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टीबी का सबसे ज़्यादा खतरा किसे? एचआईवी, डायबिटीज और कुपोषण पीड़ितों पर विशेष ध्यान ज़रूरी

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टीबी का सबसे ज़्यादा खतरा किसे? एचआईवी, डायबिटीज और कुपोषण पीड़ितों पर विशेष ध्यान ज़रूरी

सारांश

टीबी सिर्फ गरीबी की बीमारी नहीं — एचआईवी, डायबिटीज, कुपोषण और बुढ़ापा इसे किसी के लिए भी खतरनाक बना सकते हैं। NHM ने स्पष्ट किया है कि कौन से वर्ग सबसे संवेदनशील हैं और समय पर जाँच क्यों जीवन बचा सकती है।

मुख्य बातें

नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) ने टीबी के उच्च-जोखिम वर्गों की पहचान कर नियमित स्क्रीनिंग की सलाह दी है।
एचआईवी पीड़ित, डायबिटीज मरीज़ और कुपोषित व्यक्ति टीबी के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं।
60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों और दीर्घकालिक धूम्रपान/शराब सेवन करने वालों में भी जोखिम उल्लेखनीय रूप से अधिक है।
पिछले 5 वर्षों में टीबी से ठीक हुए मरीज़ों में पुनः संक्रमण का खतरा बना रहता है।
दो सप्ताह से अधिक खाँसी, बुखार, रात में पसीना और वज़न घटना — ये लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
टीबी पूरी तरह ठीक होने वाली बीमारी है, बशर्ते समय पर पहचान और पूरा इलाज सुनिश्चित हो।

तपेदिक (टीबी) भारत की सबसे गंभीर संक्रामक बीमारियों में से एक बनी हुई है, जो मुख्य रूप से फेफड़ों पर हमला करती है। नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) के अनुसार, कुछ विशेष वर्गों के लोगों में यह संक्रमण सामान्य आबादी की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से फैलता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इन उच्च-जोखिम समूहों में समय पर जाँच और सतर्कता से टीबी को शुरुआती चरण में ही रोका जा सकता है।

उच्च-जोखिम वर्ग: कौन हैं सबसे अधिक संवेदनशील

NHM ने उन समूहों की पहचान की है जिनमें टीबी संक्रमण का खतरा असामान्य रूप से अधिक होता है। एचआईवी (HIV) से पीड़ित व्यक्तियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता गंभीर रूप से कमज़ोर होती है, जिससे टीबी उनके लिए जानलेवा साबित हो सकती है। इसी तरह, डायबिटीज के मरीज़ों में रक्त शर्करा अनियंत्रित रहने पर टीबी बैक्टीरिया के पनपने का जोखिम बढ़ जाता है।

कुपोषण से जूझ रहे लोगों में शरीर में पोषक तत्वों की कमी और कमज़ोर इम्युनिटी के कारण संक्रमण आसानी से पाँव पसार सकता है। यह ऐसे समय में और भी चिंताजनक है जब भारत में कुपोषण की दर अभी भी उल्लेखनीय बनी हुई है।

संपर्क और पर्यावरणीय जोखिम

जो व्यक्ति किसी सक्रिय टीबी मरीज़ के निकट संपर्क में रहते हैं — चाहे वह घर हो या कार्यस्थल — उनमें संक्रमण की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। भीड़भाड़ वाले स्थानों जैसे जेल, अनाथालय, वृद्धाश्रम और स्लम क्षेत्रों में खराब वायु-संचार और स्वच्छता की कमी टीबी के प्रसार को और आसान बना देती है।

गौरतलब है कि पिछले पाँच वर्षों में टीबी से ठीक हो चुके मरीज़ों में भी पुनः संक्रमण का खतरा बना रहता है, इसलिए उनकी नियमित निगरानी उतनी ही ज़रूरी है।

उम्र और जीवनशैली से जुड़े जोखिम

60 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों में बढ़ती उम्र के साथ प्राकृतिक रूप से रोग प्रतिरोधक क्षमता घटती है, जिससे वे टीबी के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। लंबे समय से धूम्रपान या शराब का सेवन करने वाले लोगों में फेफड़े कमज़ोर पड़ते हैं और इम्युनिटी भी प्रभावित होती है — दोनों मिलकर टीबी के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनाते हैं।

लक्षण पहचानें, तुरंत डॉक्टर से मिलें

NHM के अनुसार, इन उच्च-जोखिम वर्गों में निम्नलिखित लक्षण दिखते ही तत्काल चिकित्सीय परामर्श लेना चाहिए: दो सप्ताह से अधिक खाँसी, लगातार बुखार, अचानक वज़न घटना, रात में अत्यधिक पसीना आना और असामान्य थकान। ये लक्षण एकत्र रूप में टीबी का संकेत हो सकते हैं।

बचाव और सावधानियाँ

विशेषज्ञों के अनुसार, उच्च-जोखिम वर्गों को नियमित स्वास्थ्य जाँच कराना, पौष्टिक आहार लेना और धूम्रपान व शराब से परहेज़ करना आवश्यक है। टीबी मरीज़ के संपर्क में आने पर डॉक्टर की सलाह पर निवारक दवा शुरू की जा सकती है। स्वच्छता और हवादार वातावरण में रहना भी संक्रमण की रोकथाम में सहायक है।

टीबी पूरी तरह ठीक होने वाली बीमारी है — बशर्ते इसकी पहचान समय पर हो और इलाज का पूरा कोर्स पूरा किया जाए।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि NHM का यह डेटा बताता है कि मध्यम वर्ग के डायबिटीज मरीज़ और बुज़ुर्ग भी समान रूप से जोखिम में हैं। भारत दुनिया में सबसे अधिक टीबी बोझ वाला देश है, फिर भी उच्च-जोखिम वर्गों में नियमित स्क्रीनिंग की दर अभी भी बेहद कम है। असली सवाल यह है कि जागरूकता अभियान क्या वाकई उन तक पहुँच रहे हैं जिन्हें सबसे ज़्यादा ज़रूरत है — या सिर्फ उन्हीं तक जो पहले से स्वास्थ्य-सचेत हैं।
RashtraPress
23 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

टीबी का सबसे ज़्यादा खतरा किन लोगों को होता है?
NHM के अनुसार, एचआईवी पीड़ित, डायबिटीज मरीज़, कुपोषित व्यक्ति, 60 वर्ष से अधिक आयु के लोग, टीबी मरीज़ के निकट संपर्क में रहने वाले और भीड़भाड़ वाले स्थानों पर रहने वाले लोग सबसे अधिक जोखिम में हैं। दीर्घकालिक धूम्रपान या शराब सेवन भी इस खतरे को बढ़ाता है।
टीबी के शुरुआती लक्षण क्या हैं?
दो सप्ताह से अधिक समय तक खाँसी, लगातार बुखार, अचानक वज़न घटना, रात में अत्यधिक पसीना आना और असामान्य थकान टीबी के प्रमुख शुरुआती लक्षण हैं। इनमें से कोई भी लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
क्या टीबी से ठीक हो चुके मरीज़ों को दोबारा खतरा होता है?
हाँ, पिछले पाँच वर्षों में टीबी से ठीक हो चुके मरीज़ों में पुनः संक्रमण का जोखिम बना रहता है। इसीलिए NHM ऐसे मरीज़ों को नियमित जाँच और सतर्कता बरतने की सलाह देता है।
टीबी से बचाव के लिए क्या करें?
नियमित स्वास्थ्य जाँच, पौष्टिक आहार, धूम्रपान और शराब से परहेज़, तथा स्वच्छता का ध्यान रखना टीबी से बचाव के मुख्य उपाय हैं। टीबी मरीज़ के संपर्क में आने पर डॉक्टर की सलाह से निवारक दवा भी ली जा सकती है।
क्या टीबी पूरी तरह ठीक हो सकती है?
हाँ, टीबी पूरी तरह ठीक होने वाली बीमारी है, बशर्ते समय पर पहचान हो और इलाज का पूरा कोर्स पूरा किया जाए। विशेषज्ञों के अनुसार, अधूरा इलाज दवा-प्रतिरोधी टीबी (Drug-Resistant TB) का कारण बन सकता है, जो अधिक जटिल होती है।
राष्ट्र प्रेस
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