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प्रो. रामरूप की 'बिस्पोकन' दिल्ली में लॉन्च: त्रिनिदाद से सैविल रो तक का संघर्ष

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प्रो. रामरूप की 'बिस्पोकन' दिल्ली में लॉन्च: त्रिनिदाद से सैविल रो तक का संघर्ष

सारांश

त्रिनिदाद की साधारण ज़मीन से उठकर लंदन के सर्वोच्च दर्जी प्रतिष्ठान तक — प्रो. रामरूप की कहानी रंगभेद, भाषाई पूर्वाग्रह और सांस्कृतिक अवरोधों को पार करने की है। 'बिस्पोकन' सिर्फ एक किताब नहीं, दो देशों और दो युगों को जोड़ने वाला दस्तावेज़ है।

मुख्य बातें

रामरूप की जीवनी 'बिस्पोकन' का विमोचन 22 अगस्त को नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में हुआ।
पुस्तक अशोक कुमार बाल द्वारा लिखी गई है और रामरूप के त्रिनिदाद से लंदन तक के सफर को दर्ज करती है।
रामरूप मॉरिस सेडवेल के क्रिएटिव डायरेक्टर व मालिक हैं और सैविल रो बिस्पोक एकेडमी के संस्थापक हैं।
उन्होंने 52 साल पहले मॉरिस सेडवेल में नौकरी पाई और तीन साल की डिग्री दो साल में पूरी की।
कार्यक्रम में राज्यसभा उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह और FDCI चेयरमैन सुनील सेठी उपस्थित रहे।

प्रोफेसर एंड्रयू एम. रामरूपमॉरिस सेडवेल के क्रिएटिव डायरेक्टर एवं मालिक और सैविल रो बिस्पोक एकेडमी के संस्थापक — ने 22 अगस्त को नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में अपने जीवन पर आधारित पुस्तक 'बिस्पोकन' के विमोचन कार्यक्रम में अपनी संघर्षगाथा साझा की। अशोक कुमार बाल द्वारा लिखी यह पुस्तक त्रिनिदाद की एक साधारण पृष्ठभूमि से उठकर लंदन के सर्वोच्च फैशन गलियारों तक पहुँचने की उनकी यात्रा को दर्ज करती है।

त्रिनिदाद से लंदन: चुनौतियों भरा सफर

रामरूप ने बातचीत में बताया कि त्रिनिदाद छोड़कर इंग्लैंड जाना उनके लिए बेहद कठिन अनुभव रहा। उन्होंने कहा, 'चुनौतियां सिर्फ किसी अलग तरह से काम करने के तरीके या ट्रेनिंग की नहीं थीं, बल्कि चुनौतियां उससे कहीं ज्यादा थीं। चुनौतियां मेरे लुक्स, मेरी त्वचा का रंग, मेरे बालों का रंग को लेकर थीं। मेरे बोलने के तरीके को लेकर भी कई चुनौतियां थीं।' रामरूप ने यह बात हँसते हुए कही, लेकिन उनके शब्दों में उस दौर की पीड़ा स्पष्ट झलकती थी।

यह ऐसे समय की बात है जब ब्रिटेन में रंगभेद और सांस्कृतिक पूर्वाग्रह कैरेबियाई प्रवासियों के लिए रोज़मर्रा की वास्तविकता थे। रामरूप की यात्रा उस पीढ़ी के प्रतिनिधि अनुभव का प्रतिबिंब है।

मॉरिस सेडवेल में पहली बड़ी कामयाबी

रामरूप ने बताया कि उनकी पहली बड़ी सफलता तब मिली जब उन्हें 52 साल पहले मॉरिस सेडवेल में नौकरी मिली। उन्होंने कहा, 'उस समय मैंने खुद को साबित किया। मैंने तीन साल की यूनिवर्सिटी डिग्री दो साल में पूरी की, और मैं उन आठ ग्रेजुएट्स में से एक था।' यह उपलब्धि उनके असाधारण परिश्रम और प्रतिभा की गवाह है।

गौरतलब है कि मॉरिस सेडवेल सैविल रो के सबसे प्रतिष्ठित दर्जी प्रतिष्ठानों में से एक है, जहाँ पहुँचना किसी के लिए भी सरल नहीं — और एक कैरेबियाई प्रवासी के लिए तो यह और भी दुर्लभ उपलब्धि थी।

हाई कमिश्नर ने सराही दोनों देशों को जोड़ने की भूमिका

भारत में त्रिनिदाद और टोबैगो गणराज्य के हाई कमिश्नर चंद्रदत्त सिंह ने रामरूप के सफर की सराहना करते हुए कहा, 'मायने यह रखता है कि अंत में क्या होता है। हो सकता है कि आपकी शुरुआत बहुत साधारण रही हो, लेकिन अंत में आप क्या हासिल करते हैं, यही असल में मायने रखता है।' उन्होंने यह भी कहा कि रामरूप अपनी ज़िंदगी में दो दूरियों को पाट रहे हैं — त्रिनिदाद और टोबैगो तथा भारत के बीच — और इस तरह दो देशों की कहानियों को एक साथ ला रहे हैं।

विमोचन कार्यक्रम: गणमान्य हस्तियों की उपस्थिति

इंडिया हैबिटेट सेंटर के सिल्वर ओक हॉल और पैटियो में आयोजित इस विमोचन समारोह में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने भाग लिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता फैशन डिजाइन काउंसिल ऑफ इंडिया (FDCI) के चेयरमैन सुनील सेठी ने की। इन हस्तियों की उपस्थिति ने इस आयोजन को एक सांस्कृतिक और कूटनीतिक महत्त्व भी प्रदान किया।

आगे क्या

'बिस्पोकन' का यह विमोचन भारत और कैरेबियाई देशों के बीच सांस्कृतिक संवाद को नई दिशा दे सकता है। रामरूप की कहानी उन तमाम युवाओं के लिए प्रेरणा बनती है जो विपरीत परिस्थितियों में अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद में हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि यह वास्तव में प्रवासी पहचान, नस्लीय पूर्वाग्रह और सांस्कृतिक दृढ़ता का दस्तावेज़ है — जो आज के वैश्विक संदर्भ में भी उतना ही प्रासंगिक है।
RashtraPress
22 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रोफेसर एंड्रयू रामरूप कौन हैं?
प्रोफेसर एंड्रयू एम. रामरूप लंदन के प्रतिष्ठित दर्जी प्रतिष्ठान मॉरिस सेडवेल के क्रिएटिव डायरेक्टर एवं मालिक हैं। वे सैविल रो बिस्पोक एकेडमी के संस्थापक भी हैं और फैशन जगत में 'टेलरिंग के उस्ताद' के रूप में जाने जाते हैं।
'बिस्पोकन' किताब किस बारे में है?
'बिस्पोकन' अशोक कुमार बाल द्वारा लिखी गई पुस्तक है जो प्रो. रामरूप के त्रिनिदाद से इंग्लैंड तक के संघर्षपूर्ण सफर को दर्ज करती है। इसमें रंगभेद, सांस्कृतिक पूर्वाग्रह और व्यावसायिक चुनौतियों से जूझते हुए सैविल रो के शीर्ष तक पहुँचने की यात्रा है।
रामरूप को लंदन में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
रामरूप के अनुसार, चुनौतियाँ केवल काम के तरीकों या प्रशिक्षण तक सीमित नहीं थीं। उन्हें अपने रंग-रूप, त्वचा के रंग और बोलने के तरीके को लेकर भी भेदभाव झेलना पड़ा।
मॉरिस सेडवेल में रामरूप को नौकरी कब मिली?
रामरूप को लगभग 52 साल पहले मॉरिस सेडवेल में नौकरी मिली, जो उनकी पहली बड़ी सफलता थी। उन्होंने वहाँ तीन साल की यूनिवर्सिटी डिग्री मात्र दो साल में पूरी की।
'बिस्पोकन' के विमोचन कार्यक्रम में कौन-कौन उपस्थित थे?
22 अगस्त को नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में हुए इस विमोचन में राज्यसभा उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने भाग लिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता फैशन डिजाइन काउंसिल ऑफ इंडिया (FDCI) के चेयरमैन सुनील सेठी ने की।
राष्ट्र प्रेस
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