टोरंटो में भागवत बोले: दुनिया के टकराव का हल है भारत का 'तीसरा रास्ता'
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 31 अगस्त को टोरंटो में कहा कि वैश्विक टकराव, पर्यावरण संकट और व्यक्तिगत सुख बनाम सामाजिक प्रगति के बीच के तनाव का समाधान एक भारतीय 'तीसरे रास्ते' में निहित है। ग्रेटर टोरंटो क्षेत्र में 2,000 से अधिक हिंदुओं और समुदाय के मित्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने यह विचार रखे।
मुख्य वक्तव्य: दुनिया उलझन में है
भागवत ने कहा कि मानवता ने विज्ञान और तकनीक में अभूतपूर्व प्रगति की है, लेकिन इसका उपयोग अक्सर विनाशकारी उद्देश्यों के लिए हुआ है। उन्होंने परमाणु ऊर्जा का उदाहरण देते हुए कहा, "साफ ऊर्जा दूसरे नंबर पर है। बड़े पैमाने पर तबाही मचाने वाले हथियार प्राथमिकता पर हैं। हम परमाणु का इस्तेमाल सबसे पहले उन्हीं के लिए करते हैं।"
उन्होंने वैश्विक स्थिति का वर्णन करते हुए कहा, "बहुत सारे टकराव हैं। इकोलॉजी और पर्यावरण खतरे में हैं। दुनिया उलझन में है। देश तो हैं, लेकिन वे आपस में झगड़ते हैं।" भागवत ने यह भी रेखांकित किया कि राष्ट्रीय प्रगति की महत्वाकांक्षा कभी-कभी दूसरे देशों के नुकसान की कीमत पर आती है।
व्यक्ति और समाज के बीच का द्वंद्व
भागवत के अनुसार आधुनिक विकास मॉडल अक्सर व्यक्ति की खुशी और समाज की भलाई को परस्पर विरोधी लक्ष्यों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने प्रश्न उठाया, "अगर किसी व्यक्ति को खुश रहना है, तो समाज को नुकसान उठाना पड़ता है। अगर हम एक खुशहाल समाज बनाने की कोशिश करते हैं, तो व्यक्तियों को कीमत चुकानी पड़ती है। इसका क्या रास्ता है?"
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन, भू-राजनीतिक संघर्ष और आर्थिक असमानता एक साथ चरम पर हैं — और पश्चिमी उदारवाद तथा राज्य-नियंत्रित मॉडल दोनों ही इन समस्याओं का स्थायी समाधान देने में सीमित नज़र आ रहे हैं।
भारतीय 'तीसरे रास्ते' की अवधारणा
भागवत ने इस विकल्प को एक ऐसी प्राचीन भारतीय सोच के रूप में परिभाषित किया जिसमें व्यक्ति, समाज और प्रकृति एक-दूसरे को क्षति पहुँचाए बिना सह-अस्तित्व में आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने कहा, "एक तीसरा रास्ता होना चाहिए और यह नया तीसरा रास्ता हिंदुस्तान का बहुत पुराना तरीका है।"
उन्होंने इस दर्शन को मानवता और प्राकृतिक जगत के बीच की अंतर्निहित एकता की पहचान से उत्पन्न बताया। भागवत ने कहा, "व्यक्ति, समाज और पर्यावरण एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाए बिना साथ-साथ तरक्की कर सकते हैं। हम धर्म के जरिए परम सत्य को जानकर मोक्ष को न भूले बिना अपनी इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं।"
असहमति और एकता पर आह्वान
भागवत ने असहमति को शून्य-योग प्रतिस्पर्धा मानने के बजाय आत्म-मंथन और परस्पर सुधार का आह्वान किया। उन्होंने कहा, "चाहे आप सही हों या मैं, दोनों ही सही हो सकते हैं और दोनों में कुछ कमियां भी हो सकती हैं। हमें आत्म-मंथन करने और खुद को सुधारने की जरूरत है।"
उन्होंने विविधता में एकता पर बल देते हुए कहा, "कई तरह की राय हैं। कई तरह के लोग और प्रवृत्तियां हैं। कई पसंद-नापसंद हैं, लेकिन फिर भी हमने साथ रहने का संकल्प लिया है।" गौरतलब है कि भागवत की यह टोरंटो यात्रा ऐसे समय में हुई जब कनाडा-भारत राजनयिक संबंधों में तनाव का दौर जारी है, जिससे प्रवासी भारतीय समुदाय के साथ संवाद और भी सांकेतिक महत्व रखता है।
भागवत की यह अपील भारत की सभ्यतागत विरासत को एक वैश्विक समाधान-ढाँचे के रूप में प्रस्तुत करने की दिशा में RSS की व्यापक वैचारिक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है।