ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन से 7 प्रसूताओं की मौत: निर्माता कंपनी का लाइसेंस रद्द, WHO ने भारत से माँगी रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
राजस्थान में प्रसव के दौरान या बाद में सात महिलाओं की संदिग्ध मौत का मामला अब राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट बन चुका है। जाँच में अमृतसर स्थित एम/एस जैक्सन लेबोरेट्रीज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा निर्मित 'टोसिन' ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन (5 एमएल) की गुणवत्ता निर्धारित मानकों के अनुरूप न पाए जाने के बाद केंद्र सरकार ने कंपनी का मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस रद्द कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी भारत सरकार से इस पूरे प्रकरण पर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।
दोषपूर्ण इंजेक्शन की पहचान कैसे हुई
राजस्थान ड्रग कंट्रोल विभाग की प्रयोगशाला जाँच में सामने आया कि 'टोसिन' इंजेक्शन में निर्धारित मात्रा में सक्रिय तत्व ऑक्सीटोसिन मौजूद नहीं था। इस रिपोर्ट के आधार पर केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने पंजाब और हिमाचल प्रदेश स्थित कंपनी के विनिर्माण संयंत्रों का निरीक्षण किया। निरीक्षण के बाद लाइसेंस रद्द करने की सिफारिश की गई, जिसे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्वीकार कर लिया।
सात मृत महिलाओं का विवरण
जाँच के दायरे में आई सातों महिलाओं की मौतें मई और जून 2026 के बीच हुईं। पायल (5 मई, न्यू मेडिकल हॉस्पिटल, कोटा), ज्योति (7 मई), प्रिया महावर (9 मई, जे.के. लोन अस्पताल, कोटा), पिंकी महावर (10 मई), शिरीन (17 मई, न्यू मेडिकल हॉस्पिटल, कोटा), प्रीति (19 जून, पीबीएम अस्पताल, बीकानेर) और शारदा नायक (21 जून, पीबीएम अस्पताल, बीकानेर) — इन सभी को प्रसव के दौरान संदिग्ध 'टोसिन' इंजेक्शन दिया गया था। जाँच एजेंसियाँ अभी यह निर्धारित करने में जुटी हैं कि इन मौतों का सीधा संबंध दोषपूर्ण इंजेक्शन से था या नहीं।
WHO की चिंता और केंद्र की सक्रियता
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत से जानकारी माँगी है कि क्या इस प्रकार की घटनाएँ देश के अन्य हिस्सों में भी हुई हैं और दोषपूर्ण दवाओं की आपूर्ति किन-किन राज्यों तक पहुँची। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने राजस्थान सरकार से पूरे मामले की विस्तृत तथ्यात्मक रिपोर्ट भी तलब की है। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में दवा गुणवत्ता निगरानी प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।
ऑक्सीटोसिन क्यों है इतना महत्वपूर्ण
ऑक्सीटोसिन मातृ स्वास्थ्य सेवाओं में सबसे अनिवार्य जीवनरक्षक दवाओं में से एक मानी जाती है। इसका उपयोग प्रसव पीड़ा प्रेरित करने, प्रसवोत्तर अत्यधिक रक्तस्राव रोकने और गर्भाशय को संकुचित करने के लिए किया जाता है। गौरतलब है कि इस दवा की गुणवत्ता में कोई भी कमी माँ और नवजात शिशु, दोनों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है।
आगे की जाँच का दायरा
जाँच एजेंसियाँ अब दवा की सप्लाई चेन, विभिन्न बैचों के वितरण रिकॉर्ड और अस्पतालों की खरीद प्रणाली की भी पड़ताल कर रही हैं। उद्देश्य यह है कि भविष्य में ऐसी त्रासदी की पुनरावृत्ति रोकने के लिए दवा गुणवत्ता निगरानी तंत्र को और सुदृढ़ बनाया जाए। इस मामले का परिणाम भारत की दवा नियामक व्यवस्था में बड़े सुधारों की नींव रख सकता है।