13 सितंबर 2026
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ब्रिक्स में साझा करेंसी की वकालत, डॉलर निर्भरता घटाने पर ज़ोर: कांग्रेस सांसद ईशा खान चौधरी

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ब्रिक्स में साझा करेंसी की वकालत, डॉलर निर्भरता घटाने पर ज़ोर: कांग्रेस सांसद ईशा खान चौधरी

सारांश

कांग्रेस सांसद ईशा खान चौधरी ने मालदा में दो बड़े मुद्दे उठाए — ब्रिक्स देशों को डॉलर-निर्भरता तोड़ने के लिए साझा करेंसी बनानी चाहिए, और भोजन का चुनाव नागरिक का निजी अधिकार है जिस पर सरकार क़ानून नहीं बना सकती। पाकिस्तान की ब्रिक्स सदस्यता पर उन्होंने आतंकवाद रुकने तक सहयोग कठिन बताया।

मुख्य बातें

कांग्रेस सांसद ईशा खान चौधरी ने ब्रिक्स सदस्य देशों के लिए साझा करेंसी बनाकर अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की वकालत की।
उन्होंने शाकाहारी-मांसाहारी भोजन विवाद पर कहा कि खानपान व्यक्तिगत अधिकार है, किसी सरकार को इस पर क़ानून बनाने का हक़ नहीं।
पाकिस्तान की ब्रिक्स सदस्यता पर सतर्क रुख — आतंकवाद ख़त्म होने तक सहयोग मुश्किल बताया।
ब्रिक्स को विकासशील देशों का बहुराष्ट्रीय मंच बताते हुए भारत-चीन आर्थिक सहयोग को फ़ायदेमंद बताया।
विरोध को संवैधानिक अधिकार बताया और किसी भी पार्टी-सरकार के इसे दबाने पर सवाल उठाए।

कांग्रेस सांसद ईशा खान चौधरी ने 12 सितंबर 2026 को मालदा में दो अहम मुद्दों पर अपनी बात रखी — एक ओर उन्होंने ब्रिक्स (BRICS) मंच के भीतर साझा करेंसी बनाकर अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की पुरज़ोर वकालत की, तो दूसरी ओर शाकाहारी-मांसाहारी भोजन विवाद पर कहा कि खानपान का फ़ैसला नागरिक का निजी अधिकार है और किसी भी सरकार को इस पर क़ानून बनाने का हक़ नहीं है।

भोजन पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल

कांग्रेस सांसद ने स्पष्ट शब्दों में कहा — 'शाकाहारी खाना है या मांसाहार, कब खाना है और कब नहीं खाना है, यह व्यक्ति का अधिकार है। सरकार को इस पर बोलने का अधिकार नहीं है, क्योंकि सरकार किसी धर्म में नहीं है।' उन्होंने आगे जोड़ा कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) समेत कोई भी राजनीतिक दल धर्म नहीं है — 'भाजपा कोई धर्म नहीं है, न हिंदू धर्म है न मुसलमान धर्म, सिर्फ़ एक पार्टी है।' उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि किसी भी पार्टी की सरकार को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि नागरिक क्या खाएँगे और क्या नहीं।

चौधरी ने यह भी कहा कि विरोध करना हर पार्टी का संवैधानिक अधिकार है और इसे दबाया नहीं जा सकता।

ब्रिक्स और साझा करेंसी की ज़रूरत

ब्रिक्स पर बोलते हुए कांग्रेस सांसद ने कहा कि आम जनता इस मंच के बारे में बहुत कम जानती है। उन्होंने समझाया कि ब्रिक्स एक बहुराष्ट्रीय मंच है जिसमें विकासशील देश शामिल हैं — ये वे अर्थव्यवस्थाएँ हैं जो अमेरिका, स्विट्जरलैंड, जर्मनी या यूरोपीय संघ की तरह पूर्ण रूप से विकसित नहीं हुई हैं। चौधरी के अनुसार, अभी अंतरराष्ट्रीय व्यापार मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर में होता है और भारतीय रुपये का इस्तेमाल नहीं किया जाता।

उन्होंने सवाल उठाया — 'डॉलर पर जो हमारी निर्भरता है, उसे कम करने के लिए हम अपनी ख़ुद की करेंसी क्यों नहीं बना लेते।' उनका तर्क था कि अगर भविष्य में ब्रिक्स सदस्य देशों — विशेषकर भारत और चीन — के बीच मज़बूत आर्थिक सहयोग होता है, तो यह सभी विकासशील देशों के लिए फ़ायदेमंद होगा। हालाँकि उन्होंने ख़ुद स्वीकार किया कि 'इतना सहयोग होगा या नहीं, यह एक बड़ा सवाल है।'

पाकिस्तान की ब्रिक्स सदस्यता पर सतर्क रुख

पाकिस्तान की ब्रिक्स में शामिल होने की इच्छा और चीन द्वारा उसके समर्थन पर पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए चौधरी ने सावधानी भरा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों से चली आ रही समस्याएँ हैं — 'जब तक यह समस्या दूर नहीं होती, जब तक आतंकवाद नहीं रुकता, तब तक एक साथ मिलकर काम करना मुश्किल होगा।'

व्यापक संदर्भ और भू-राजनीतिक महत्व

गौरतलब है कि ब्रिक्स साझा करेंसी का विचार नया नहीं है — 2023 के जोहानिसबर्ग शिखर सम्मेलन में भी डी-डॉलराइज़ेशन पर चर्चा हुई थी, लेकिन सदस्य देशों की विविध आर्थिक संरचनाओं और राजनीतिक प्राथमिकताओं के कारण ठोस प्रगति नहीं हो पाई। भारत ने अब तक सार्वजनिक रूप से डॉलर को पूरी तरह छोड़ने की बजाय द्विपक्षीय मुद्रा समझौतों — जैसे रुपये-रूबल और रुपये-दिरहम व्यापार — पर ज़ोर दिया है।

यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर डॉलर-विकल्प की बहस तेज़ हो रही है, और ब्रिक्स का हालिया विस्तार — जिसमें ईरान, मिस्र, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हुए — मंच की भू-राजनीतिक ताक़त को बढ़ा रहा है। हालाँकि, आलोचकों का कहना है कि सदस्य देशों के बीच गहरे आर्थिक और राजनीतिक मतभेद साझा करेंसी को निकट भविष्य में व्यावहारिक बनाने में बड़ी बाधा हैं।

क्या होगा आगे

ब्रिक्स का अगला शिखर सम्मेलन इस दिशा में किसी ठोस रोडमैप पर चर्चा का अवसर हो सकता है। वहीं, भोजन के अधिकार को लेकर कांग्रेस सांसद का बयान उस समय आया है जब कई राज्यों में खाद्य विनियमन को लेकर राजनीतिक विमर्श तेज़ हो रहा है। आने वाले दिनों में दोनों मुद्दों पर सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन व्यावहारिकता पर गंभीर सवाल बने हुए हैं — सदस्य देशों की मुद्रास्फीति दरें, राजकोषीय नीतियाँ और राजनीतिक प्राथमिकताएँ इतनी भिन्न हैं कि यूरो जैसा मॉडल यहाँ लागू करना अत्यंत कठिन है। चौधरी का बयान कांग्रेस की विदेश नीति पर स्पष्ट स्थिति की कमी को भी उजागर करता है — डी-डॉलराइज़ेशन की बात तो करती हैं, लेकिन भारत सरकार के मौजूदा द्विपक्षीय मुद्रा-स्वैप समझौतों पर कोई ठोस विकल्प नहीं रखतीं। भोजन के अधिकार वाला हिस्सा संवैधानिक रूप से मज़बूत है, मगर इसे ब्रिक्स जैसे भू-राजनीतिक मुद्दे के साथ जोड़ना संदेश को कमज़ोर करता है।
RashtraPress
13 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रिक्स (BRICS) क्या है और इसमें कौन-कौन से देश शामिल हैं?
ब्रिक्स विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का एक बहुराष्ट्रीय मंच है, जिसमें मूल रूप से ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल थे। हाल ही में ईरान, मिस्र, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात भी इसमें जुड़े हैं।
ब्रिक्स साझा करेंसी का विचार क्यों उठाया जा रहा है?
अभी अंतरराष्ट्रीय व्यापार मुख्यतः अमेरिकी डॉलर में होता है, जिससे विकासशील देशों की डॉलर पर निर्भरता बनी रहती है। साझा करेंसी का विचार इस निर्भरता को कम करने और सदस्य देशों के बीच सीधे व्यापार को सुगम बनाने के लिए उठाया जा रहा है।
ईशा खान चौधरी ने भोजन के अधिकार पर क्या कहा?
उन्होंने कहा कि शाकाहारी या मांसाहारी भोजन का चुनाव व्यक्ति का निजी अधिकार है और किसी भी पार्टी की सरकार को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि नागरिक क्या खाएँ।
पाकिस्तान की ब्रिक्स सदस्यता पर भारत का क्या रुख है?
कांग्रेस सांसद ईशा खान चौधरी ने कहा कि जब तक भारत-पाकिस्तान के बीच दशकों पुरानी समस्याएँ — विशेषकर आतंकवाद — का समाधान नहीं होता, तब तक एक मंच पर मिलकर काम करना कठिन रहेगा।
ब्रिक्स साझा करेंसी कब तक बन सकती है?
अभी तक इस पर कोई ठोस समयसीमा तय नहीं है। 2023 के जोहानिसबर्ग शिखर सम्मेलन में चर्चा हुई थी, लेकिन सदस्य देशों की विविध आर्थिक संरचनाओं के कारण निकट भविष्य में इसका व्यावहारिक होना कठिन माना जा रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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