संयुक्त राष्ट्र मंच पर भारत का पाकिस्तान को करारा जवाब, कश्मीर को बताया पूर्णतः आंतरिक मामला
सारांश
मुख्य बातें
भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने मंगलवार, 24 जून को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक अनौपचारिक बैठक में पाकिस्तान पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि उसने सह-अध्यक्ष के पद का दुरुपयोग कर मंच का राजनीतिकरण किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, "जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश भारत का पूर्णतः आंतरिक मामला है — यह हमेशा भारत का हिस्सा था, है और रहेगा।"
बैठक का स्वरूप और विषय
यह बैठक अरिया फॉर्मूला के तहत आयोजित की गई थी — सुरक्षा परिषद की एक अनौपचारिक संवाद व्यवस्था, जिसका नाम वेनेजुएला के राजनयिक डिएगो अरिया के नाम पर रखा गया है। बैठक का विषय था: "कार्यान्वयन की खाई को पाटना: सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव और अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा का संरक्षण"। इस बैठक की सह-अध्यक्षता चीन और पाकिस्तान के राजदूतों ने संयुक्त रूप से की।
पाकिस्तान की भूमिका पर भारत की आपत्ति
पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि आसिम इफ्तिखार अहमद ने बैठक के दौरान कश्मीर मुद्दा उठाया — जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की परिचित रणनीति रही है। इस पर पी. हरीश ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "यह आश्चर्यजनक है कि एक सह-अध्यक्ष, जिससे संतुलित और निष्पक्ष आचरण की अपेक्षा की जाती है, उसने इस मंच का राजनीतिकरण करने का विकल्प चुना।" भारत का आरोप है कि पाकिस्तान ने एक बहुपक्षीय मंच की गरिमा का उल्लंघन कर उसे द्विपक्षीय एजेंडे के लिए भुनाया।
प्रस्ताव 47 और पाकिस्तान की जवाबदेही
भारत ने यह भी रेखांकित किया कि सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के क्रियान्वयन में सबसे बड़ी बाधा स्वयं पाकिस्तान रहा है। भारत के अनुसार, पाकिस्तान ने अप्रैल 1948 के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 47 का पालन नहीं किया, जिसमें उससे कश्मीर के उन क्षेत्रों से अपनी सेना, सुरक्षा बलों और नागरिकों को हटाने को कहा गया था जिन पर उसने कब्जा किया था। साथ ही भारत ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान के नियंत्रण वाले कश्मीर क्षेत्रों में जनता के विरोध प्रदर्शनों को वहाँ की सुरक्षा एजेंसियाँ बलपूर्वक दबाने का प्रयास कर रही हैं।
यूएन-80 समीक्षा और व्यापक सुधार का आह्वान
पी. हरीश ने संयुक्त राष्ट्र की 80वीं वर्षगांठ के अवसर पर चल रही यूएन-80 समीक्षा प्रक्रिया के तहत सुरक्षा परिषद के जनादेशों की समीक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। उनका तर्क था कि जब महासभा के सभी जनादेशों की समीक्षा हो रही है, तो सुरक्षा परिषद के जनादेशों को इससे अलग रखने का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय-6 के तहत मध्यस्थता और वार्ता प्रावधानों की पुनर्समीक्षा का सुझाव भी दिया, यह कहते हुए कि ये उपाय तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप बने थे और इनकी वैधता अनिश्चितकालीन नहीं हो सकती।
फिलिस्तीन का उदाहरण और आगे की राह
हरीश ने फिलिस्तीन का उदाहरण देते हुए कहा कि दशकों की मध्यस्थता के बावजूद समाधान नहीं निकल सका, जो पुराने ढाँचों की सीमाओं को उजागर करता है। उन्होंने कहा कि पुराने और अप्रासंगिक मध्यस्थता ढाँचों की समीक्षा के लिए ठोस आधार मौजूद है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के बाद कूटनीतिक मोर्चे पर दोनों देश एक-दूसरे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घेरने की कोशिश में लगे हैं।