प्रियंका चतुर्वेदी का बड़ा बयान: अमेरिका-भारत व्यापार वार्ता पर सवाल, संसद में महिला आरक्षण की पुरजोर मांग
सारांश
Key Takeaways
- प्रियंका चतुर्वेदी ने 23 अप्रैल 2025 को वॉशिंगटन में हडसन इंस्टीट्यूट की न्यू इंडिया कॉन्फ्रेंस में अमेरिका-भारत व्यापार वार्ता पर सवाल उठाए।
- उन्होंने कहा कि भारत पर 18%25 टैरिफ थोपा गया और 500 बिलियन डॉलर के व्यापार लक्ष्य से किसानों व डेयरी उत्पादकों में चिंता है।
- भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर उन्होंने कहा कि तेल आयात का निर्णय भारत का अपना संप्रभु अधिकार है।
- संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 13-14%25 है, जबकि देश की 50%25 आबादी और मतदाता महिलाएं हैं।
- महिला आरक्षण विधेयक 2023 में पारित हुआ, लेकिन जनगणना और परिसीमन की शर्त के कारण लागू नहीं हो पाया — यह लड़ाई तीन दशकों से जारी है।
- चतुर्वेदी ने वैक्सीन वितरण और WTO में भारत की भूमिका का हवाला देते हुए वैश्विक समानता में भारत के नेतृत्व को रेखांकित किया।
वॉशिंगटन, 23 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। राज्यसभा की पूर्व सदस्य प्रियंका चतुर्वेदी ने गुरुवार को वॉशिंगटन में आयोजित हडसन इंस्टीट्यूट की न्यू इंडिया कॉन्फ्रेंस में अमेरिका-भारत व्यापार वार्ता को लेकर कड़े सवाल उठाए। उन्होंने टैरिफ नीति, ऊर्जा सुरक्षा और भारतीय संसद में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे अहम मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी।
टैरिफ वार्ता पर उठाए तीखे सवाल
चतुर्वेदी ने अमेरिका और भारत के बीच चल रही व्यापारिक बातचीत का जिक्र करते हुए कहा कि भारत पर 18 प्रतिशत तक टैरिफ थोपा गया और उस पर बातचीत की जा रही है। उन्होंने महत्वाकांक्षी द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्यों पर भी सवाल उठाया और पूछा कि 500 बिलियन डॉलर का यह आंकड़ा आखिर कहां से पूरा होगा।
उनका तर्क था कि इस तरह के अनुमानों ने भारतीय किसानों और डेयरी उत्पादकों के बीच गंभीर आशंकाएं पैदा कर दी हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस वार्ता में भारत की स्वायत्तता और हितों की रक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए।
ऊर्जा सुरक्षा पर भारत का स्वतंत्र निर्णय जरूरी
चतुर्वेदी ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे पर भी दो टूक बात की। उन्होंने कहा कि तेल आयात संबंधी निर्णय पूरी तरह भारत का अपना है और किसी भी बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई जब भारत पर रूसी तेल आयात को लेकर पश्चिमी देशों का दबाव बना हुआ है।
उन्होंने भारत-अमेरिका संबंधों में निरंतरता और विश्वसनीयता की जरूरत पर भी जोर दिया और कहा कि भारत ने इस रिश्ते में निवेश किया है। साथ ही उन्होंने वाशिंगटन को सलाह दी कि वह भारत पर दबाव डालने की बजाय उसकी वास्तविक चुनौतियों को समझे।
संसद में महिला आरक्षण — तीन दशकों की अधूरी लड़ाई
व्यापारिक मुद्दों के अलावा, चतुर्वेदी ने भारतीय संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि देश की 50 प्रतिशत आबादी और मतदाता महिलाएं हैं, लेकिन संसद में उनका प्रतिनिधित्व मात्र 13 से 14 प्रतिशत तक सीमित है।
महिला आरक्षण विधेयक पिछले तीन दशकों से संसद में लंबित रहा। 2023 में इसे पारित तो किया गया, लेकिन इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़ने के कारण इसका क्रियान्वयन अनिश्चितकाल के लिए टल गया है। चतुर्वेदी ने इस रणनीति की आलोचना करते हुए कहा कि इससे प्रगति जानबूझकर धीमी की जा रही है।
उन्होंने सुझाव दिया कि मौजूदा संसदीय ढांचे के भीतर ही महिलाओं के लिए दरवाजे खोले जाएं। उनका मानना है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाने के लिए महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना अनिवार्य शर्त है।
वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका
चतुर्वेदी ने समानता और समावेश के मुद्दे पर भारत की वैश्विक भूमिका को भी रेखांकित किया। उन्होंने वैक्सीन वितरण और विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भारत की वकालत का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत इन लड़ाइयों में सबसे आगे रहा है।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर बातचीत निर्णायक दौर में है और महिला आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में आ सकता है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इन दोनों मोर्चों पर क्या ठोस कदम उठाती है।