यूएन सुरक्षा परिषद में भारत की दो-टूक: स्कूलों पर हमले 44% बढ़े, बच्चों की तबाही 'मानवता का घातक फैसला'
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 25 जून 2025 को हुई बहस में भारत ने संघर्ष-क्षेत्रों में बच्चों और स्कूलों को निशाना बनाने वालों के विरुद्ध कड़ी जवाबदेही की माँग रखी। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने कहा कि युद्धग्रस्त इलाकों में फँसे बच्चों की दुर्दशा "मानवता की सामूहिक विफलता का एक भयावह फैसला" है। यह बहस बच्चों और सशस्त्र संघर्षों पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव की वार्षिक रिपोर्ट की पृष्ठभूमि में हुई, जिसमें चेताया गया है कि 2025 में स्कूलों पर हमले 44 प्रतिशत तक बढ़ गए।
मुख्य घटनाक्रम
पी. हरीश ने सुरक्षा परिषद को बताया कि महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में संयुक्त राष्ट्र ने बच्चों के विरुद्ध 38,558 गंभीर उल्लंघनों की पुष्टि की, जिनसे 24,174 बच्चे प्रभावित हुए। उन्होंने कहा, "जवाबदेही के बिना सुरक्षा अधूरी है। जो लोग बिना किसी सज़ा के स्कूलों और बच्चों को निशाना बनाते हैं, उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।"
आँकड़ों के अनुसार दुनिया भर में लगभग 47.3 करोड़ बच्चे — यानी छह में से एक से अधिक — संघर्ष-क्षेत्रों में रह रहे हैं या वहाँ से पलायन कर रहे हैं। इनमें से 8.5 करोड़ से अधिक बच्चों तक शिक्षा की कोई पहुँच नहीं है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
बच्चों और सशस्त्र संघर्ष के लिए महासचिव की विशेष प्रतिनिधि वैनेसा फ्रेजियर ने कहा कि बच्चों के खिलाफ गंभीर उल्लंघनों के मामले में 2025 पिछले 30 वर्षों में सबसे बुरा साल रहा है — जब से उनके कार्यालय को वार्षिक रिपोर्ट तैयार करने का दायित्व सौंपा गया है। फ्रेजियर ने बताया कि अधिकांश सत्यापित उल्लंघन कब्जे वाले फिलिस्तीनी इलाके और इज़रायल, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, नाइजीरिया, म्यांमार और सोमालिया में दर्ज हुए।
यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसेल ने ड्रोन, स्वायत्त प्रणालियों और एआई-समर्थित लक्ष्य-निर्धारण तकनीकों को लेकर गंभीर चेतावनी दी। उन्होंने कहा, "जैसे-जैसे युद्ध का तरीका बदल रहा है, बच्चों की सुरक्षा के प्रति हमारी प्रतिबद्धता सुनिश्चित रहनी चाहिए।"
भारत का प्रस्ताव: डिजिटल शिक्षा मॉडल
हरीश ने भारत के डिजिटल शिक्षा मंच दीक्षा (डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर फॉर नॉलेज शेयरिंग) को संघर्ष-क्षेत्रों में विस्थापित बच्चों की शिक्षा के लिए एक संभावित वैश्विक मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि दीक्षा ने बहुभाषी इंटरैक्टिव सामग्री और एआई-आधारित उपकरणों के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच को सुलभ बनाया है।
उन्होंने जोड़ा, "हमारे अनुभव ने हमें यकीन दिलाया है कि डिजिटल लर्निंग तक पहुँच वह सेतु बन सकती है जो बच्चों को संघर्षों के दौरान शिक्षा पाने में सहायता करती है।"
आम जनता और बच्चों पर असर
भारत ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि युद्ध का सबसे भारी बोझ उठाने वाले बच्चों के लिए शिक्षा की निरंतरता अत्यंत आवश्यक है। इसी दृष्टिकोण के तहत भारत ने अपने पड़ोसी देशों से आए शरणार्थियों और विस्थापित समुदायों की शिक्षा में निवेश किया है, जिसमें स्कूलों और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों का निर्माण शामिल है। हरीश ने कहा, "लगातार सीखते रहना, मज़बूती और पुनर्निर्माण के लिए सबसे शक्तिशाली माध्यमों में से एक है।"
क्या होगा आगे
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर कई सशस्त्र संघर्ष एक साथ चल रहे हैं और बच्चों की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय तंत्र पर दबाव बढ़ रहा है। गौरतलब है कि सुरक्षा परिषद की यह बहस केवल वक्तव्यों तक सीमित रही — किसी बाध्यकारी प्रस्ताव पर मतदान नहीं हुआ। आलोचकों का कहना है कि जब तक परिषद के स्थायी सदस्य स्वयं या उनके सहयोगी संघर्षों में शामिल हों, तब तक जवाबदेही के वास्तविक तंत्र बनाना कठिन रहेगा।