वैश्विक मंच पर भारत की विश्वसनीयता: शांति, सहयोग और जवाबदेही की नीति ने बनाई अलग पहचान
सारांश
मुख्य बातें
वैश्विक मंच पर भारत का उदय केवल आर्थिक वृद्धि या भू-राजनीतिक महत्व तक सीमित नहीं है — बल्कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने एक ऐसे राष्ट्र के रूप में अपनी साख स्थापित की है जो अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करता है, द्विपक्षीय समझौतों का पालन करता है और वैश्विक शासन में सक्रिय एवं रचनात्मक योगदान देता है। गल्फ न्यूज में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, यह विश्वसनीयता संयुक्त राष्ट्र शांति-रक्षा अभियानों, बहुपक्षीय संस्थाओं के नियमों के पालन, जलवायु प्रतिबद्धताओं, विकास साझेदारियों और मानवीय सहायता के ज़रिए अर्जित की गई है।
क्षेत्रीय स्थिरता में भारत की भूमिका
अनेक चुनौतियों के बावजूद भारत ने निरंतर क्षेत्रीय स्थिरता, कनेक्टिविटी और आर्थिक सहयोग में निवेश किया है। विकासशील देशों को क्रेडिट लाइन प्रदान करने से लेकर प्राकृतिक आपदाओं के दौरान आपातकालीन सहायता उपलब्ध कराने तक, भारत ने कई अवसरों पर संकट के समय सबसे पहले पहुँचने वाले देशों में अपनी भूमिका निभाई है।
उदाहरण के तौर पर, कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने अपनी घरेलू चुनौतियों से जूझते हुए भी दर्जनों देशों को दवाएँ और टीके उपलब्ध कराए। 'वैक्सीन मैत्री' पहल के तहत एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और प्रशांत क्षेत्र के देशों को लाखों वैक्सीन डोज़ भेजी गईं।
हिंद महासागर क्षेत्र में सक्रिय सहायता
हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की भूमिका और भी स्पष्ट रही है। श्रीलंका के आर्थिक संकट के दौरान भारत ने उसे सहायता प्रदान की। मालदीव और मॉरिशस को मानवीय सहायता दी गई। संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों से नागरिकों को सुरक्षित निकाला गया और चक्रवात तथा भूकंप जैसी आपदाओं के बाद राहत कार्यों में सक्रिय भागीदारी की गई।
विश्वसनीयता का अर्थ निष्क्रियता नहीं
विश्लेषण में इस बात पर विशेष ज़ोर दिया गया है कि विश्वसनीयता को निष्क्रियता नहीं समझा जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय समझौते आपसी दायित्वों पर टिके होते हैं और किसी भी ज़िम्मेदार देश से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह ऐसी व्यवस्थाओं को अनिश्चित काल तक बनाए रखे जिन्हें लगातार शत्रुता, हिंसा या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरों से कमज़ोर किया जा रहा हो।
इसी संदर्भ में, विश्लेषण के अनुसार, सिंधु जल संधि सहित कुछ द्विपक्षीय समझौतों को निलंबित करने से जुड़ी चर्चाओं को समझा जाना चाहिए। कई युद्धों, सैन्य टकरावों और गंभीर राजनयिक तनाव के दौर के बावजूद भारत ने दशकों तक इस संधि का पालन किया — पानी के बंटवारे से जुड़े बहुत कम अंतरराष्ट्रीय समझौते इतने लंबे समय और कठिन परिस्थितियों में टिक पाए हैं।
सीमा-पार आतंकवाद और सहयोग की सीमाएँ
लगातार सीमा-पार आतंकवाद — जिसमें नागरिकों पर बार-बार हमले और सुरक्षा के लिए निरंतर खतरे शामिल हैं — उन आधारों को प्रभावित करता है जिन पर सहयोग टिका होता है। विश्लेषण के अनुसार, भारत का रुख सुसंगत रहा है: वह शांति चाहता है, लेकिन जवाबदेही पर ज़ोर देता है; बातचीत का समर्थन करता है, लेकिन अहिंसा के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता की अपेक्षा रखता है; समझौतों का सम्मान करता है, लेकिन अपने नागरिकों की सुरक्षा को लगातार बने खतरों के सामने दाँव पर नहीं लगा सकता।
यह विश्लेषण ऐसे समय में आया है जब भारत की विदेश नीति वैश्विक स्तर पर बढ़ती उत्सुकता का विषय बनी हुई है और देश की कूटनीतिक सक्रियता नए आयाम ले रही है।