विकास का अधिकार सबका: भारत ने UNGA में नए समझौते को जल्द अपनाने का किया आह्वान
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मंत्रालय (MEA) में सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज ने 24 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के हाई-लेवल सेशन में भारत का राष्ट्रीय बयान देते हुए समावेशी विकास, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार के प्रति देश की प्रतिबद्धता दोहराई। यह अवसर था 'विकास के अधिकार पर घोषणा' की 40वीं वर्षगांठ, जिसमें भारत ने 'विकास के अधिकार पर समझौते' को शीघ्र अपनाने का खुलकर समर्थन किया।
भारत का रुख और मुख्य बिंदु
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज ने सभी को साथ लेकर विकास, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और बहुपक्षीय सुधारों को लेकर भारत की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने 'विकास के अधिकार पर समझौते' को जल्द अपनाने का समर्थन किया।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक दक्षिण के देश लंबे समय से यह माँग करते रहे हैं कि विकास को एक अहरणीय मानवाधिकार के रूप में कानूनी बाध्यकारी दर्जा दिया जाए।
विकास के अधिकार पर घोषणा क्या कहती है
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, विकास का अधिकार एक ऐसा मानवाधिकार है जिसे किसी व्यक्ति से छीना नहीं जा सकता। इसके तहत हर व्यक्ति और समूह को आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विकास में भाग लेने, योगदान देने और उसका लाभ उठाने का अधिकार है।
संयुक्त राष्ट्र ने कहा, 'इस घोषणा को अपनाए जाने के बाद से इसने टिकाऊ विकास, गरीबी खत्म करने, समाज में सभी की भागीदारी सुनिश्चित करने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की दिशा में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कोशिशों को रास्ता दिखाया है।'
चार दशकों में प्रगति और शेष चुनौतियाँ
संयुक्त राष्ट्र के आकलन के अनुसार, पिछले 40 वर्षों में करोड़ों लोगों को अत्यंत गरीबी से बाहर निकाला गया है और शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बेहतर हुई है। हालाँकि, यह प्रगति सभी देशों और समुदायों के लिए एक समान नहीं रही।
संयुक्त राष्ट्र ने स्वीकार किया कि 'कई देशों को ऐसी बुनियादी और व्यवस्थागत रुकावटों का सामना करना पड़ रहा है, जो उनके विकास की संभावनाओं को सीमित करती हैं। इसके साथ ही दुनिया में विकास के लिए जरूरी वित्तपोषण की कमी भी लगातार बनी हुई है।'
40वीं वर्षगांठ का महत्व
यह वर्षगांठ महज एक औपचारिक स्मरण नहीं है। गौरतलब है कि वैश्विक असमानता, जलवायु परिवर्तन और बढ़ते ऋण संकट के बीच यह अवसर विकास के अधिकार को पुनः केंद्र में लाने का महत्वपूर्ण मंच बन गया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इस मंच के माध्यम से आज की वैश्विक चुनौतियों से निपटने और सभी के लिए अधिक समावेशी, टिकाऊ और न्यायसंगत भविष्य की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं।
आगे की राह
भारत के इस समर्थन से उम्मीद है कि 'विकास के अधिकार पर समझौते' को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक स्वीकृति मिलेगी। बहुपक्षीय सुधारों पर भारत का जोर यह संकेत देता है कि नई दिल्ली वैश्विक दक्षिण की आवाज़ को संयुक्त राष्ट्र मंचों पर और मजबूती से उठाने का इरादा रखती है।