चीन में पूर्वोत्तर बाघों की संख्या 27 से बढ़कर 72, तेंदुए 42 से 115 हुए — एक दशक में दोगुनी वृद्धि
सारांश
मुख्य बातें
चीन के पूर्वोत्तर बाघ एवं तेंदुआ राष्ट्रीय उद्यान में जंगली बाघों और तेंदुओं की आबादी ने पिछले एक दशक में उल्लेखनीय पुनर्वापसी दर्ज की है। 29 जुलाई 2025 को वैश्विक बाघ दिवस के अवसर पर चीनी राष्ट्रीय वानिकी और घासभूमि प्रशासन द्वारा जारी नवीनतम निगरानी आंकड़ों के अनुसार, 2017 से अब तक जंगली पूर्वोत्तर बाघों की संख्या 27 से बढ़कर 72 और पूर्वोत्तर तेंदुओं की संख्या 42 से बढ़कर 115 हो गई है — दोनों में दोगुने से भी अधिक की वृद्धि। यह उपलब्धि वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में चीन की नीतिगत प्रतिबद्धता का परिणाम बताई जा रही है।
मुख्य आंकड़े और उपलब्धियाँ
आंकड़ों के अनुसार, पूर्वोत्तर बाघ एवं तेंदुआ राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना के बाद से अब तक पूर्वोत्तर बाघों की गतिविधि के 30,000 से अधिक मामले और पूर्वोत्तर तेंदुओं की गतिविधि के 40,000 से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं। ये संख्याएँ न केवल जनसंख्या वृद्धि बल्कि प्रजातियों की सक्रियता और आवास-विस्तार का भी संकेत देती हैं।
गौरतलब है कि पूर्वोत्तर बाघ (अमूर टाइगर) और पूर्वोत्तर तेंदुआ (अमूर लेपर्ड) दोनों ही वैश्विक स्तर पर गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजातियों में गिने जाते हैं। इस संदर्भ में यह वृद्धि अंतरराष्ट्रीय संरक्षण समुदाय के लिए भी महत्वपूर्ण है।
संरक्षण नीति और राष्ट्रीय उद्यान की भूमिका
रिपोर्ट के अनुसार, हाल के वर्षों में चीन ने राष्ट्रीय उद्यानों को प्रकृति संरक्षण प्रणाली का मुख्य आधार बनाकर लुप्तप्राय प्रजातियों की बचाव परियोजनाएँ लागू की हैं। साथ ही वन्यजीव निगरानी नेटवर्क और बचाव प्रणालियों को सुदृढ़ किया गया है।
पूर्वोत्तर बाघ एवं तेंदुआ राष्ट्रीय उद्यान ने विशेष रूप से पारिस्थितिक संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान एवं निगरानी, कानून प्रवर्तन, स्थानीय जनजीवन संरक्षण और सीमा पार सहयोग को एकीकृत रूप से बढ़ावा दिया है। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप प्रमुख प्रजातियों के आवासों में प्रभावी सुधार हुआ है।
रूस के साथ सीमा पार सहयोग
चीन ने रूस के लेपर्ड लैंड नेशनल पार्क के साथ एक नियमित सहयोग तंत्र स्थापित किया है, जिसके तहत जनसंख्या सांख्यिकी, सीमा पार गश्त और सूचना साझाकरण जैसे कार्य संयुक्त रूप से किए जा रहे हैं। यह द्विपक्षीय सहयोग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इन प्रजातियों का प्राकृतिक आवास दोनों देशों की सीमाओं में फैला हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सीमा पार संरक्षण तंत्र के बिना किसी एक देश के प्रयास अधूरे रह सकते हैं, क्योंकि बाघ और तेंदुए अपनी विचरण सीमा में राष्ट्रीय सीमाओं का पालन नहीं करते।
वैश्विक संदर्भ में महत्व
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर बाघों की आबादी के संरक्षण को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ी हुई है। वैश्विक बाघ दिवस पर जारी ये आंकड़े न केवल चीन की संरक्षण सफलता को रेखांकित करते हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि दीर्घकालिक नीतिगत प्रतिबद्धता और वैज्ञानिक निगरानी से लुप्तप्राय प्रजातियों की आबादी को पुनर्स्थापित किया जा सकता है। आने वाले वर्षों में इस मॉडल की निरंतरता और विस्तार पर विशेषज्ञों की नज़र बनी रहेगी।