आयुर्वेद दिवस 2026: डॉ. एलके शर्मा बोले — रोग का मूल नष्ट करता है आयुर्वेद, एलोपैथी सिर्फ लक्षण दबाती है
सारांश
मुख्य बातें
आयुर्वेद दिवस के अवसर पर ग्वालियर के राजकीय आयुर्वेद कॉलेज के विभागाध्यक्ष डॉ. एलके शर्मा ने स्पष्ट किया कि आयुर्वेद को 'धीमी चिकित्सा' कहने की धारणा वैज्ञानिक रूप से त्रुटिपूर्ण है और ऐतिहासिक दृष्टि से प्रायोजित है। उनके अनुसार, आयुर्वेद केवल रोगोपचार की विधा नहीं, बल्कि मानव जीवन का संपूर्ण और शाश्वत विज्ञान है। 23 सितंबर 2026 को मनाए जा रहे आयुर्वेद दिवस पर विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक दुनिया जब दुष्प्रभावयुक्त दवाओं की जकड़न से मुक्ति खोज रही है, तो योग और आयुर्वेद स्वाभाविक रूप से वैश्विक प्राथमिकता बन रहे हैं।
आयुर्वेद धीमा नहीं — भ्रांति है यह धारणा
डॉ. एलके शर्मा के अनुसार, ब्रिटिश औपनिवेशिक काल से पूर्व संपूर्ण भारत और विश्व के कई भागों में आयुर्वेद ही स्वास्थ्य संरक्षण का मूल आधार था। पेट्रो-केमिकल आधारित आधुनिक फार्मा उद्योग के प्रसार के दौरान यह नैरेटिव गढ़ा गया कि पारंपरिक चिकित्सा का असर धीमा होता है। उनका कहना है कि एलोपैथी प्रायः केवल लक्षणों को दबाने का त्वरित काम करती है, जिसे लोग 'तत्काल आराम' समझ लेते हैं, जबकि आयुर्वेद रोग के मूल कारक को समाप्त करने पर केंद्रित है।
मानव शरीर कोई निर्जीव मशीन नहीं है। मधुमेह, गठिया (आमवात), दमा, त्वचा विकार, यकृत और गुर्दे के रोगों में शरीर को पुनः प्राकृतिक संतुलन में लौटने में समय लगता है। डॉ. शर्मा बताते हैं कि आधुनिक चिकित्सा में कई विकारों में आजीवन दवाएं लेनी पड़ती हैं और उनके दुष्प्रभावों से नए रोग जन्म लेते हैं, जबकि आयुर्वेद बिना किसी साइड-इफेक्ट के रोग का स्थायी समाधान देने में सक्षम है।
जटिल रोगों में आयुर्वेद की कार्यप्रणाली
डॉ. शर्मा के अनुसार, आधुनिक चिकित्सा 'सिंगल मॉलिक्यूल' (एकल अणु) आधारित दृष्टिकोण पर काम करती है, जबकि आयुर्वेद का आधार 'पंचभौतिक सिद्धांत' (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) है। आयुर्वेद में प्रत्येक मरीज का उपचार पूरी तरह 'व्यक्तिशः' यानी पर्सनलाइज्ड होता है — जिसमें रोगी की प्रकृति, मानसिक बल (सत्व), अनुकूलता (सात्म्य) और शारीरिक शक्ति का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाता है।
हेपेटाइटिस, फैटी लिवर, गंभीर चर्म रोग और मेटाबॉलिक विकारों में आयुर्वेद की हर्बो-मिनरल (काष्ठौषधि एवं रसौषधि) संरचनाओं ने बार-बार यह सिद्ध किया है कि यह रोग को केवल दबाता नहीं, बल्कि धातु स्तर पर जाकर विकृति को समूल नष्ट करने का सामर्थ्य रखता है। गौरतलब है कि जहाँ एलोपैथी हाथ खड़े कर देती है या केवल रोग प्रबंधन की बात करती है, वहाँ आयुर्वेद के पास व्यापक उपचार-विधान उपलब्ध है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और आज का परिदृश्य
डॉ. शर्मा बताते हैं कि वैदिक और पौराणिक काल से आयुर्वेद समाज को रोगमुक्त करता आया है। पराधीनता के दौर में भारतीय संस्कृति के साथ-साथ इस ऋषि-परंपरा को सुनियोजित ढंग से हाशिए पर धकेला गया। स्वतंत्रता के बाद भी तात्कालिक नीतियों ने इसी ढर्रे को जारी रखा, जिससे अपनी ही भूमि पर यह 'अमृत तुल्य विज्ञान' 'वैकल्पिक चिकित्सा' बनकर रह गया।
यह ऐसे समय में आया है जब आधुनिक विज्ञान स्वयं प्रिवेंटिव हेल्थकेयर और होलिस्टिक वेलनेस की ओर बढ़ रहा है। डॉ. शर्मा के अनुसार, आपातकालीन सर्जिकल हस्तक्षेप को छोड़कर जीवनशैली-जन्य अधिकांश विकारों और प्राथमिक स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद को पहली पसंद बनाना न केवल व्यावहारिक है बल्कि मानव स्वास्थ्य के दीर्घकालिक हित में भी है।
स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी है आयुर्वेद का विधान
महर्षि चरक का सूत्र उद्धृत करते हुए डॉ. शर्मा कहते हैं — 'स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्, आतुरस्य विकार प्रशमनम् च' — अर्थात स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा पहली प्राथमिकता है और रोगी के विकार को शांत करना दूसरा उद्देश्य है। चरक और सुश्रुत संहिता के आरंभिक अध्यायों में दिनचर्या (दैनिक अनुशासन), ऋतुचर्या (ऋतु के अनुसार आचरण) और रात्रिचर्या का विशद वर्णन मिलता है। ब्रह्म मुहूर्त में जागरण, उषःपान, अभ्यंग (मालिश) और मौसमी बदलावों के अनुरूप जीवनशैली अपनाने से रोग की आशंका कम होती है।
आहार और विहार — आयुर्वेद के मूल स्तंभ
डॉ. शर्मा के अनुसार, आयुर्वेद केवल चूर्ण या काढ़े तक सीमित नहीं है। इसका मूल आधार 'आहार और विहार' है। आयुर्वेद में भोजन को ही 'महाभेषज' (सर्वश्रेष्ठ औषधि) माना गया है। आचार्यों ने प्रकृति से प्राप्त अन्न-जल को जलवर्ग, शूकधान्य वर्ग, शमीधान्य वर्ग और शाक व फल वर्ग में विभाजित किया है। 'विहार' के अंतर्गत अष्टांग योग और मानसिक गुणों का समावेश है।
आयुर्वेद के अनुसार स्वास्थ्य केवल अंगों की क्रियाशीलता नहीं, बल्कि त्रिदोष (शारीरिक) और त्रिगुण (मानसिक) की समरसता है। जब मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुसार आहार ग्रहण करता है और योग तथा प्राणायाम द्वारा मानसिक सत्व को बढ़ाता है, तब वह वास्तविक आरोग्य का अनुभव करता है। दोषों का विषम होना ही रोग है और उनका सम होना ही आरोग्य — यही आयुर्वेद की मौलिक दृष्टि है। आने वाले समय में यदि नीति-निर्माता इस ज्ञान-परंपरा को मुख्यधारा में स्थापित करने की दिशा में ठोस कदम उठाएं, तो भारत वैश्विक स्वास्थ्य नेतृत्व में नई भूमिका निभा सकता है।