जोधपुर सी-सेक्शन जटिलताएं: 8 महिलाएं प्रभावित, 25 दवाएं निलंबित, एम्स करेगा स्वतंत्र जांच
सारांश
मुख्य बातें
राजस्थान के जोधपुर स्थित पाओटा जिला अस्पताल में 20 जून 2026 को सिजेरियन डिलीवरी के बाद आठ महिलाओं में गंभीर जटिलताएं उत्पन्न हो गईं, जिसके बाद स्वास्थ्य अधिकारियों ने 25 दवाओं और एक इंजेक्शन के उपयोग पर तत्काल रोक लगा दी है। मामले की गंभीरता को देखते हुए एम्स की एक विशेष टीम इस घटना की स्वतंत्र जांच करेगी।
क्या हुआ उस दिन
20 जून को पाओटा जिला अस्पताल में सिजेरियन डिलीवरी कराने वाली कई महिलाओं में सर्जरी के तुरंत बाद गंभीर लक्षण उभरे। पीड़ित परिवारों के अनुसार, मरीजों को अत्यधिक रक्तस्राव और मूत्र में असामान्य कमी जैसी जटिलताओं का सामना करना पड़ा, जिसके चलते आपातकालीन चिकित्सा सहायता बुलानी पड़ी।
अस्पताल के अधिकारियों के अनुसार, प्रभावित महिलाओं को सर्जरी से पहले और बाद में सोडियम लैक्टेट आईवी फ्लूइड दिया गया था। यह बैच घटना से लगभग एक सप्ताह पहले अस्पताल में आया था और कथित तौर पर पहली बार उपयोग में लाया जा रहा था।
प्रशासन की तत्काल कार्रवाई
जिला कलेक्टर आलोक रंजन ने अस्पताल के दवा भंडार का दौरा किया और वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ आपात समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। बैठक में डॉ. एस.एन. मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. बी.एस. जोधा, पाओटा जिला अस्पताल के पीएमओ डॉ. कुलबीर चोपड़ा, एमडीएम अस्पताल के अधीक्षक डॉ. विकास राजपुरोहित और सीएमएचओ डॉ. एस.एस. शेखावत उपस्थित रहे।
चिकित्सा विभाग ने प्रभावित मामलों में उपयोग की गई सभी दवाओं और उपभोग्य सामग्रियों के नमूने प्रयोगशाला परीक्षण के लिए भेज दिए हैं। जांच रिपोर्ट आने तक 25 दवाओं और एक इंजेक्शन बैच के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लागू कर दिया गया है।
मरीजों की वर्तमान स्थिति
अस्पताल अधिकारियों के अनुसार, प्रभावित आठ में से छह महिलाओं की हालत फिलहाल स्थिर है और उनमें सुधार के संकेत मिल रहे हैं। हालांकि, ललिता और सोनल नाम की दो मरीजों में गुर्दे की गंभीर खराबी विकसित हो गई और उन्हें डायलिसिस की आवश्यकता पड़ी। दोनों को विशेष देखभाल के लिए एम्स रेफर किया गया है।
डॉ. कुलबीर चोपड़ा ने स्पष्ट किया कि सोडियम लैक्टेट आईवी फ्लूइड सिजेरियन डिलीवरी में एक मानक प्रक्रिया है और अन्य सभी दवाएं व उपचार प्रोटोकॉल सामान्य थे।
परिजनों की मांग और अस्पताल पर असर
पीड़ित महिलाओं के परिजनों ने घटना की गहन और निष्पक्ष जांच की माँग की है। उनका आरोप है कि प्रसव के तुरंत बाद मरीजों की स्थिति तेजी से बिगड़ी, जो सामान्य प्रसव जटिलताओं से भिन्न थी।
यह ऐसे समय में आया है जब राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में दवा गुणवत्ता को लेकर पहले से सवाल उठते रहे हैं। गौरतलब है कि यह घटना सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र में आपूर्ति-श्रृंखला निगरानी की कमजोरियों को उजागर करती है।
आगे क्या होगा
पाओटा जिला अस्पताल में सभी सर्जिकल प्रक्रियाएं तब तक निलंबित रहेंगी, जब तक दवाओं, उपभोग्य सामग्रियों और ऑपरेशन थिएटर के वातावरण से संबंधित रिपोर्ट प्राप्त नहीं हो जाती। सर्जरी की ज़रूरत वाले मरीजों को माथुरदास माथुर अस्पताल भेजा जा रहा है। एम्स की स्वतंत्र जांच टीम और मेडिकल कॉलेज स्तरीय जांच के निष्कर्ष यह तय करेंगे कि जटिलताओं का वास्तविक कारण दवा की गुणवत्ता थी या कोई और कारक।