बलूचिस्तान के संसाधनों पर भारत का यूएन में कड़ा संदेश, पाकिस्तान को बिना नाम लिए घेरा
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने 23 जुलाई को उच्चस्तरीय खुली चर्चा में बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का मुद्दा सीधे उठाया और बिना पाकिस्तान का नाम लिए स्पष्ट संकेत दिया कि संसाधन-समृद्ध प्रांतों को उनके हक से वंचित रखना क्षेत्रीय अस्थिरता की जड़ है। यह बयान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 'नेचुरल रिसोर्स गवर्नेंस: शांति, सुरक्षा और खुशहाली की नींव' विषय पर आयोजित चर्चा के दौरान आया।
भारत का कूटनीतिक संदेश
पी. हरीश ने कहा, 'यह प्रत्येक देश की जिम्मेदारी है कि तेल और गैस, खनिज, दुर्लभ धातुओं और बहुमूल्य संसाधनों से समृद्ध प्रांतों को उन संसाधनों से होने वाले लाभ में न्यायसंगत और समान हिस्सेदारी सुनिश्चित करे।' उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसा न करने के परिणाम 'स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं, जिनका प्रभाव हमारे क्षेत्र में भी देखा जा सकता है।' यह कूटनीतिक भाषा में बलूचिस्तान की स्थिति पर सीधा इशारा था।
बलूचिस्तान की स्थिति: संसाधन-समृद्ध, विकास में पिछड़ा
प्राकृतिक संसाधनों की अपार संपदा और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में बड़े योगदान के बावजूद, बलूचिस्तान आज भी देश के सबसे गरीब प्रांतों में गिना जाता है। स्थानीय लोगों द्वारा अपने प्रांत के संसाधनों में न्यायसंगत हिस्से की माँग को लेकर किए गए विरोध प्रदर्शनों को कथित तौर पर बेरहमी से दबाया गया है, जिससे असंतोष और विद्रोह की स्थिति और गहरी हुई है।
पी. हरीश ने स्पष्ट किया, 'संसाधनों से भरपूर प्रांतों के शासन में सख्ती और सुरक्षा वाला तरीका मामलों को और खराब करता है। जो प्रांत संसाधनों से भरपूर हैं लेकिन विकास में पिछड़े हैं, वे असुरक्षा का केंद्र बन जाते हैं जो अपनी सीमाओं के बाहर, यहाँ तक कि पड़ोसी देशों में भी अस्थिरता फैलाते हैं।'
वैश्विक संदर्भ: अफ्रीका और ग्लोबल साउथ
भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने इस मुद्दे को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में रखते हुए कहा कि अफ्रीका के कई हिस्सों में हथियारबंद समूहों और आतंकवादियों ने प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण के लिए लड़ाइयाँ लड़ी हैं, जिससे उन्हें फंडिंग मिली और गृहयुद्ध तथा स्थानीय संघर्षों को बढ़ावा मिला। उन्होंने ग्लोबल साउथ के देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि औपनिवेशिक दौर में संसाधनों के शोषण की प्रवृत्ति आज भी जारी है — संसाधन इन देशों से निकाले जाते हैं, लेकिन आर्थिक लाभ कहीं और पहुँच जाता है, जबकि स्थानीय समुदाय पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक नुकसान झेलते हैं।
यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी इस चर्चा में कहा, 'देशों और समुदायों को सबसे पहले और सबसे ज्यादा फायदा अपने आस-पास के संसाधनों से मिलना चाहिए।'
राष्ट्रीय संप्रभुता और पारदर्शी शासन पर जोर
पी. हरीश ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों के शासन और प्रबंधन की मुख्य जिम्मेदारी संप्रभु देशों की है और 'राष्ट्रीय स्वामित्व, क्षमता-निर्माण और संस्थाओं को मजबूत करना सभी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के केंद्र में रहना चाहिए।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि किसी देश के संसाधनों पर मान्यता प्राप्त संप्रभु अधिकार और व्यावहारिक रूप से उन अधिकारों के इस्तेमाल के बीच की खाई को खत्म करने का समय आ गया है।
आगे क्या
भारत की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब बलूचिस्तान में सुरक्षा स्थिति और वहाँ के संसाधनों के दोहन का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तेजी से उठाया जा रहा है। गौरतलब है कि भारत ने कूटनीतिक संयम बरतते हुए पाकिस्तान का नाम नहीं लिया, लेकिन संदर्भ इतना स्पष्ट था कि इसे वैश्विक कूटनीतिक हलकों में सीधे पाकिस्तान-केंद्रित बयान के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पाकिस्तान इस पर किस प्रकार की प्रतिक्रिया देता है और क्या संयुक्त राष्ट्र इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम उठाता है।