मेटाबॉलिक जोखिम और एनसीडी: भारत में 28.5% वयस्कों को हाई ब्लड प्रेशर, स्वस्थ जीवनशैली ज़रूरी
सारांश
मुख्य बातें
भारत में गैर-संचारी रोग (एनसीडी) — जिनमें डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग प्रमुख हैं — तेज़ी से सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर संकट बनते जा रहे हैं। राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग निगरानी सर्वेक्षण (एनएनएमएस) 2017-18 के आंकड़ों के अनुसार, देश की वयस्क आबादी में मेटाबॉलिक जोखिम कारकों का स्तर चिंताजनक है। विशेषज्ञों का कहना है कि खराब खानपान, शारीरिक निष्क्रियता, तंबाकू-शराब का सेवन और बढ़ता वज़न इन रोगों के मुख्य कारण हैं, जिन्हें समय पर पहचानकर और जीवनशैली में बदलाव लाकर काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
सर्वेक्षण के प्रमुख आंकड़े
एनएनएमएस 2017-18 में 18 से 69 वर्ष की आयु के वयस्कों को शामिल किया गया था और राष्ट्रीय स्तर पर एनसीडी जोखिम कारकों का व्यापक मूल्यांकन किया गया। सर्वेक्षण के अनुसार, 28.5 प्रतिशत वयस्कों में ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ पाया गया, जबकि 9.3 प्रतिशत लोगों में ब्लड ग्लूकोज़ का स्तर सामान्य से अधिक था।
वज़न से जुड़े आंकड़े भी उतने ही गंभीर हैं: 26.1 प्रतिशत वयस्क ओवरवेट और 6.2 प्रतिशत मोटापे से प्रभावित पाए गए। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि 32.2 प्रतिशत वयस्कों में सेंट्रल ओबेसिटी — यानी पेट के आसपास अत्यधिक चर्बी — की समस्या देखी गई, जिसे कई मेटाबॉलिक बीमारियों के बढ़ते जोखिम से सीधे जोड़ा जाता है।
जीवनशैली से जुड़े जोखिम कारक
सर्वेक्षण में सामने आया कि 32.8 प्रतिशत वयस्क तंबाकू का सेवन कर रहे थे, जबकि 15.9 प्रतिशत ने शराब पीने की जानकारी दी। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि एनसीडी की रोकथाम केवल दवाओं से संभव नहीं — जीवनशैली में ठोस बदलाव उतना ही आवश्यक है।
शारीरिक सक्रियता की स्थिति भी चिंताजनक रही। सर्वेक्षण में 41.3 प्रतिशत वयस्क शारीरिक रूप से निष्क्रिय पाए गए, यानी वे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में पर्याप्त व्यायाम या शारीरिक गतिविधि नहीं कर रहे थे। यह ऐसे समय में आया है जब शहरीकरण और डेस्क-आधारित कार्यसंस्कृति तेज़ी से बढ़ रही है।
आहार और नमक सेवन की स्थिति
खानपान की तस्वीर भी बेहतर नहीं है। सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग 98.4 प्रतिशत वयस्क प्रतिदिन पाँच सर्विंग (लगभग 400-500 ग्राम) से कम फल और सब्ज़ियाँ खा रहे थे — जो विश्व स्वास्थ्य संगठन की अनुशंसित मात्रा से काफी कम है। इसके अलावा, आबादी का औसत नमक सेवन लगभग 8 ग्राम प्रतिदिन आँका गया, जो अनुशंसित 5 ग्राम की सीमा से काफी अधिक है। अधिक नमक का सेवन हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग के जोखिम को बढ़ाने में सहायक माना जाता है।
हृदय रोग का दीर्घकालिक जोखिम
सर्वेक्षण में 40 से 69 वर्ष की आयु के वयस्कों में हृदय रोग के भविष्य के जोखिम का भी आकलन किया गया। आंकड़ों के अनुसार, लगभग 12.8 प्रतिशत लोगों में अगले 10 वर्षों में हृदय रोग का जोखिम 30 प्रतिशत या उससे अधिक था, अथवा वे पहले से ही किसी हृदय रोग से ग्रस्त थे। गौरतलब है कि यह उम्र-वर्ग कार्यशील आबादी का बड़ा हिस्सा है, जिससे इसके आर्थिक और सामाजिक प्रभाव भी व्यापक हो सकते हैं।
बचाव के उपाय और आगे की राह
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, एनसीडी की रोकथाम के लिए संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, तंबाकू और शराब से परहेज़, वज़न पर नियंत्रण और समय-समय पर ब्लड प्रेशर व ब्लड ग्लूकोज़ की जाँच जैसी आदतें जोखिम को उल्लेखनीय रूप से कम कर सकती हैं। विशेषज्ञ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि नियमित स्वास्थ्य जाँच से रोग की शुरुआती पहचान संभव है, जो उपचार को अधिक प्रभावी और कम खर्चीला बनाती है। यदि व्यक्तिगत और नीतिगत दोनों स्तरों पर सक्रिय कदम उठाए जाएँ, तो भारत में एनसीडी के बढ़ते बोझ को काफी हद तक थामा जा सकता है।