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डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय: भारत के पहले IVF जनक को मिला मरणोपरांत सम्मान, जीवनकाल में मिली थी उपेक्षा

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डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय: भारत के पहले IVF जनक को मिला मरणोपरांत सम्मान, जीवनकाल में मिली थी उपेक्षा

सारांश

दुनिया की दूसरी टेस्ट-ट्यूब बेबी भारत में जन्मी — ब्रिटेन की उपलब्धि के सिर्फ 67 दिन बाद। पर उस चमत्कार के जनक डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय को जीते-जी न मान्यता मिली, न सम्मान। संस्थागत उपेक्षा और अपमान ने उन्हें तोड़ दिया। न्याय मिला — मृत्यु के दो दशक बाद।

मुख्य बातें

सुभाष मुखोपाध्याय ने 1978 में कोलकाता में IVF तकनीक से भारत की पहली और दुनिया की दूसरी टेस्ट-ट्यूब बेबी 'दुर्गा' को जन्म दिलाया — ब्रिटेन की पहली IVF सफलता के केवल 67 दिन बाद।
उन्होंने भ्रूण क्रायोप्रिजर्वेशन की तकनीक दुनिया के अन्य वैज्ञानिकों से लगभग पाँच वर्ष पहले विकसित की।
पश्चिम बंगाल सरकार की समिति ने उनके शोध को 'फर्जी' करार दिया; उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शोध प्रस्तुत करने से रोका गया।
18 जून 1981 को संस्थागत उपेक्षा और मानसिक तनाव के चलते उन्होंने अपना जीवन समाप्त कर लिया।
ICMR ने 2002 में — उनकी मृत्यु के 21 वर्ष बाद — आधिकारिक रूप से उनके योगदान को मान्यता दी।
2020 में ICMR-राष्ट्रीय प्रजनन स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान ने उनके जीवन पर विशेष पुस्तक प्रकाशित की।

डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय — भारत की पहली टेस्ट-ट्यूब बेबी के जनक — को उनके ऐतिहासिक योगदान की आधिकारिक मान्यता मृत्यु के दो दशक से अधिक समय बाद मिली, जब भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) ने 2002 में उनके शोध को औपचारिक रूप से स्वीकार किया। 19 जून का दिन भारतीय चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में उस वैज्ञानिक की स्मृति में दर्ज है, जिसने सीमित संसाधनों और संस्थागत विरोध के बावजूद इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) की क्रांति को भारत की धरती पर संभव कर दिखाया।

दुनिया की दूसरी टेस्ट-ट्यूब बेबी — केवल 67 दिन बाद

25 जुलाई 1978 को ब्रिटेन में डॉ. रॉबर्ट एडवर्ड्स और डॉ. पैट्रिक स्टेप्टो के प्रयासों से दुनिया की पहली टेस्ट-ट्यूब बेबी लुईस ब्राउन का जन्म हुआ। इस उपलब्धि ने पूरी दुनिया को चौंका दिया। लेकिन इसके महज 67 दिन बाद, कोलकाता में डॉ. मुखोपाध्याय और उनकी टीम ने IVF तकनीक के माध्यम से भारत की पहली और दुनिया की दूसरी टेस्ट-ट्यूब बेबी 'दुर्गा' के जन्म की घोषणा की। यह उपलब्धि उस दौर में असाधारण थी, जब भारत में इस स्तर की चिकित्सा अवसंरचना की कल्पना भी कठिन थी।

डॉ. मुखोपाध्याय का वैज्ञानिक जीवन और योगदान

16 जनवरी 1931 को झारखंड के हजारीबाग में जन्मे डॉ. मुखोपाध्याय बचपन से ही असाधारण मेधावी थे। उनके पिता डॉ. सत्येंद्र नाथ मुखर्जी एक प्रतिष्ठित रेडियोलॉजिस्ट थे। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से फिजियोलॉजी में स्नातक और 1955 में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से MBBS की डिग्री प्राप्त की। प्रसूति एवं स्त्री रोग विज्ञान में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए उन्हें छात्रवृत्ति और कॉलेज पदक से सम्मानित किया गया। इसके बाद उन्होंने प्रजनन शरीर क्रिया विज्ञान और प्रजनन अंतःस्रावी विज्ञान में दो पीएचडी हासिल कीं।

डॉ. मुखोपाध्याय की वैज्ञानिक दृष्टि अपने समय से बहुत आगे थी। उन्होंने अंडाशय को उत्तेजित करने के लिए गोनाडोट्रोपिन आधारित तकनीकों का उपयोग किया, जो बाद में वैश्विक स्तर पर मानक उपचार पद्धति बनीं। सबसे उल्लेखनीय उनका भ्रूण क्रायोप्रिजर्वेशन का प्रयोग था — भ्रूण को सुरक्षित रूप से फ्रीज कर बाद में उपयोग करने की यह विधि दुनिया के अन्य वैज्ञानिकों द्वारा इस क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने से लगभग पाँच वर्ष पहले दर्ज की गई थी।

संस्थागत उपेक्षा और अपमान की त्रासदी

इतनी बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि के बावजूद पश्चिम बंगाल सरकार ने उनके शोध की जाँच के लिए एक समिति गठित की — जिसमें IVF विशेषज्ञ शामिल नहीं थे। समिति ने उनके दावों को 'अविश्वसनीय, बेतुका और फर्जी' घोषित कर दिया। उन्हें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में अपने शोध प्रस्तुत करने की अनुमति नहीं दी गई। मीडिया और वैज्ञानिक समुदाय के एक वर्ग ने भी उन्हें संदेह की दृष्टि से देखा।

1980 में उनका तबादला घर से दूर आरजी कर मेडिकल कॉलेज कर दिया गया। अगले वर्ष उन्हें क्षेत्रीय नेत्र विज्ञान संस्थान भेजा गया, जहाँ शोध जारी रखना लगभग असंभव हो गया। लगातार अपमान, मानसिक तनाव और पेशेवर अलगाव ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। उन्हें दिल का दौरा भी पड़ा। 18 जून 1981 को उन्होंने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। अपने अंतिम नोट में उन्होंने लिखा था, 'मैं हर दिन दिल का दौरा पड़ने से मरने का इंतजार नहीं कर सकता।'

मरणोपरांत मान्यता का लंबा इंतजार

डॉ. मुखोपाध्याय की मृत्यु के वर्षों बाद 1997 में मुंबई के प्रजनन अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. टी.सी. आनंद कुमार ने उनके शोधपत्रों, दस्तावेजों और हस्तलिखित नोट्स का गहन अध्ययन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि डॉ. मुखोपाध्याय का शोध पूरी तरह वैज्ञानिक था और 'दुर्गा' वास्तव में भारत की पहली IVF शिशु थी। इन्हीं प्रयासों के परिणामस्वरूप ICMR ने 2002 में आधिकारिक रूप से उनके योगदान को मान्यता दी।

मरणोपरांत उनके नाम पर अनेक स्मृति व्याख्यान, अनुसंधान केंद्र और पुरस्कार स्थापित किए गए। 1982 में 'डॉ. सुभाष मुखर्जी मेमोरियल ओरेशन' की शुरुआत हुई। 2007 में उन्हें प्रतिष्ठित 'डिक्शनरी ऑफ मेडिकल बायोग्राफी' में स्थान मिला। 2012 में ICMR ने उनके नाम पर पुरस्कार की घोषणा की। 2020 में ICMR-राष्ट्रीय प्रजनन स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान ने उनके जीवन और उपलब्धियों पर एक विशेष पुस्तक प्रकाशित की।

आज IVF की विरासत और डॉ. मुखोपाध्याय का स्थान

आज जब IVF तकनीक लाखों निःसंतान दंपत्तियों के जीवन में उजाला ला रही है, तब यह स्मरण करना और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि भारत में इस क्रांति की नींव रखने वाले वैज्ञानिक को अपने ही देश में पहचान पाने के लिए मृत्यु के बाद भी दशकों प्रतीक्षा करनी पड़ी। गौरतलब है कि यह ऐसे समय की बात है जब वैज्ञानिक सत्यापन की प्रक्रिया संस्थागत पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं थी। डॉ. मुखोपाध्याय की कहानी भारतीय चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज है, जो प्रतिभा की उपेक्षा और न्याय की विलंबित जीत दोनों को एक साथ बयाँ करती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

उसमें IVF विशेषज्ञ तक नहीं थे — यह वैज्ञानिक समीक्षा नहीं, प्रशासनिक दमन था। आलोचकों का कहना है कि यदि समय पर उचित सत्यापन होता, तो भारत वैश्विक IVF अनुसंधान में अग्रणी भूमिका में होता। मरणोपरांत मान्यता नैतिक दायित्व की पूर्ति तो है, पर यह प्रश्न अनुत्तरित रहता है कि ऐसी कितनी प्रतिभाएँ संस्थागत उदासीनता की भेंट चढ़ गई होंगी।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय कौन थे और उनकी उपलब्धि क्या थी?
डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय भारत के पहले IVF वैज्ञानिक थे, जिन्होंने 1978 में कोलकाता में IVF तकनीक से भारत की पहली और दुनिया की दूसरी टेस्ट-ट्यूब बेबी 'दुर्गा' को जन्म दिलाया। यह उपलब्धि ब्रिटेन की पहली IVF सफलता के केवल 67 दिन बाद हासिल की गई थी।
डॉ. मुखोपाध्याय को जीवनकाल में मान्यता क्यों नहीं मिली?
पश्चिम बंगाल सरकार ने उनके शोध की जाँच के लिए एक ऐसी समिति बनाई जिसमें IVF विशेषज्ञ नहीं थे, और समिति ने उनके दावों को 'अविश्वसनीय और फर्जी' घोषित कर दिया। उन्हें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध प्रस्तुत करने से रोका गया और बाद में ऐसे संस्थानों में स्थानांतरित किया गया जहाँ शोध जारी रखना असंभव था।
ICMR ने डॉ. मुखोपाध्याय के योगदान को कब मान्यता दी?
ICMR ने 2002 में — डॉ. मुखोपाध्याय की मृत्यु के 21 वर्ष बाद — आधिकारिक रूप से उनके योगदान को मान्यता दी। इससे पहले 1997 में डॉ. टी.सी. आनंद कुमार ने उनके शोधपत्रों की गहन जाँच कर यह स्थापित किया था कि उनका कार्य पूरी तरह वैज्ञानिक था।
भ्रूण क्रायोप्रिजर्वेशन में डॉ. मुखोपाध्याय का योगदान क्या था?
डॉ. मुखोपाध्याय ने भ्रूण को सुरक्षित रूप से फ्रीज कर बाद में उपयोग करने की तकनीक — भ्रूण क्रायोप्रिजर्वेशन — दुनिया के अन्य वैज्ञानिकों से लगभग पाँच वर्ष पहले विकसित की थी। आज IVF उद्योग में यह तकनीक एक मानक प्रक्रिया है।
मरणोपरांत डॉ. मुखोपाध्याय को कौन-से सम्मान मिले?
1982 में 'डॉ. सुभाष मुखर्जी मेमोरियल ओरेशन' की शुरुआत हुई। 2007 में उन्हें 'डिक्शनरी ऑफ मेडिकल बायोग्राफी' में स्थान मिला। 2012 में ICMR ने उनके नाम पर पुरस्कार घोषित किया और 2020 में ICMR-राष्ट्रीय प्रजनन स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान ने उनके जीवन पर विशेष पुस्तक प्रकाशित की।
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