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भारत-चीन साझेदारी पर विशेषज्ञ वाइल अव्वाद: सीमा विवाद सुलझे तो द्विपक्षीय व्यापार को मिलेगी बड़ी रफ्तार

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भारत-चीन साझेदारी पर विशेषज्ञ वाइल अव्वाद: सीमा विवाद सुलझे तो द्विपक्षीय व्यापार को मिलेगी बड़ी रफ्तार

सारांश

विदेशी मामलों के विशेषज्ञ वाइल अव्वाद का मानना है कि भारत-चीन सीमा विवाद के हल होते ही द्विपक्षीय व्यापार की नई इबारत लिखी जा सकती है। मोदी-शी मुलाकात को उन्होंने विश्वास बहाली का अहम पड़ाव बताया और कहा कि बहुध्रुवीय दुनिया में इन दोनों देशों की साझेदारी वैश्विक संतुलन के लिए निर्णायक होगी।

मुख्य बातें

विदेशी मामलों के विशेषज्ञ वाइल अव्वाद ने 15 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि भारत-चीन के बीच प्रतिद्वंद्विता नहीं, साझेदारी की ज़रूरत है।
सीमा विवाद सुलझने पर दोनों देशों के बीच बड़े पैमाने पर व्यापार बढ़ाने की संभावना जताई।
भारत ने चीन को स्पष्ट किया — सीमा समस्या हल हुए बिना आर्थिक क्षेत्र में अधिक प्रगति संभव नहीं।
दिल्ली घोषणापत्र में भारत की चिंताओं को स्थान मिलना दोनों देशों के करीब आने का संकेत — अव्वाद।
अगले साल चीन में प्रस्तावित बैठक दक्षिण-दक्षिण सहयोग और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मज़बूती देगी।
अव्वाद के अनुसार, चीन लंबित सीमा विवाद सुलझाने में अधिक समझदारी दिखा रहा है।

विदेशी मामलों के विशेषज्ञ वाइल अव्वाद ने 15 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि भारत और चीन के बीच प्रतिद्वंद्विता नहीं बल्कि रणनीतिक साझेदारी की ज़रूरत है, क्योंकि दुनिया एशिया के इन दोनों दिग्गजों को एक साथ समायोजित करने में सक्षम है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की हालिया मुलाकात को विश्वास बहाली और द्विपक्षीय संबंधों में एक नए, स्थिर अध्याय की शुरुआत के रूप में रेखांकित किया।

साझेदारी की ज़रूरत क्यों

अव्वाद ने कहा, 'जैसा कि दोनों नेता कहते रहे हैं, दुनिया एशिया के दोनों दिग्गजों को समायोजित कर सकती है, इसलिए प्रतिद्वंद्वी होने के बजाय साझेदारी होनी चाहिए।' उनके अनुसार, इस दौरे ने दोनों देशों के बीच विश्वास-निर्माण उपायों को मज़बूत किया है — विशेषकर आमने-सामने की मुलाकात और दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत तालमेल के संदर्भ में। गौरतलब है कि शीर्ष स्तरीय राजनयिक संपर्क का सीधा असर नीति-निर्माण की गति पर पड़ता है।

सीमा विवाद और व्यापार का सीधा संबंध

अव्वाद का स्पष्ट मत था कि सीमा मुद्दे को सौहार्दपूर्ण ढंग से और दोनों देशों की आवश्यकताओं के अनुसार हल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि सीमा विवाद सुलझ जाए तो भारत-चीन व्यापार बड़े पैमाने पर बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत ने चीन को स्पष्ट संदेश दे दिया है — 'समस्या को सुलझाए बिना आर्थिक क्षेत्र में ज़्यादा प्रगति नहीं होगी।' यह रुख भारत की सुविचारित कूटनीतिक स्थिति को दर्शाता है, जहाँ भू-राजनीतिक सुरक्षा को आर्थिक सहयोग से अलग नहीं किया गया है।

दिल्ली घोषणापत्र और बहुध्रुवीय विश्व

विशेषज्ञ ने कहा कि दिल्ली घोषणापत्र में भारत की चिंताओं को स्थान मिलना इस बात का प्रमाण है कि दोनों देश कई मुद्दों पर अपने दृष्टिकोण को करीब ला रहे हैं। उनके अनुसार, अगले साल चीन में प्रस्तावित बैठक दक्षिण-दक्षिण सहयोग को और मज़बूत करेगी तथा एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को आगे बढ़ाएगी — जहाँ एकध्रुवीय दुनिया पहले ही अप्रासंगिक हो चुकी है। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक शक्ति-संतुलन तेज़ी से बदल रहा है और विकासशील देशों की सामूहिक आवाज़ अधिक प्रभावशाली होती जा रही है।

भारत की कूटनीतिक ताकत

अव्वाद ने भारत की वैश्विक स्थिति को मज़बूत बताते हुए कहा कि अमेरिका, पश्चिमी देशों और एशियाई राष्ट्रों के साथ भारत के सुदृढ़ संबंध उसे एक अनोखी कूटनीतिक स्थिति में रखते हैं। उनके अनुसार, 'चीन सभी लंबित समस्याओं — विशेषकर सीमा विवाद — को सुलझाने में अधिक समझदारी दिखा रहा है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि दोनों देश दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले और सबसे तेज़ विकसित हो रहे देश हैं, इसलिए इनके बीच स्थायी सहयोग का असर न केवल एशिया पर, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था पर पड़ेगा।

आगे की राह

विशेषज्ञों की राय में, मोदी-शी शिखर वार्ता ने एक सकारात्मक संकेत दिया है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब दोनों देशों के अधिकारी इन दिशाओं पर ठोस प्रगति करेंगे। अव्वाद के अनुसार, जब शीर्ष नेताओं के बीच तालमेल बनता है तो अधिकारी उन्हीं लाइनों पर द्विपक्षीय संबंधों को बहाल करने में जुट जाते हैं — और यही प्रक्रिया अभी सक्रिय है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और यह रुख 2020 के गलवान संघर्ष के बाद से भारत की सुसंगत नीति रही है। दिल्ली घोषणापत्र में भारतीय चिंताओं का उल्लेख एक कूटनीतिक सफलता है, लेकिन असली परीक्षण वास्तविक नियंत्रण रेखा पर ज़मीनी स्थिति से होगी — न कि दस्तावेज़ी भाषा से। बहुध्रुवीय विश्व का तर्क दोनों देशों के साझा हित में है, पर यह नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए कि हिंद महासागर, दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका में चीन के विस्तारवादी रुझान और भारत के रणनीतिक हित अभी भी टकराते हैं — साझेदारी की कोई भी कथा इन विरोधाभासों की अनदेखी नहीं कर सकती।
RashtraPress
16 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वाइल अव्वाद ने भारत-चीन संबंधों पर क्या कहा?
विदेशी मामलों के विशेषज्ञ वाइल अव्वाद ने कहा कि दुनिया एशिया के दोनों दिग्गजों — भारत और चीन — को एक साथ समायोजित कर सकती है, इसलिए प्रतिद्वंद्विता के बजाय साझेदारी होनी चाहिए। उन्होंने मोदी-शी मुलाकात को विश्वास बहाली और स्थिर द्विपक्षीय संबंधों की नई शुरुआत बताया।
भारत-चीन सीमा विवाद और व्यापार का क्या संबंध है?
अव्वाद के अनुसार, भारत ने चीन को स्पष्ट कर दिया है कि सीमा समस्या सुलझे बिना आर्थिक क्षेत्र में अधिक प्रगति संभव नहीं। यदि सीमा विवाद सौहार्दपूर्ण तरीके से हल हो जाए तो दोनों देशों के बीच बड़े पैमाने पर व्यापार को बढ़ावा दिया जा सकता है।
दिल्ली घोषणापत्र का भारत-चीन संबंधों पर क्या असर है?
अव्वाद ने कहा कि दिल्ली घोषणापत्र में भारत की चिंताओं को समर्थन मिलना इस बात का संकेत है कि दोनों देश कई मुद्दों पर अपने दृष्टिकोण को एक-दूसरे के करीब ला रहे हैं। यह दोनों देशों के एक साझा मंच पर आने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है।
मोदी-शी जिनपिंग की मुलाकात का महत्व क्या है?
विशेषज्ञ के अनुसार, जब शीर्ष नेता आमने-सामने मिलते हैं और उनके बीच व्यक्तिगत तालमेल बनता है, तो दोनों देशों के अधिकारी उन्हीं लाइनों पर द्विपक्षीय संबंधों को बहाल करने में जुट जाते हैं। इस मुलाकात को अव्वाद ने भारत-चीन संबंधों में एक नए, स्थिर दौर की शुरुआत बताया।
अगले साल चीन में होने वाली बैठक से क्या उम्मीदें हैं?
अव्वाद के अनुसार, अगले साल चीन में प्रस्तावित बैठक दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मज़बूती देगी और एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को आगे बढ़ाने में मदद करेगी। उनका मानना है कि एकध्रुवीय दुनिया का दौर पहले ही समाप्त हो चुका है और भारत-चीन सहयोग इस नई विश्व व्यवस्था को आकार देने में अहम भूमिका निभाएगा।
राष्ट्र प्रेस
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