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11वें राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस पर जानें बृहत्त्रयी — चरक, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय का महत्व

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11वें राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस पर जानें बृहत्त्रयी — चरक, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय का महत्व

सारांश

11वें राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस पर बृहत्त्रयी — चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय — की विरासत पर विशेष नज़र। ये तीनों ग्रंथ हज़ारों वर्षों की चिकित्सा बुद्धि का संग्रह हैं और आज वैश्विक स्वास्थ्य चर्चा में फिर से केंद्र में आ रहे हैं।

मुख्य बातें

11वाँ राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस 23 सितंबर 2026 को मनाया जा रहा है।
चरक संहिता में 8 स्थान और 120 अध्याय हैं; आचार्य दृढ़बल ने विलुप्त एक-तिहाई भाग को पुनर्लिखित किया।
सुश्रुत संहिता मूलतः 120 अध्यायों की थी; नागार्जुन द्वारा उत्तरतंत्र जोड़ने के बाद अब 186 अध्याय हैं।
महर्षि सुश्रुत को आधुनिक शल्यचिकित्सक भी 'शल्य चिकित्सा का जनक' मानते हैं।
अष्टांग हृदय के रचयिता आचार्य वाग्भट हैं; इसमें 120 अध्याय छह खंडों में हैं।
अष्टांग आयुर्वेद के 8 अंग हैं — काया चिकित्सा से लेकर वाजीकरण तक।

11वाँ राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस बुधवार, 23 सितंबर 2026 को नई दिल्ली सहित पूरे भारत में मनाया जा रहा है। इस अवसर पर आयुर्वेद के तीन मूल स्तंभों — चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय — जिन्हें सामूहिक रूप से बृहत्त्रयी कहा जाता है, की प्रासंगिकता को समझना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। आयुर्वेद की परंपरा में इन तीनों ग्रंथों को सर्वाधिक प्रामाणिक और सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

चरक संहिता: चिकित्सा विज्ञान का आदिग्रंथ

चरक संहिता की रचना-यात्रा अत्यंत रोचक है। इसका मूल बीज महर्षि पुनर्वसु आत्रेय के उपदेशों में है, जिन्हें उनके शिष्य अग्निवेश ने 'अग्निवेश तंत्र' के रूप में लिपिबद्ध किया। कालांतर में आचार्य चरक ने इस ग्रंथ का व्यापक संपादन एवं परिमार्जन किया, और तभी से यह 'चरक संहिता' के नाम से विख्यात हुआ।

समय के प्रवाह में इस ग्रंथ का एक-तिहाई (1/3) भाग विलुप्त हो गया था। बाद में आचार्य दृढ़बल ने उस खोए हुए अंश को पुनः लिखकर ग्रंथ को पूर्णता प्रदान की। आयुर्वेद में कहा गया है — 'चरकस्तु चिकित्सिते श्रेष्ठ:' अर्थात चिकित्सा के क्षेत्र में चरक सर्वश्रेष्ठ हैं।

यह ग्रंथ 8 स्थानों और 120 अध्यायों में विभाजित है — सूत्रस्थान (30), निदानस्थान (8), विमानस्थान (8), शारीरस्थान (8), इन्द्रियस्थान (12), चिकित्सास्थान (30), कल्पस्थान (12) और सिद्धिस्थान (12)। सूत्रस्थान में स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य-रक्षण और रोगी के उपचार के मूलभूत सिद्धांत समाहित हैं, जबकि शारीरस्थान सत्व, आत्मा और शरीर के परस्पर संबंध को परिभाषित करता है।

चरक का एक प्रसिद्ध सिद्धांत है कि शमन चिकित्सा से दबाया गया रोग पुनः लौट सकता है, किंतु संशोधन अर्थात पंचकर्म से नष्ट रोग दोबारा उत्पन्न नहीं होता — 'जिता संशोधनैर्ये तु न तेषां पुनरुद्भव:'।

सुश्रुत संहिता: शल्य चिकित्सा का आधारग्रंथ

सुश्रुत संहिता को शल्य चिकित्सा (सर्जरी) का मूल एवं प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। काशीराज दिवोदास धन्वंतरि के उपदेशों को उनके योग्य शिष्य और विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत ने इस ग्रंथ में संकलित किया। पाँचवीं शताब्दी में नागार्जुन ने इसमें 'उत्तरतंत्र' जोड़कर इसका संशोधन किया।

आधुनिक शल्यचिकित्सक भी महर्षि सुश्रुत को 'शल्य चिकित्सा का जनक' स्वीकार करते हैं। मूलतः यह ग्रंथ 5 स्थानों और 120 अध्यायों में था — सूत्रस्थान (46), निदानस्थान (16), शारीरस्थान (10), चिकित्सास्थान (40), कल्पस्थान (8)। उत्तरतंत्र के 66 अध्याय जुड़ने के बाद अब इसमें कुल 186 अध्याय हैं।

इसमें अष्टविध शल्यकर्म, यंत्र, शस्त्र, क्षारकर्म, अग्निकर्म, जलौकावचारण, कर्णव्यध और व्रणबंधन जैसे शल्य सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन है। शारीरस्थान में मर्मशारीर का विवरण आधुनिक विज्ञान के लिए भी कौतूहल का विषय बना हुआ है। इसीलिए आयुर्वेद में कहा गया — 'शारीरे सुश्रुत: श्रेष्ठ:'। डल्हण की 'निबन्धसंग्रह' टीका इस पर सर्वाधिक लोकप्रिय व्याख्या मानी जाती है।

अष्टांग हृदय: आयुर्वेद का सार-संग्रह

अष्टांग हृदय को आयुर्वेद का सार कहा जाता है। इसकी रचना सिंहगुप्त के पुत्र आचार्य वाग्भट ने की। इसमें 120 अध्याय छह खंडों में विभाजित हैं। वाग्भट स्वयं इसे उस हृदय की उपमा देते हैं जो शरीर का केंद्र है — ठीक वैसे ही यह ग्रंथ आयुर्वेद के आठों अंगों का केंद्रबिंदु है।

आचार्य वाग्भट के अनुसार, आयुर्वेद रूपी सागर को मंथने से 'अष्टांग संग्रह' रूपी अमृत प्राप्त हुआ और उसी से अष्टांग हृदय की उत्पत्ति हुई। यह ग्रंथ बिखरे हुए ज्ञान को एक सूत्र में पिरोता है — ठीक वैसे जैसे भिन्न-भिन्न खेतों से जौ एकत्र कर एक ढेर बनाया जाता है।

अष्टांग आयुर्वेद के आठ अंग हैं: काया चिकित्सा, शल्य तंत्र, शालाक्य तंत्र (नेत्र, नासिका, कर्ण, कंठ), कौमारभृत्य (बाल रोग), अगदतंत्र (विष विज्ञान), भूत विद्या (मनोचिकित्सा), रसायन (कायाकल्प) और वाजीकरण

आज की दुनिया में बृहत्त्रयी की प्रासंगिकता

गौरतलब है कि जब वैश्विक स्वास्थ्य समुदाय पुनः पारंपरिक और समग्र चिकित्सा पद्धतियों की ओर उन्मुख हो रहा है, बृहत्त्रयी का अध्ययन केवल चिकित्सकों तक सीमित नहीं रहा। यह प्रत्येक भारतीय के लिए अपनी वैज्ञानिक विरासत को पहचानने का माध्यम बन रहा है। 11वाँ राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस इस ज्ञान-परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का एक सशक्त अवसर है, और आने वाले वर्षों में इन ग्रंथों पर आधारित अनुसंधान को और अधिक बल मिलने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि इन ग्रंथों का आधुनिक चिकित्सा अनुसंधान में कितना व्यवस्थित उपयोग हो रहा है। पंचकर्म और शल्य के सिद्धांत सहस्राब्दियों पुराने हैं, फिर भी उनका peer-reviewed साक्ष्य-आधार अभी भी सीमित है। जब तक बृहत्त्रयी को केवल सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक माना जाता रहेगा और उस पर नियंत्रित नैदानिक परीक्षण नहीं होंगे, तब तक वैश्विक स्वास्थ्य मंच पर आयुर्वेद की स्वीकार्यता सीमित रहेगी। राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस को उत्सव से आगे बढ़कर शोध-निवेश के संकल्प का दिन बनाना होगा।
RashtraPress
23 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बृहत्त्रयी क्या है और आयुर्वेद में इसका क्या महत्व है?
बृहत्त्रयी आयुर्वेद के तीन सर्वोच्च प्रामाणिक ग्रंथों — चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय — का सामूहिक नाम है। इन्हें आयुर्वेद की संपूर्ण चिकित्सा-विधि, शल्यकला और जीवनशैली विज्ञान का आधार माना जाता है।
चरक संहिता में कितने अध्याय हैं और इसकी रचना किसने की?
चरक संहिता में 8 स्थान और 120 अध्याय हैं। मूलतः महर्षि पुनर्वसु आत्रेय के उपदेश उनके शिष्य अग्निवेश ने लिखे, जिन्हें बाद में आचार्य चरक ने संपादित किया। विलुप्त एक-तिहाई भाग को आचार्य दृढ़बल ने पुनर्लिखित किया।
महर्षि सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का जनक क्यों कहा जाता है?
सुश्रुत संहिता में अष्टविध शल्यकर्म, शस्त्र, यंत्र, क्षारकर्म, अग्निकर्म और व्रणबंधन जैसी उन्नत सर्जिकल तकनीकों का विस्तृत वर्णन है, जो आधुनिक शल्यचिकित्सा के कई सिद्धांतों से मेल खाते हैं। इसीलिए आधुनिक सर्जन भी महर्षि सुश्रुत को 'शल्य चिकित्सा का जनक' मानते हैं।
अष्टांग हृदय के रचयिता कौन हैं और इसमें क्या है?
अष्टांग हृदय के रचयिता सिंहगुप्त के पुत्र आचार्य वाग्भट हैं। इसमें 120 अध्याय छह खंडों में हैं, जो आयुर्वेद के आठों अंगों — काया चिकित्सा, शल्य तंत्र, शालाक्य तंत्र, कौमारभृत्य, अगदतंत्र, भूत विद्या, रसायन और वाजीकरण — का सार एक स्थान पर प्रस्तुत करते हैं।
11वाँ राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस कब और क्यों मनाया जाता है?
11वाँ राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस 23 सितंबर 2026 को मनाया जा रहा है। यह दिन आयुर्वेद की प्राचीन चिकित्सा विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाने और बृहत्त्रयी जैसे मूल ग्रंथों के अध्ययन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष मनाया जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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