इंग्लैंड में टीबी निदान की चूक: हर हफ्ते एक मौत, थोरेक्स जर्नल के अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा
सारांश
मुख्य बातें
थोरेक्स जर्नल में प्रकाशित एक नए शोध के अनुसार, इंग्लैंड में हर सप्ताह कम-से-कम एक व्यक्ति की मृत्यु तपेदिक (टीबी) के समय पर निदान न होने के कारण हो रही है — और बीमारी का पता मृत्यु के बाद पोस्टमार्टम के दौरान ही चल पाता है। यह स्थिति विशेष रूप से उन मरीजों में देखी गई जो पारंपरिक 'उच्च जोखिम' समूह में नहीं आते, जिससे स्वास्थ्य तंत्र में निदान की गंभीर खामी उजागर होती है।
अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष
शोधकर्ताओं ने पाया कि मृत्यु के बाद टीबी की पहचान होने वाले मरीज ज़्यादातर ब्रिटेन में जन्मे और अधिक उम्र के पुरुष थे — जबकि इंग्लैंड में टीबी के सामान्य मरीज विदेश में जन्मे और औसतन 36 वर्ष की आयु के होते हैं। इसका अर्थ यह है कि स्वास्थ्यकर्मी उन मरीजों में टीबी की संभावना को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं जो 'सामान्य प्रोफाइल' से मेल नहीं खाते।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि लंदन के बाहर रहने वाले और शराब या नशीले पदार्थों के सेवन के इतिहास वाले व्यक्तियों में मृत्यु के बाद टीबी निदान की दर अधिक थी। इसके अलावा, चार वर्ष से कम आयु के बच्चों में भी जोखिम उच्च पाया गया, क्योंकि उनका प्रतिरक्षा तंत्र अपरिपक्व होता है, लक्षण सामान्य बीमारियों जैसे दिखते हैं और नमूने लेना कठिन होता है।
विशेषज्ञों की चेतावनी
अध्ययन की सह-लेखिका और लिवरपूल यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल्स एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट की रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. एलेनोर मॉर्गन ने कहा, 'जब टीबी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, तब हमें हर मरीज के बारे में यह सवाल पूछते रहना चाहिए — क्या यह टीबी हो सकती है? भले ही वह सामान्य जोखिम वाले समूह में न आता हो।'
विशेषज्ञों ने मृत्यु के बाद टीबी की पहचान को 'नेवर इवेंट' घोषित करने की माँग की है — यानी ऐसी घटना जो किसी भी परिस्थिति में नहीं होनी चाहिए और जिसकी तत्काल जाँच अनिवार्य होनी चाहिए। उन्होंने इसे 'निदान में सबसे बड़ी देरी' बताया।
इंग्लैंड में टीबी की बिगड़ती स्थिति
यह शोध ऐसे समय में आया है जब इंग्लैंड में टीबी की दर पिछले 10 वर्षों में सर्वाधिक हो गई है। वर्ष 2024 में प्रति एक लाख आबादी पर 9.4 मामले दर्ज किए गए — जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की 'कम संक्रमण वाले देश' की सीमा के बेहद करीब है। वैश्विक स्तर पर 2024 में लगभग 12.3 लाख लोगों की मृत्यु टीबी से हुई और 1.07 करोड़ लोग संक्रमित हुए।
एनएचएस में जाँच प्रणाली की माँग
अध्ययन के वरिष्ठ लेखक और लिवरपूल स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन के डॉ. टॉम विंगफील्ड ने कहा कि जिस प्रकार एमआरएसए या क्लॉस्ट्रिडियोइड्स डिफिसाइल जैसे सुपरबग से होने वाली मौतों की एनएचएस (NHS) में नियमित जाँच होती है, उसी तरह टीबी से जुड़ी प्रत्येक मौत की भी गहन समीक्षा होनी चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि देर से निदान होने पर मरीज की स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव पड़ता है और संक्रमण के अन्य लोगों तक फैलने की संभावना भी बढ़ जाती है। हालाँकि उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि टीबी पूरी तरह रोकथाम योग्य और इलाज योग्य बीमारी है — विशेष एंटीबायोटिक दवाओं से इसका सफल उपचार संभव है और नई दवाओं की मदद से दवा-प्रतिरोधी टीबी की उपचार अवधि भी काफी घट गई है।
आगे की राह
शोधकर्ताओं का मानना है कि स्वास्थ्यकर्मियों को टीबी के 'असामान्य प्रोफाइल' वाले मरीजों के प्रति भी सतर्क रहना होगा। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब इंग्लैंड में टीबी निदान की खामियाँ उजागर हुई हों, लेकिन मृत्यु के बाद पहचान की यह दर एक नई और गंभीर चेतावनी है। विशेषज्ञों के अनुसार, NHS में व्यवस्थित मृत्यु-समीक्षा और जागरूकता अभियान ही इस प्रवृत्ति को पलट सकते हैं।