राज्यसभा में उठी डॉक्टरों की सुरक्षा की चिंता, 7.9 प्रतिशत डॉक्टरों ने झेली हिंसा

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राज्यसभा में उठी डॉक्टरों की सुरक्षा की चिंता, 7.9 प्रतिशत डॉक्टरों ने झेली हिंसा

सारांश

राज्यसभा में डॉक्टरों और मरीजों की सुरक्षा पर चर्चा के दौरान यह खुलासा हुआ कि पिछले वर्ष में 7.9 प्रतिशत डॉक्टरों को हिंसा या दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। यह घटना केवल महानगरों तक सीमित नहीं, बल्कि छोटे शहरों में भी बढ़ रही है।

Key Takeaways

  • 7.9 प्रतिशत डॉक्टरों ने पिछले वर्ष में हिंसा का सामना किया।
  • लगभग 3.9 प्रतिशत मामलों में शारीरिक हमले हुए।
  • 48 प्रतिशत घटनाएं रिपोर्ट नहीं की जातीं।
  • समस्या अब छोटे कस्बों तक फैली हुई है।
  • सरकार से सुरक्षा के लिए समितियों का गठन करने की मांग।

नई दिल्ली, 17 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। डॉक्टरों और मरीजों की सुरक्षा के साथ-साथ अस्पतालों में उनके बीच होने वाले हिंसक विवाद का विषय मंगलवार को राज्यसभा में उठाया गया। एक हालिया राष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार, लगभग 7.9 प्रतिशत डॉक्टरों ने पिछले एक वर्ष में किसी न किसी प्रकार की हिंसा या दुर्व्यवहार का सामना किया है, जबकि लगभग 3.9 प्रतिशत मामलों में शारीरिक हमले भी हुए हैं।

इन हमलों में डॉक्टरों को चोट पहुंचाने का प्रयास किया गया। उनके अस्पताल या क्लिनिक में तोड़फोड़ और मेडिकल उपकरणों को भी नुकसान पहुंचाया गया है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस प्रकार की लगभग 48 प्रतिशत घटनाओं की रिपोर्ट नहीं की जाती, क्योंकि डॉक्टरों का प्रशासनिक व्यवस्था पर विश्वास कम होता जा रहा है। यह जानकारी भाजपा के राज्यसभा सांसद लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने मंगलवार को सदन में प्रस्तुत की।

उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में मरीजों के परिजनों द्वारा मारपीट, तोड़-फोड़ और चिकित्सकों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं सामने आई हैं। यह समस्या अब केवल महानगरों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि मेरठ जैसे छोटे कस्बों और नर्सिंग होम्स तक भी फैल चुकी है। कई बार मरीज के परिजनों के असंतोष के कारण चिकित्सकों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है, जिससे इलाज की व्यवस्था भी प्रभावित होती है।

लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने कहा कि यदि हम दिल्ली के सरकारी अस्पतालों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो 2021 से 2025 के बीच ऐसी 149 घटनाएं सामने आई हैं। यह संख्या चिंताजनक है। 2024 में 49 और 2025 में 48 ऐसे मामले दर्ज किए गए हैं। हमारे देश में चिकित्सक को भगवान का रूप माना जाता है। डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी हमारे समाज के सच्चे योद्धा हैं, जो दिन-रात लोगों की जान बचाने में लगे रहते हैं। लेकिन, यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि पिछले कुछ वर्षों में कटुता और अविश्वास के कारण डॉक्टरों और मरीजों के बीच तनाव बढ़ा है और अस्पतालों में हिंसा की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं।

भाजपा के राज्यसभा सांसद ने इसे एक गंभीर और संवेदनशील विषय बताते हुए कहा कि वह सदन का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहते हैं। ऐसी घटनाएं डॉक्टर और मरीज के बीच के विश्वास को कमजोर करती हैं और स्वास्थ्य सेवाओं के पूरे वातावरण को असुरक्षित बना देती हैं। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों और मरीजों, यानी सभी के हितों की रक्षा की जाए।

उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि राज्य स्तर पर सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक अपील समिति गठित की जाए। जिला स्तर पर जिला जज की अध्यक्षता में ‘डॉक्टर-मरीज सुरक्षा समन्वय समिति’ का गठन किया जाए। यहां आने वाले सभी मामलों का समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित किया जाए। ऐसा करना इसलिए आवश्यक है ताकि डॉक्टर निर्भय होकर अपने पवित्र कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें और मरीजों एवं उनके परिवारों को भी समय पर न्याय मिल सके।

Point of View

यह एक चिंताजनक विषय है। डॉक्टरों और मरीजों के बीच का संबंध हमारे स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का आधार है। यदि इस पर हमला होता है, तो इससे न केवल स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित होती हैं, बल्कि समाज में विश्वास भी कमजोर होता है।
NationPress
17/03/2026

Frequently Asked Questions

क्या डॉक्टरों पर हिंसा एक गंभीर समस्या है?
हाँ, हालिया अध्ययन के अनुसार, 7.9 प्रतिशत डॉक्टरों ने पिछले वर्ष में हिंसा या दुर्व्यवहार का सामना किया है।
राज्यसभा में इस मुद्दे पर क्या चर्चा हुई?
राज्यसभा में डॉक्टरों और मरीजों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया गया और इसके समाधान के लिए सुझाव दिए गए।
क्या यह समस्या केवल महानगरों तक सीमित है?
नहीं, यह समस्या छोटे कस्बों और नर्सिंग होम्स तक भी फैल चुकी है।
डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
सरकार ने सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की अध्यक्षता में समितियाँ गठित करने का सुझाव दिया है।
क्या डॉक्टरों की हिंसा की घटनाओं की रिपोर्ट की जाती है?
लगभग 48 प्रतिशत घटनाओं की रिपोर्ट नहीं की जाती, क्योंकि डॉक्टरों का प्रशासन पर विश्वास कम होता जा रहा है।
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