बांग्लादेश की प्रेस को नैतिक साहस पुनः प्राप्त करना होगा: स्वतंत्रता सेनानी अनवर खान की चेतावनी

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बांग्लादेश की प्रेस को नैतिक साहस पुनः प्राप्त करना होगा: स्वतंत्रता सेनानी अनवर खान की चेतावनी

सारांश

बांग्लादेश के मुक्तिसंग्राम सेनानी और स्तंभकार अनवर ए. खान ने चेतावनी दी है कि देश की प्रेस सत्ता की चुप्पी में डूब गई है। 5 अगस्त 2024 के बाद मानवाधिकार उल्लंघन और अवामी लीग पर प्रतिबंध जैसे मुद्दों पर मीडिया की खामोशी लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।

Key Takeaways

  • अनवर ए. खान, 1971 के मुक्तिसंग्राम सेनानी, ने बांग्लादेशी मीडिया को सत्ता की चुप्पी तोड़ने की चेतावनी दी।
  • 5 अगस्त 2024 के बाद बांग्लादेश में मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों पर मीडिया ने खामोशी बरती, जिसे खान ने 'मौन सहभागिता' कहा।
  • बांग्लादेश संविधान के अनुच्छेद 11, 37 और 39 मौलिक अधिकारों, राजनीतिक गतिविधियों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं।
  • अवामी लीग पर प्रतिबंध को खान ने लोकतांत्रिक बहुलवाद की नींव पर सीधा प्रहार बताया।
  • खान ने कहा कि चौथा स्तंभ साहस की जगह अस्पष्टता और अति-सतर्कता में सिमट गया है।
  • बांग्लादेशी समाचार पत्रों को कठिन सवाल पूछने, असुविधाजनक तथ्य सामने रखने और सैद्धांतिक बहस के लिए मंच देने की जरूरत है।

ढाका, 23 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। बांग्लादेश की मीडिया को अब सत्ता का मुखपत्र बनने की बजाय जवाबदेही का हथियार बनना होगा। 1971 के मुक्तिसंग्राम के स्वतंत्रता सेनानी और著名 स्तंभकार अनवर ए. खान ने बांग्लादेशी अखबार 'द एशियन एज' में लिखे एक तीखे लेख में देश की पत्रकारिता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि राष्ट्रीय संकट में प्रेस केवल तमाशबीन नहीं हो सकती — वह जनता की अंतरात्मा होती है।

मानवाधिकार उल्लंघन पर मीडिया की खतरनाक चुप्पी

अनवर खान ने अपने लेख में स्पष्ट किया कि 5 अगस्त, 2024 के बाद से बांग्लादेश में मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप लगातार सामने आ रहे हैं, लेकिन मीडिया जगत में एक 'लंबी और चिंताजनक चुप्पी' पसरी हुई है। उन्होंने तर्क दिया कि यह तटस्थता नहीं, बल्कि कर्तव्य से मुंह मोड़ना है।

खान ने लिखा, "बांग्लादेश का संविधान अपने मूल स्वरूप में मौलिक अधिकारों को संजोए हुए है — ये न दिखावटी हैं, न वैकल्पिक।" उन्होंने अनुच्छेद 11 का हवाला दिया जो गणराज्य को लोकतंत्र घोषित करता है, और अनुच्छेद 39 का, जो विचार, विवेक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है।

उनके शब्दों में, "जब इन सिद्धांतों पर खतरा मंडराता हो, तो प्रेस का गंभीर कर्तव्य है कि वह प्रश्न उठाए, जांच करे और बोले। चुप रहना मौन सहभागिता में खड़े रहने के समान है।"

अवामी लीग पर प्रतिबंध — लोकतंत्र की बहुलतावादी नींव पर प्रहार

खान ने अवामी लीग पर लगाए गए प्रतिबंध को लेकर भी कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यह पार्टी बांग्लादेश की सबसे पुरानी, सबसे बड़ी और संस्थापक राजनीतिक शक्ति है। चाहे कोई उसकी नीतियों से सहमत हो या न हो, किसी प्रमुख राजनीतिक दल पर प्रतिबंध लगाना लोकतांत्रिक बहुलवाद की जड़ों पर कुल्हाड़ी चलाना है।

उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 37 का उल्लेख किया जो सभा करने और राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने के अधिकार की गारंटी देता है। खान के अनुसार, "इस अधिकार को कमजोर करना लोकतंत्र को खोखला करने के समान है।" यह बयान उस वक्त और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब बांग्लादेश में राजनीतिक संक्रमण का दौर चल रहा है।

चौथा स्तंभ — साहस की जगह अस्पष्टता में सिमटा

खान ने बांग्लादेशी समाचार पत्रों में नैतिक स्पष्टता वाले संपादकीय लेखों के अभाव और सत्ता को चुनौती देने वाली साहसिक रिपोर्टिंग की कमी पर सीधा सवाल उठाया। उनका कहना था कि जिसे 'चौथा स्तंभ' कहा जाता है, वह अत्यधिक सतर्कता और अस्पष्टता में सिमट गया है।

उन्होंने चेताया, "यह अनिच्छा एक खतरनाक मिसाल कायम करती है — सच्चाई को नरम किया जा सकता है, अन्याय को सामान्य माना जा सकता है, और सत्ता को चुनौती नहीं दी जा सकती।" यह स्थिति केवल बांग्लादेश की नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया के कई लोकतंत्रों की साझा चुनौती बन चुकी है।

संवैधानिक ढांचे की रक्षा — समाचार पत्रों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी

खान ने बांग्लादेश को एक नाजुक मोड़ पर खड़ा बताया। उनके अनुसार, बलिदान और संघर्ष से अर्जित संवैधानिक ढांचे को सतर्क संरक्षण की जरूरत है। उन्होंने समाचार पत्रों से आह्वान किया कि वे सार्वजनिक चर्चा के संरक्षक के रूप में अपना साहस पुनः प्राप्त करें।

खान के शब्दों में, "उन्हें कठिन प्रश्न पूछने होंगे, असुविधाजनक तथ्यों को सामने रखना होगा और सैद्धांतिक बहस के लिए स्थान देना होगा। इससे कम कुछ भी न केवल उनकी अपनी विश्वसनीयता को कम करेगा, बल्कि उस लोकतांत्रिक ताने-बाने को भी कमजोर करेगा जिसे बनाए रखने का दायित्व उन पर है।"

गौरतलब है कि बांग्लादेश में 2024 के राजनीतिक उथल-पुथल के बाद से मीडिया स्वतंत्रता के सूचकांकों में भी गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी बांग्लादेश में प्रेस की स्थिति पर चिंता जता चुकी हैं। आने वाले महीनों में बांग्लादेश की मीडिया किस दिशा में जाती है — यह न केवल उस देश के लोकतंत्र की, बल्कि पूरे दक्षिण एशियाई मीडिया परिदृश्य की परीक्षा होगी।

Point of View

लेकिन प्रेस की दासता बनी रहती है, बस मालिक बदल जाता है। विडंबना यह है कि जो मीडिया कभी शेख हसीना सरकार के खिलाफ आवाज नहीं उठा सका, वही अब नई सत्ता के सामने भी खामोश है — इससे साफ होता है कि समस्या किसी एक सरकार की नहीं, बल्कि संस्थागत कायरता की है। अनवर खान का लेख इसीलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे 1971 की उस पीढ़ी से हैं जिसने लोकतंत्र के लिए जान दी — उनकी चेतावनी को नजरअंदाज करना बांग्लादेश के संस्थापक आदर्शों के साथ विश्वासघात होगा।
NationPress
24/04/2026

Frequently Asked Questions

बांग्लादेश की प्रेस को नैतिक आवाज पुनः प्राप्त करने की जरूरत क्यों पड़ी?
5 अगस्त 2024 के बाद बांग्लादेश में मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोपों के बावजूद मीडिया ने चुप्पी साध ली, जिसे स्तंभकार अनवर खान ने 'मौन सहभागिता' करार दिया। उनके अनुसार यह चुप्पी तटस्थता नहीं, बल्कि पत्रकारिता के मूल कर्तव्य से पलायन है।
अनवर ए. खान कौन हैं और उन्होंने क्या लिखा?
अनवर ए. खान 1971 के बांग्लादेश मुक्तिसंग्राम के स्वतंत्रता सेनानी और वरिष्ठ स्तंभकार हैं। उन्होंने बांग्लादेशी अखबार 'द एशियन एज' में लिखा कि देश की प्रेस संवैधानिक उल्लंघनों और मानवाधिकार हनन पर साहसिक रिपोर्टिंग करने में विफल रही है।
अवामी लीग पर प्रतिबंध को लेकर क्या संवैधानिक सवाल उठे हैं?
खान के अनुसार बांग्लादेश संविधान का अनुच्छेद 37 सभा करने और राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने के अधिकार की गारंटी देता है। देश की सबसे पुरानी और संस्थापक राजनीतिक पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध इस संवैधानिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
बांग्लादेश का संविधान प्रेस की स्वतंत्रता के बारे में क्या कहता है?
बांग्लादेश संविधान का अनुच्छेद 39 विचार, विवेक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की स्पष्ट गारंटी देता है। अनुच्छेद 11 गणराज्य को लोकतंत्र घोषित करता है जिसमें मौलिक मानवाधिकार सुनिश्चित किए जाने चाहिए।
बांग्लादेश में मीडिया की चुप्पी का लोकतंत्र पर क्या असर पड़ेगा?
खान के अनुसार मीडिया की यह चुप्पी एक खतरनाक मिसाल कायम करती है जिसमें सच्चाई को नरम किया जा सकता है और सत्ता को चुनौती नहीं दी जा सकती। इससे न केवल मीडिया की विश्वसनीयता खत्म होती है, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचा भी कमजोर पड़ता है।
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