दक्षिण अफ्रीका में प्रवासी-विरोधी हिंसा: डरबन-जोहान्सबर्ग में कामकाज ठप, 5 की मौत, हजारों विस्थापित
सारांश
मुख्य बातें
दक्षिण अफ्रीका में प्रवासी-विरोधी आंदोलन ने 30 जून को भयावह रूप ले लिया — जोहान्सबर्ग और डरबन समेत प्रमुख शहरों में दुकानें बंद रहीं, बसें नहीं चलीं और हजारों पुलिसकर्मी सड़कों पर तैनात रहे। अवैध प्रवासियों को देश छोड़ने की मंगलवार तक की समय-सीमा ने पूरे देश में दहशत का माहौल बना दिया। अप्रैल से अब तक इस हिंसा में कम से कम 5 लोगों की जान जा चुकी है और हजारों लोग विस्थापित हुए हैं।
मुख्य घटनाक्रम
जोहान्सबर्ग और डरबन के कई इलाकों में दर्जनों प्रदर्शनकारी — जिनमें से कुछ लकड़ी की लाठियाँ लिए हुए थे — सड़कों पर उतरे। 'अवैध विदेशियों' के खिलाफ नारेबाजी करते प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि प्रवासियों के कारण उन्हें अपने ही देश में रोजगार नहीं मिल रहा। अन्य अफ्रीकी देशों से आए कई विदेशी नागरिकों ने मंगलवार को सुरक्षा के मद्देनजर काम पर जाने से परहेज किया।
स्थानीय मीडिया के अनुसार, मोजाम्बिक के दो, इथियोपिया के एक और मलावी के एक नागरिक की हाल के हफ्तों में हत्या की जा चुकी है। बढ़ती हिंसा के बीच कुछ प्रवासी स्वयं देश छोड़ रहे हैं, जबकि कई अफ्रीकी देशों ने अपने नागरिकों की वापसी के लिए बसों और विमानों का इंतजाम किया है।
आंदोलन के पीछे कौन
'मार्च एंड मार्च' नामक समूह ने इस अभियान की अगुआई की, जिसकी कमान एक पूर्व रेडियो प्रस्तोता ने संभाली। जब प्रदर्शन हिंसक हुए और उनसे जवाबदेही माँगी गई, तो उन्होंने कहा कि 'स्वतःस्फूर्त' घटनाओं की जिम्मेदारी उन पर नहीं डाली जा सकती। डरबन और जोहान्सबर्ग में मकान मालिकों द्वारा विदेशी किरायेदारों को अवैध रूप से बाहर निकाले जाने की घटनाएँ भी सामने आईं, क्योंकि उन्हें अपनी संपत्तियों पर तोड़फोड़ का डर था।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
'इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक जस्टिस' (IEJ) ने सरकार से प्रवासियों के खिलाफ हिंसा और घृणास्पद भाषण (हेट स्पीच) पर तत्काल कार्रवाई की माँग की है। संस्था ने चेतावनी दी कि राजनीतिक नेता और विजिलेंट समूह देश की गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को हल करने के बजाय पीड़ित समुदायों की निराशा का राजनीतिक फायदा उठा रहे हैं।
IEJ के अनुसार, 'बेरोजगारी, गरीबी और खराब सार्वजनिक सेवाएँ प्रवासन के कारण नहीं, बल्कि दशकों की आर्थिक और नीतिगत नाकामियों का नतीजा हैं।' संस्था ने स्पष्ट किया कि वह प्रवासियों के खिलाफ नफरत और स्व-न्याय की हिंसा का पूर्णतः विरोध करती है।
ऐतिहासिक संदर्भ
गौरतलब है कि दक्षिण अफ्रीका में ऐसे प्रवासी-विरोधी हमले 2008 से समय-समय पर होते रहे हैं। इन घटनाओं में कानूनी और अवैध प्रवासियों के बीच कोई स्पष्ट भेद नहीं किया जाता, जिससे सभी विदेशी नागरिक निशाने पर आ जाते हैं। रंगभेद (अपार्थाइड) समाप्त हुए 30 वर्ष बीत चुके हैं, फिर भी देश असमानता, धीमी आर्थिक वृद्धि और उच्च बेरोजगारी से जूझ रहा है। इसके बावजूद यह अफ्रीका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है और रोजगार की तलाश में प्रवासियों को आकर्षित करता रहता है।
सरकार की प्रतिक्रिया और आगे की स्थिति
हजारों पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं और सेना को भी तैयार रखा गया है। यह ऐसे समय में आया है जब दक्षिण अफ्रीका पहले से ही राजनीतिक और आर्थिक दबाव में है। विश्लेषकों का मानना है कि जब तक बेरोजगारी और असमानता की जड़ें नहीं सुलझाई जातीं, तब तक प्रवासियों को बलि का बकरा बनाने का यह चक्र जारी रहेगा।