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मानवाधिकार को राजनीतिक हथियार न बनाएं: UN में चीनी उप प्रतिनिधि सुन लेई की दो टूक

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मानवाधिकार को राजनीतिक हथियार न बनाएं: UN में चीनी उप प्रतिनिधि सुन लेई की दो टूक

सारांश

संयुक्त राष्ट्र महासभा में मानवाधिकार परिषद की स्थिति पर प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित होने के बाद चीन ने स्पष्ट संदेश दिया — मानवाधिकार को राजनीतिक हथियार और दूसरे देशों में हस्तक्षेप का ज़रिया नहीं बनाया जाना चाहिए। यह बयान वैश्विक मानवाधिकार बहस में विकासशील देशों की बढ़ती आवाज़ को दर्शाता है।

मुख्य बातें

6 जुलाई 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मानवाधिकार परिषद की स्थिति पर मसौदा प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया।
चीन के उप स्थायी प्रतिनिधि सुन लेई ने कहा — किसी देश के मानवाधिकारों का मूल्यांकन दूसरे देशों के मानकों से नहीं होना चाहिए।
मानवाधिकार परिषद को महासभा के सहायक निकाय के रूप में यथावत बनाए रखा गया।
सुन लेई ने परिषद के कार्यों के राजनीतिकरण और दुरुपयोग को प्रमुख चिंता बताया।
चीन ने निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता और गैर-चयनात्मकता को सदस्य देशों की प्राथमिकता बताया।

संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 6 जुलाई 2026 को मानवाधिकार परिषद की स्थिति की समीक्षा पर मसौदा प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किए जाने के तुरंत बाद, चीन के उप स्थायी प्रतिनिधि सुन लेई ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी देश में मानवाधिकारों का मूल्यांकन दूसरे देशों के मानकों के आधार पर नहीं होना चाहिए, और दोहरे मापदंडों की कोई जगह नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि मानवाधिकारों को दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के लिए राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना, संयुक्त राष्ट्र के मंच को दबाव और टकराव का अखाड़ा बना देता है।

प्रस्ताव पर चीन का रुख

सुन लेई ने कहा कि चीन महासभा द्वारा इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित किए जाने का स्वागत करता है, जिसमें मानवाधिकार परिषद को महासभा के सहायक निकाय के रूप में यथावत बनाए रखा गया है। उनके अनुसार, यह परिषद संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख मानवाधिकार मंच है और व्यवहार में यह सिद्ध हो चुका है कि इसकी वर्तमान संरचना और भूमिका अपने कार्यों की आवश्यकताओं को पूरा करने में पूरी तरह सक्षम है।

राजनीतिकरण और दुरुपयोग पर चिंता

सुन लेई ने यह भी रेखांकित किया कि हाल के वर्षों में मानवाधिकार परिषद के कार्यों का राजनीतिकरण और दुरुपयोग एक गंभीर समस्या बन गई है। उनके अनुसार, परिषद की निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता और गैर-चयनात्मकता सुनिश्चित करना सदस्य देशों के लिए एक प्राथमिकता और अत्यावश्यक दायित्व है। यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिमी देशों और विकासशील देशों के बीच मानवाधिकार मानकों की परिभाषा को लेकर तनाव बढ़ता जा रहा है।

व्यापक संदर्भ

गौरतलब है कि मानवाधिकार परिषद की स्थापना 2006 में हुई थी और तब से इसे लेकर विकसित और विकासशील देशों के बीच मतभेद बने रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि कुछ देश इस मंच का उपयोग भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के लिए करते हैं, जबकि मानवाधिकार मुद्दों पर वास्तविक संवाद पीछे रह जाता है। चीन का यह बयान उस व्यापक बहस का हिस्सा है जिसमें वैश्विक दक्षिण के देश एकतरफा मानवाधिकार दबाव का विरोध करते रहे हैं।

आगे की राह

इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद अब सदस्य देशों की निगाह इस बात पर होगी कि मानवाधिकार परिषद अपने कार्यों में राजनीतिक पक्षपात को किस हद तक कम कर पाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सर्वसम्मति से पारित यह प्रस्ताव एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन क्रियान्वयन की असली परीक्षा आने वाले सत्रों में होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका निशाना स्पष्ट है — वे पश्चिमी देशों की उस प्रवृत्ति पर सवाल उठा रहे हैं जिसमें मानवाधिकार के नाम पर चुनिंदा देशों को घेरा जाता है। विडंबना यह है कि जो देश 'दोहरे मापदंड' की आलोचना करता है, उस पर खुद शिनजियांग और तिब्बत में मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर अंतरराष्ट्रीय आरोप हैं। सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव यह ज़रूर बताता है कि बहुसंख्यक देश संवाद के पक्ष में हैं, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि 'निष्पक्षता' की परिभाषा को लेकर वैश्विक सहमति अभी दूर है।
RashtraPress
7 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 6 जुलाई को कौन-सा प्रस्ताव पारित किया?
महासभा ने 6 जुलाई 2026 को मानवाधिकार परिषद की स्थिति की समीक्षा पर एक मसौदा प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया, जिसमें मानवाधिकार परिषद को महासभा के सहायक निकाय के रूप में बनाए रखने का निर्णय लिया गया।
चीनी उप प्रतिनिधि सुन लेई ने क्या कहा?
सुन लेई ने कहा कि मानवाधिकारों का मूल्यांकन दूसरे देशों के मानकों के आधार पर नहीं होना चाहिए और दोहरे मापदंड अस्वीकार्य हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मानवाधिकार को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर संयुक्त राष्ट्र के मंच को दबाव का अखाड़ा नहीं बनाया जाना चाहिए।
मानवाधिकार परिषद की स्थापना कब हुई और इसका क्या उद्देश्य है?
मानवाधिकार परिषद की स्थापना 2006 में हुई थी। यह संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख मानवाधिकार निकाय है जो मानवाधिकार मुद्दों पर चर्चा करने और वैश्विक मानवाधिकार शासन को बढ़ावा देने का कार्य करता है।
चीन ने मानवाधिकार परिषद के राजनीतिकरण पर क्या चिंता जताई?
चीन ने कहा कि हाल के वर्षों में परिषद के कार्यों का राजनीतिकरण और दुरुपयोग गंभीर समस्या बन गई है। सुन लेई के अनुसार, परिषद की निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता और गैर-चयनात्मकता सुनिश्चित करना सदस्य देशों के लिए प्राथमिकता होनी चाहिए।
इस प्रस्ताव का वैश्विक मानवाधिकार बहस पर क्या असर होगा?
सर्वसम्मति से पारित यह प्रस्ताव संकेत देता है कि सदस्य देश संवाद के पक्ष में हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि मानवाधिकार मानकों की परिभाषा और क्रियान्वयन को लेकर विकसित और विकासशील देशों के बीच मतभेद आने वाले सत्रों में भी बने रहेंगे।
राष्ट्र प्रेस
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