ब्रिक्स साझा मुद्रा बनी तो चीन का होगा दबदबा, राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार ही सही रास्ता: केपी फैबियन
सारांश
मुख्य बातें
पूर्व राजनयिक और रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ केपी फैबियन ने 14 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि ब्रिक्स देशों के बीच 'साझा मुद्रा' का विचार न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि भारत की वित्तीय संप्रभुता के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है। उनके अनुसार, यदि ऐसी मुद्रा कभी अस्तित्व में आई, तो उस पर चीन का वर्चस्व लगभग अवश्यंभावी होगा।
राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार — पहले से ही हकीकत
फैबियन ने बताया कि भारत और रूस के बीच पहले से ही लगभग 95 प्रतिशत व्यापार राष्ट्रीय मुद्राओं में निपटाया जा रहा है। इसी प्रकार चीन और रूस भी अपना द्विपक्षीय व्यापार अपनी-अपनी मुद्राओं में कर रहे हैं। ऐसे में उन्होंने तर्क दिया कि किसी नई 'साझा मुद्रा' की आवश्यकता ही नहीं है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मीडिया में प्रचलित 'डी-डॉलराइजेशन' शब्दावली कूटनीतिक रूप से उचित नहीं है। उनके मुताबिक 'राष्ट्रीय मुद्राओं के अधिक उपयोग' की बात करना न केवल सटीक है, बल्कि कूटनीतिक दृष्टि से भी समझदारी है। उन्होंने आलोचना की कि कुछ मीडिया संस्थान अभी भी 'लोकल करेंसी' जैसे अस्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि सही पद 'राष्ट्रीय मुद्रा' होना चाहिए।
साझा मुद्रा से वित्तीय संप्रभुता को खतरा
फैबियन ने चेताया कि 'साझा मुद्रा' लागू होने की स्थिति में सदस्य देश अपनी आर्थिक नीतियों — जैसे ब्याज दरों में बदलाव — पर स्वायत्त निर्णय नहीं ले पाएंगे। यह यूरो ज़ोन के उस अनुभव की याद दिलाता है जहाँ कमज़ोर अर्थव्यवस्थाओं को एकल मौद्रिक नीति से बँधे रहने के कारण गंभीर संकट झेलना पड़ा था।
उन्होंने कहा कि ब्रिक्स के अब 11 सदस्य देश हैं और इन सभी की संयुक्त GDP लगभग 34 ट्रिलियन डॉलर है। इसमें अकेले चीन की GDP करीब 20 ट्रिलियन डॉलर है — यानी कुल का लगभग 59 प्रतिशत। इस असंतुलन के चलते किसी भी साझा मुद्रा व्यवस्था में बीजिंग का प्रभुत्व स्वाभाविक रूप से निर्णायक होगा। फैबियन के अनुसार, चीन को छोड़कर शायद ही कोई अन्य ब्रिक्स सदस्य ऐसी व्यवस्था वास्तव में चाहता हो।
UNSC सुधार — बयानबाजी और हकीकत का फर्क
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार और भारत की स्थायी सदस्यता के मुद्दे पर फैबियन ने कहा कि इस विषय पर अभी तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। उन्होंने ब्रिक्स घोषणापत्र की भाषा का विश्लेषण करते हुए बताया कि रूस और चीन ने केवल यह कहा है कि वे भारत और ब्राज़ील की संयुक्त राष्ट्र में 'बड़ी भूमिका की आकांक्षाओं को स्वीकार करते हैं।'
उन्होंने स्पष्ट किया कि इस भाषा का अर्थ स्थायी सदस्यता के लिए स्पष्ट समर्थन नहीं है। उनके मुताबिक इस कूटनीतिक शब्दावली को 'बड़ी सफलता' के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यों से परे होगा।
सीमा-पार आतंकवाद — बयान काफी नहीं, असली परीक्षा आगे
फैबियन ने कहा कि ब्रिक्स घोषणापत्र में सीमा-पार आतंकवाद की कड़ी निंदा और भारत द्वारा लंबे समय से इस्तेमाल की जाने वाली भाषा का समावेश सकारात्मक है। हालाँकि उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि असली कसौटी तब होगी जब UNSC में पाकिस्तान के किसी आतंकवादी संगठन को आधिकारिक रूप से सूचीबद्ध करने का प्रस्ताव आएगा — और सवाल यह होगा कि क्या चीन उस मौके पर सहयोग करेगा।
गौरतलब है कि चीन ने अतीत में UNSC में पाकिस्तान से जुड़े आतंकवाद प्रस्तावों पर बार-बार वीटो का उपयोग किया है। इस पृष्ठभूमि में फैबियन की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि बयानों की कूटनीतिक कीमत तभी सिद्ध होती है, जब वे मतदान में परिणत हों।
आगे की राह
ब्रिक्स का अगला शिखर सम्मेलन और उसमें मुद्रा व आतंकवाद जैसे मुद्दों पर होने वाली चर्चाएँ यह तय करेंगी कि घोषणापत्र की भाषा ठोस नीतिगत कदमों में बदलती है या महज कूटनीतिक औपचारिकता बनकर रह जाती है। फैबियन जैसे विशेषज्ञों की राय यह स्पष्ट करती है कि भारत के लिए राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देना और वित्तीय संप्रभुता की रक्षा करना — दोनों एक साथ संभव हैं।