ब्रिक्स घोषणापत्र पर सहमति बड़ी कूटनीतिक जीत, लेकिन पश्चिम एशिया-यूक्रेन का हल ट्रंप के हाथ: KP फैबियन
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मामलों के वरिष्ठ विशेषज्ञ केपी फैबियन ने 12 सितंबर 2026 को कहा कि भारत की अध्यक्षता में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में साझा घोषणापत्र पर सभी सदस्य देशों की सहमति एक उल्लेखनीय कूटनीतिक सफलता है। हालाँकि उनके अनुसार, पश्चिम एशिया और यूक्रेन जैसे गहरे वैश्विक संघर्षों का समाधान ब्रिक्स मंच से नहीं, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सीधी कूटनीतिक पहलों पर निर्भर करेगा।
घोषणापत्र पर सहमति क्यों है अहम
फैबियन ने रेखांकित किया कि यह सहमति इसलिए और भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने वाले देशों में ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और सऊदी अरब — तीनों आपसी तनाव की स्थिति में हैं। उन्होंने कहा, 'भारत की अध्यक्षता में एक घोषणापत्र जारी करने में सफलता मिली है, जिस पर सभी ब्रिक्स देश सहमत हुए हैं।'
उनके अनुसार ईरान, जिस पर फरवरी में इज़रायल और अमेरिका ने हमला किया था और जिसके विरुद्ध अमेरिका ने अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए थे, उसी के साथ यूएई — जिस पर ईरान ने हमला किया था — एक ही मंच पर आए। फैबियन के शब्दों में, 'ईरान भले ही कहे कि उसने सिर्फ अमेरिकी ठिकानों और संबंधित सुविधाओं को निशाना बनाया, लेकिन यह यूएई पर हमला ही था।' ऐसी परिस्थितियों में एकमत घोषणापत्र किसी साधारण उपलब्धि से कम नहीं।
सऊदी अरब और हूती हमलों का संदर्भ
विशेषज्ञ फैबियन ने सऊदी अरब की स्थिति का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि ब्रिक्स सम्मेलन के उसी दिन हूती विद्रोहियों ने सऊदी तेल संयंत्रों पर हमला किया, और इसके बाद इराक से किसी अज्ञात प्रतिरोध समूह ने पाइपलाइन को नुकसान पहुँचाया। गौरतलब है कि इराक ने सऊदी अरब से जवाबी कार्रवाई न करने का अनुरोध किया और सऊदी अरब उस पर राजी हो गया — जिसे फैबियन ने 'बेहद महत्त्वपूर्ण' संयम बताया।
उन्होंने यह भी बताया कि सऊदी युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने राष्ट्रपति ट्रंप से हूती विद्रोहियों पर साझा सैन्य कार्रवाई का अनुरोध किया था, किंतु ट्रंप ने इनकार कर दिया। इस घटनाक्रम से स्पष्ट होता है कि खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सदस्य देश इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मौजूदा हालात में कूटनीति और संवाद ही एकमात्र रास्ता है।
होर्मुज़ जलसंधि और सक्रिय कूटनीति
फैबियन ने बताया कि GCC, ईरान और इराक ओमान में होर्मुज़ स्ट्रेट तक पहुँच को लेकर संभावित व्यवस्था पर चर्चा के लिए मिल रहे हैं — जो यह दर्शाता है कि कूटनीतिक प्रक्रिया सक्रिय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कई अवसरों पर यह रेखांकित किया है कि संवाद और कूटनीति ही किसी भी संघर्ष का स्थायी हल है। फैबियन ने इस बात से सहमति जताई, हालाँकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वह मौजूदा स्थिति से 'बहुत खुश नहीं' हैं।
पश्चिम एशिया और यूक्रेन: ब्रिक्स की सीमाएँ
फैबियन ने स्पष्ट किया कि पश्चिम एशिया में किसी भी स्थायी समाधान के लिए अमेरिका और ईरान के बीच सीधी राजनयिक बातचीत आवश्यक है, और यह मुख्यतः राष्ट्रपति ट्रंप की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है। उन्होंने जोड़ा कि ईरान में कुछ वर्ग यह भी कह रहे हैं कि 'अमेरिका को हमला करने दो, हम इसे झेल लेंगे' — जो बातचीत को और जटिल बनाता है।
यूक्रेन संघर्ष के बारे में भी उनका मत समान था। उनके अनुसार, यूक्रेन का हल मूलतः राष्ट्रपति ट्रंप और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की आपसी सहमति पर टिका है। फैबियन ने कहा कि एक बार जब दोनों नेता किसी समझौते पर पहुँच जाएंगे, तो राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की को झुकना होगा। ब्रिक्स घोषणापत्र इस दिशा में कोई निर्णायक भूमिका नहीं निभा सकता।
आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक बहुध्रुवीय व्यवस्था की दिशा में ब्रिक्स जैसे मंचों की प्रासंगिकता पर व्यापक बहस छिड़ी हुई है। फैबियन की टिप्पणियाँ यह संकेत देती हैं कि ब्रिक्स एकता की प्रतीकात्मक शक्ति तो है, परंतु जटिल भू-राजनीतिक संघर्षों में उसकी व्यावहारिक भूमिका सीमित है — और निर्णायक शक्ति अभी भी वाशिंगटन के गलियारों में केंद्रित है।