31 अगस्त 2026
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टोरंटो में भागवत बोले: दुनिया के टकराव का हल है भारत का 'तीसरा रास्ता'

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टोरंटो में भागवत बोले: दुनिया के टकराव का हल है भारत का 'तीसरा रास्ता'

सारांश

टोरंटो में 2,000 से अधिक लोगों के सामने आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने दुनिया के टकराव, पर्यावरण संकट और व्यक्ति-समाज के द्वंद्व का हल भारत के प्राचीन दर्शन में बताया — एक ऐसा 'तीसरा रास्ता' जहाँ व्यक्ति, समाज और प्रकृति साथ-साथ फल-फूल सकें।

मुख्य बातें

आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने 31 अगस्त को टोरंटो में 2,000 से अधिक हिंदुओं और समुदाय के मित्रों को संबोधित किया।
भागवत ने कहा कि वैश्विक टकराव, पर्यावरण संकट और व्यक्ति-समाज के तनाव का समाधान भारत के 'तीसरे रास्ते' में है।
उन्होंने परमाणु ऊर्जा के उदाहरण से बताया कि वैज्ञानिक उपलब्धि का उपयोग पहले विनाश के लिए हुआ, स्वच्छ ऊर्जा के लिए नहीं।
भागवत ने कहा कि व्यक्ति, समाज और पर्यावरण एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाए बिना साथ-साथ प्रगति कर सकते हैं।
उन्होंने असहमति को प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि आत्म-मंथन का अवसर बताया और विविधता में एकता का आह्वान किया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 31 अगस्त को टोरंटो में कहा कि वैश्विक टकराव, पर्यावरण संकट और व्यक्तिगत सुख बनाम सामाजिक प्रगति के बीच के तनाव का समाधान एक भारतीय 'तीसरे रास्ते' में निहित है। ग्रेटर टोरंटो क्षेत्र में 2,000 से अधिक हिंदुओं और समुदाय के मित्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने यह विचार रखे।

मुख्य वक्तव्य: दुनिया उलझन में है

भागवत ने कहा कि मानवता ने विज्ञान और तकनीक में अभूतपूर्व प्रगति की है, लेकिन इसका उपयोग अक्सर विनाशकारी उद्देश्यों के लिए हुआ है। उन्होंने परमाणु ऊर्जा का उदाहरण देते हुए कहा, "साफ ऊर्जा दूसरे नंबर पर है। बड़े पैमाने पर तबाही मचाने वाले हथियार प्राथमिकता पर हैं। हम परमाणु का इस्तेमाल सबसे पहले उन्हीं के लिए करते हैं।"

उन्होंने वैश्विक स्थिति का वर्णन करते हुए कहा, "बहुत सारे टकराव हैं। इकोलॉजी और पर्यावरण खतरे में हैं। दुनिया उलझन में है। देश तो हैं, लेकिन वे आपस में झगड़ते हैं।" भागवत ने यह भी रेखांकित किया कि राष्ट्रीय प्रगति की महत्वाकांक्षा कभी-कभी दूसरे देशों के नुकसान की कीमत पर आती है।

व्यक्ति और समाज के बीच का द्वंद्व

भागवत के अनुसार आधुनिक विकास मॉडल अक्सर व्यक्ति की खुशी और समाज की भलाई को परस्पर विरोधी लक्ष्यों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने प्रश्न उठाया, "अगर किसी व्यक्ति को खुश रहना है, तो समाज को नुकसान उठाना पड़ता है। अगर हम एक खुशहाल समाज बनाने की कोशिश करते हैं, तो व्यक्तियों को कीमत चुकानी पड़ती है। इसका क्या रास्ता है?"

यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन, भू-राजनीतिक संघर्ष और आर्थिक असमानता एक साथ चरम पर हैं — और पश्चिमी उदारवाद तथा राज्य-नियंत्रित मॉडल दोनों ही इन समस्याओं का स्थायी समाधान देने में सीमित नज़र आ रहे हैं।

भारतीय 'तीसरे रास्ते' की अवधारणा

भागवत ने इस विकल्प को एक ऐसी प्राचीन भारतीय सोच के रूप में परिभाषित किया जिसमें व्यक्ति, समाज और प्रकृति एक-दूसरे को क्षति पहुँचाए बिना सह-अस्तित्व में आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने कहा, "एक तीसरा रास्ता होना चाहिए और यह नया तीसरा रास्ता हिंदुस्तान का बहुत पुराना तरीका है।"

उन्होंने इस दर्शन को मानवता और प्राकृतिक जगत के बीच की अंतर्निहित एकता की पहचान से उत्पन्न बताया। भागवत ने कहा, "व्यक्ति, समाज और पर्यावरण एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाए बिना साथ-साथ तरक्की कर सकते हैं। हम धर्म के जरिए परम सत्य को जानकर मोक्ष को न भूले बिना अपनी इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं।"

असहमति और एकता पर आह्वान

भागवत ने असहमति को शून्य-योग प्रतिस्पर्धा मानने के बजाय आत्म-मंथन और परस्पर सुधार का आह्वान किया। उन्होंने कहा, "चाहे आप सही हों या मैं, दोनों ही सही हो सकते हैं और दोनों में कुछ कमियां भी हो सकती हैं। हमें आत्म-मंथन करने और खुद को सुधारने की जरूरत है।"

उन्होंने विविधता में एकता पर बल देते हुए कहा, "कई तरह की राय हैं। कई तरह के लोग और प्रवृत्तियां हैं। कई पसंद-नापसंद हैं, लेकिन फिर भी हमने साथ रहने का संकल्प लिया है।" गौरतलब है कि भागवत की यह टोरंटो यात्रा ऐसे समय में हुई जब कनाडा-भारत राजनयिक संबंधों में तनाव का दौर जारी है, जिससे प्रवासी भारतीय समुदाय के साथ संवाद और भी सांकेतिक महत्व रखता है।

भागवत की यह अपील भारत की सभ्यतागत विरासत को एक वैश्विक समाधान-ढाँचे के रूप में प्रस्तुत करने की दिशा में RSS की व्यापक वैचारिक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसकी व्यावहारिक रूपरेखा अस्पष्ट रहती है — यह न कोई नीतिगत प्रस्ताव है, न कोई संस्थागत ढाँचा। टोरंटो जैसे मंच का चुनाव सांकेतिक है: ऐसे समय में जब कनाडा-भारत संबंध तनावपूर्ण हैं, प्रवासी हिंदू समुदाय से सीधा संवाद एक कूटनीतिक उपस्थिति भी है। आलोचक पूछ सकते हैं कि यह दर्शन घरेलू स्तर पर — जहाँ पर्यावरण नीति, सामाजिक समरसता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच के तनाव कहीं अधिक तीखे हैं — किस रूप में लागू होता है। विचार की सार्वभौमिकता तभी विश्वसनीय होगी जब वह भारत के भीतर भी उतनी ही दृढ़ता से लागू हो।
RashtraPress
31 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मोहन भागवत ने टोरंटो में 'तीसरे रास्ते' से क्या मतलब बताया?
भागवत ने 'तीसरे रास्ते' को एक प्राचीन भारतीय दर्शन के रूप में परिभाषित किया जिसमें व्यक्ति, समाज और प्रकृति एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाए बिना साथ-साथ प्रगति कर सकते हैं। यह पश्चिमी व्यक्तिवाद और राज्य-केंद्रित मॉडल दोनों का विकल्प है।
भागवत ने परमाणु ऊर्जा का उदाहरण क्यों दिया?
भागवत ने परमाणु ऊर्जा को यह दर्शाने के लिए उदाहरण के रूप में लिया कि मानव की वैज्ञानिक उपलब्धि का उपयोग पहले विनाशकारी हथियारों के लिए हुआ, स्वच्छ ऊर्जा के लिए नहीं। यह उनकी इस व्यापक थीसिस का हिस्सा था कि आधुनिक प्रगति अक्सर गलत दिशा में जाती है।
भागवत का यह भाषण किस संदर्भ में हुआ?
यह भाषण 31 अगस्त को ग्रेटर टोरंटो क्षेत्र में 2,000 से अधिक हिंदुओं और समुदाय के मित्रों के एक कार्यक्रम में हुआ। यह यात्रा ऐसे समय में हुई जब भारत-कनाडा राजनयिक संबंधों में तनाव का दौर जारी है।
भागवत ने असहमति और एकता पर क्या कहा?
भागवत ने कहा कि असहमति को शून्य-योग प्रतिस्पर्धा नहीं मानना चाहिए — दोनों पक्ष सही भी हो सकते हैं और दोनों में कमियाँ भी हो सकती हैं। उन्होंने आत्म-मंथन और विविधता के बावजूद साथ रहने के संकल्प पर बल दिया।
RSS प्रमुख के अनुसार राष्ट्रीय प्रगति की क्या सीमा है?
भागवत ने चेतावनी दी कि राष्ट्रीय प्रगति की महत्वाकांक्षा कभी-कभी दूसरे देशों के नुकसान की कीमत पर आती है। उनके अनुसार इसीलिए एक ऐसे वैकल्पिक ढाँचे की जरूरत है जो वैश्विक सह-अस्तित्व को प्राथमिकता दे।
राष्ट्र प्रेस
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