यूएन में भारत ने उठाया बलूचिस्तान का मुद्दा: संसाधनों का न्यायसंगत बँटवारा न हो तो अस्थिरता अनिवार्य
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने 23 जुलाई 2026 को बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों के कथित दोहन का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि खनिजों, दुर्लभ धातुओं और ऊर्जा संसाधनों से भरपूर प्रांतों को यदि उनके संसाधनों से होने वाले लाभ में न्यायसंगत हिस्सेदारी नहीं दी गई, तो असंतोष और विद्रोह अपरिहार्य हैं। यह बयान 'नेचुरल रिसोर्स गवर्नेंस: शांति, सुरक्षा और खुशहाली की नींव' विषय पर आयोजित उच्चस्तरीय खुली चर्चा के दौरान दिया गया।
भारत का कूटनीतिक संदेश
पी. हरीश ने बिना पाकिस्तान का नाम लिए कहा, 'यह प्रत्येक देश की जिम्मेदारी है कि तेल और गैस, खनिज, दुर्लभ धातुओं और बहुमूल्य संसाधनों से समृद्ध प्रांतों को उन संसाधनों से होने वाले लाभ में न्यायसंगत और समान हिस्सेदारी सुनिश्चित करे।' उन्होंने आगे जोड़ा कि ऐसा न करने के परिणाम केवल उस देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे क्षेत्र की आंतरिक सुरक्षा को प्रभावित करते हैं।
हरीश ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'ऐसा न करने के परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं, जिनका प्रभाव हमारे क्षेत्र में भी देखा जा सकता है।' यह कथन सीधे तौर पर बलूचिस्तान की स्थिति की ओर संकेत करता है, जहाँ कथित तौर पर दशकों से संसाधन-दोहन और विकास की उपेक्षा के चलते असंतोष गहरा हुआ है।
बलूचिस्तान की विकास विसंगति
गौरतलब है कि बलूचिस्तान प्राकृतिक गैस, सोना, तांबा और अन्य खनिजों के विशाल भंडार के बावजूद पाकिस्तान के सबसे गरीब प्रांतों में से एक बना हुआ है। रिपोर्टों के अनुसार, इस विरोधाभास ने स्थानीय समुदायों में इस्लामाबाद के प्रति गहरा असंतोष पैदा किया है। बलूच समुदायों ने अपने प्रांत के संसाधनों में उचित हिस्सेदारी की माँग को लेकर विरोध प्रदर्शन किए हैं, और इन प्रदर्शनों को कथित तौर पर बलपूर्वक दबाने से विद्रोह की भावना और प्रबल हुई है।
हरीश ने चेतावनी दी, 'संसाधनों से भरपूर प्रांतों के शासन में सख्ती और सुरक्षा वाला तरीका मामलों को और खराब करता है। जो प्रांत संसाधनों से भरपूर हैं लेकिन विकास में पिछड़े हैं, वे असुरक्षा का केंद्र बन जाते हैं जो अपनी सीमाओं के बाहर, यहाँ तक कि पड़ोसी देशों में भी अस्थिरता फैलाते हैं।'
बाहरी हस्तक्षेप और संसाधन-तस्करी पर चिंता
भारतीय प्रतिनिधि ने यह भी रेखांकित किया कि संसाधन-समृद्ध लेकिन विकास-वंचित क्षेत्र बाहरी शक्तियों के हस्तक्षेप और संसाधनों की तस्करी को आमंत्रित करते हैं। उन्होंने कहा, 'यह अस्थिरता बाहरी लोगों द्वारा सीमा पार दखल और संसाधनों के दोहन को भी आकर्षित करती है, इससे स्थानीय समुदायों की शिकायतों के साथ अस्थिरता बढ़ती है।'
विशेष रूप से अफ्रीका के कुछ हिस्सों का उदाहरण देते हुए हरीश ने बताया कि वहाँ हथियारबंद समूहों और आतंकवादी संगठनों ने प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण के लिए संघर्ष किया, जिससे गृहयुद्ध और सामुदायिक संघर्षों को बल मिला।
संप्रभुता और विकास के बीच का अंतर
पी. हरीश ने ग्लोबल साउथ के देशों की ऐतिहासिक पीड़ा को भी उजागर किया। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक काल में इन देशों के प्राकृतिक संसाधनों का बड़े पैमाने पर शोषण हुआ और आज भी वही प्रवृत्ति जारी है — संसाधन इन देशों से निकाले जाते हैं, किंतु उनका आर्थिक लाभ कहीं और पहुँच जाता है, जबकि स्थानीय गरीब समुदाय पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक नुकसान उठाते हैं।
उन्होंने आह्वान किया, 'अब समय आ गया है कि किसी देश के प्राकृतिक संसाधनों पर मान्यता प्राप्त संप्रभु अधिकार और व्यावहारिक रूप से उन अधिकारों के इस्तेमाल के बीच मौजूद अंतर को खत्म किया जाए।' साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय स्वामित्व, क्षमता-निर्माण और संस्थागत मजबूती को हर अंतरराष्ट्रीय प्रयास के केंद्र में रखने पर बल दिया।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव का स्वर
यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस चर्चा में कहा, 'देशों और समुदायों को सबसे पहले और सबसे ज्यादा फायदा अपने आस-पास के संसाधनों से मिलना चाहिए।' यह वक्तव्य भारत के उस व्यापक तर्क के अनुरूप है जिसमें संसाधन-शासन को शांति और स्थिरता की बुनियाद माना गया है। यह ऐसे समय में आया है जब बलूचिस्तान में अशांति की खबरें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर दबाव बढ़ रहा है।