ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता: ईरान-यूएई को बातचीत की मेज पर लाया
सारांश
मुख्य बातें
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर स्वर्ण सिंह के अनुसार, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत ने महज घोषणापत्र पर हस्ताक्षर तक सीमित न रहकर एक निर्णायक कूटनीतिक भूमिका निभाई है। उनके मुताबिक भारत की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि ईरान के राष्ट्रपति की मेजबानी और ईरान व संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच के तनाव को कम कर दोनों नेताओं को एक ही मंच पर लाना रही। 14 सितंबर 2026 को साझा किए गए इस विश्लेषण में प्रोफेसर सिंह ने दिल्ली घोषणापत्र को विकास, आतंकवाद और ग्लोबल साउथ पर भारत के ठोस रुख की अभिव्यक्ति बताया।
ईरान-यूएई तनाव में भारत की मध्यस्थ भूमिका
प्रोफेसर स्वर्ण सिंह ने बताया कि मई 2026 में ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में ईरान और यूएई के बीच मतभेदों के कारण सहमति नहीं बन पाई थी। लेकिन दिल्ली शिखर सम्मेलन में ईरान के राष्ट्रपति और यूएई के क्राउन प्रिंस आमने-सामने बैठकर संवाद करते दिखे — जिसे प्रोफेसर सिंह ने भारत की 'बड़ी कूटनीतिक सफलता' करार दिया।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ईरानी राष्ट्रपति की बॉडी लैंग्वेज चर्चा का विषय बनी। ईरानी राष्ट्रपति एकमात्र राष्ट्राध्यक्ष रहे जो दिल्ली आए और जिनकी भारत के राष्ट्रपति से भी मुलाकात हुई। खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता, होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखने और ओमान-ईरान के बीच समन्वय पर भी बातचीत हुई।
दिल्ली घोषणापत्र: विकास-केंद्रित ब्रिक्स की नई पहचान
प्रोफेसर सिंह के अनुसार इस वर्ष की ब्रिक्स थीम 'BRICS' शब्द के अक्षरों पर आधारित है — Building, Resilience, Innovation, Cooperation और Sustainability — जो स्पष्ट करती है कि ध्यान भू-राजनीतिक टकराव पर नहीं, बल्कि आर्थिक और तकनीकी साझेदारी पर है। पश्चिमी देशों में यह धारणा प्रचलित रही है कि ब्रिक्स पश्चिम-विरोधी मंच है; दिल्ली शिखर सम्मेलन ने इसी छवि को बदलने का प्रयास किया।
यही कारण रहा कि भारत ने शेरपा के रूप में विदेश मंत्रालय में आर्थिक संबंध सचिव को नियुक्त किया — एक संरचनात्मक निर्णय जो प्राथमिकताओं की दिशा दर्शाता है। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब ब्रिक्स के विस्तार के बाद उसकी एकजुटता और प्रासंगिकता पर सवाल उठ रहे थे।
आतंकवाद पर ब्रिक्स में बनी सहमति
प्रोफेसर सिंह ने बताया कि दिल्ली घोषणापत्र में आतंकवाद को पूरे चार पैराग्राफ समर्पित किए गए हैं। इसमें जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले का विशेष उल्लेख है। आतंकवाद-विरोध ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच आम सहमति का विषय बन गया है, जो कूटनीतिक दृष्टि से भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
रूस-यूक्रेन संघर्ष पर भारत का स्पष्ट संदेश
भू-राजनीतिक मसलों पर घोषणापत्र में सीधा उल्लेख नहीं है, लेकिन प्रोफेसर सिंह के अनुसार भारत ने अपने बयानों में स्पष्ट रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री मोदी कई अवसरों पर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को यह कह चुके हैं कि 'यह युग युद्ध का नहीं है।' हाल ही में बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक में भी मोदी ने कहा था कि यह अंतहीन युद्ध समाप्त होना चाहिए, क्योंकि इसका प्रभाव पूरी मानवता पर पड़ रहा है।
ग्लोबल साउथ की 'आवाज़': नेता नहीं, साझेदार
प्रोफेसर सिंह ने भारत की ग्लोबल साउथ नीति की व्याख्या करते हुए कहा कि भारत खुद को ग्लोबल साउथ का नेता नहीं, बल्कि उसकी 'आवाज़' मानता है। प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार भारत की जिम्मेदारी सर्वसम्मति बनाने तक नहीं, बल्कि उन निर्णयों को अंतिम परिणाम तक पहुँचाने की है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के अनुसार शिखर सम्मेलन में करीब 50 ठोस प्रस्ताव रखे गए हैं, जिनके परिणाम आने वाले महीनों में दिखेंगे। अगले तीन महीनों में कई बैठकें निर्धारित हैं। असली परीक्षा यह होगी कि दिल्ली घोषणापत्र के ये प्रस्ताव ज़मीन पर कितने उतरते हैं।