्रित करना कठिन हो गया है। इससे मानसिक थकान बढ़ती है और काम में निरंतरता बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।

विशेषज्ञ इसे डिजिटल डिमेंशिया कहते हैं। यह केवल याददाश्त पर ही नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन और भावनाओं पर भी असर डालता है। लगातार फोन और कम्प्यूटर पर निर्भर रहने से व्यक्ति मानसिक अस्थिरता, उदासी और संतोष की कमी महसूस करने लगता है। बातचीत में बाधा आती है, चाहे वह लिखित हो या मौखिक। कई बार व्यक्ति अपने दोस्तों और परिवार से दूरी बनाने लगता है, क्योंकि जानकारी या स्मरण की कमी उसे असहज महसूस कराती है।

इस समस्या से बचने के लिए जीवनशैली में बदलाव आवश्यक है। डिजिटल उपकरणों का उपयोग सीमित करना, अनुपयोगी एप्स हटाना, फोन से दूरी बनाना और समय-समय पर स्क्रीन ब्रेक लेना मददगार हो सकता है। इसके अलावा, किताबें पढ़ना और कुछ नया सीखना मस्तिष्क को सक्रिय रखने में मदद करता है। पहेलियां, शतरंज, ब्रेन टीजर और पजल खेलना भी दिमाग को व्यस्त और स्वस्थ बनाए रखने का एक उत्कृष्ट तरीका है।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह स्पष्ट है कि डिजिटल डिमेंशिया एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। यह केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य को ही नहीं, बल्कि समाज के समग्र मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। हमें इस दिशा में उचित कदम उठाने की आवश्यकता है।
RashtraPress
14 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डिजिटल डिमेंशिया क्या है?
यह तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता के कारण होने वाली याददाश्त और मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं को संदर्भित करता है।
क्या डिजिटल उपकरणों का उपयोग सीमित करना फायदेमंद है?
हाँ, डिजिटल उपकरणों का सीमित उपयोग मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।
क्या इससे बचने के उपाय हैं?
जी हाँ, नियमित रूप से स्क्रीन ब्रेक लेना, किताबें पढ़ना और दिमागी खेल खेलना मदद कर सकते हैं।
क्या यह समस्या सभी आयु वर्ग में है?
हां, यह समस्या युवा से लेकर वृद्ध सभी आयु वर्ग में देखी जा रही है।
राष्ट्र प्रेस
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