त्रिपुरा में AGMC और GBP के डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस बंद, 20% वेतन वृद्धि का ऐलान
सारांश
मुख्य बातें
त्रिपुरा सरकार ने 24 जून 2026 को एक अहम नीतिगत निर्णय लेते हुए अगरतला गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज (AGMC) और गोविन्द बल्लभ पंत (GBP) अस्पताल से जुड़े सभी फैकल्टी सदस्यों और मेडिकल अधिकारियों की निजी प्रैक्टिस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। मुख्यमंत्री माणिक साहा की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में यह प्रस्ताव मंजूर किया गया, जिसमें डॉक्टरों को क्षतिपूर्ति के रूप में मूल वेतन में 20 प्रतिशत की वृद्धि नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस के तौर पर देने का भी फैसला किया गया।
मुख्य घटनाक्रम
सरकार के प्रवक्ता और खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री सुशांत चौधरी ने कैबिनेट के फैसले की जानकारी देते हुए बताया कि AGMC और GBP अस्पताल में कार्यरत करीब 350 फैकल्टी सदस्य और मेडिकल अधिकारी अब निजी प्रैक्टिस नहीं कर सकेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस फैसले की विस्तृत अधिसूचना शीघ्र जारी की जाएगी।
गौरतलब है कि GBP अस्पताल त्रिपुरा का सबसे बड़ा और पुराना रेफरल अस्पताल है। यह निर्णय डॉक्टर संगठनों और अन्य हितधारकों के साथ विस्तृत विचार-विमर्श के बाद लिया गया बताया जा रहा है।
सरकार का उद्देश्य
मंत्री सुशांत चौधरी ने मुख्यमंत्री के हवाले से कहा कि आधुनिक उपकरणों और बेहतर बुनियादी ढाँचे के बावजूद मरीजों की सेवाओं को लेकर शिकायतें लगातार मिलती रही हैं। सरकार का लक्ष्य राज्य के प्रमुख मेडिकल संस्थान में जवाबदेही बढ़ाना और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार लाना है।
यह नीति फिलहाल केवल AGMC और GBP अस्पताल तक सीमित रहेगी। सरकार ने संकेत दिया है कि इसके प्रभाव की समीक्षा के बाद इसे अन्य सरकारी अस्पतालों में भी लागू किया जा सकता है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
कांग्रेस नेता और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सुधिप रॉय बर्मन ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि इस प्रतिबंध के चलते कई अनुभवी डॉक्टर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का रास्ता चुन सकते हैं, ताकि वे निजी प्रैक्टिस जारी रख सकें।
रॉय बर्मन ने चेतावनी दी कि इससे AGMC में मेडिकल शिक्षा और मरीजों की देखभाल दोनों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। उन्होंने राज्य सरकार से अनुरोध किया है कि अधिसूचना जारी करने से पहले इस निर्णय पर पुनर्विचार किया जाए।
आम जनता पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब त्रिपुरा जैसे छोटे राज्यों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की पहले से कमी है। यदि अनुभवी फैकल्टी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेती है, तो इसका सीधा असर AGMC में पढ़ने वाले मेडिकल छात्रों और दूरदराज से इलाज के लिए आने वाले मरीजों पर पड़ सकता है।
दूसरी ओर, समर्थकों का तर्क है कि निजी प्रैक्टिस पर रोक से सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित होगी और सरकारी स्वास्थ्य सेवाएँ अधिक सुलभ बनेंगी।
आगे की राह
सरकार ने स्पष्ट किया है कि नीति की विस्तृत अधिसूचना जल्द जारी होगी। इस नीति के क्रियान्वयन और उसके दीर्घकालिक प्रभावों पर नज़र रखना महत्वपूर्ण होगा, विशेष रूप से यह देखना कि क्या 20% का नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस डॉक्टरों को संस्थान में बनाए रखने के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन साबित होता है।