इजरायल-लेबनान वार्ता वॉशिंगटन में शुरू, हिजबुल्लाह ने ट्रंप के संघर्षविराम प्रस्ताव को स्वीकारा
सारांश
मुख्य बातें
इजरायल और लेबनान के बीच तनाव कम करने के उद्देश्य से वॉशिंगटन में प्रत्यक्ष वार्ता का नया दौर 2 जून को शुरू हो गया, जिसमें अमेरिकी मध्यस्थता से संघर्षविराम पर सहमति बनने की उम्मीद जताई जा रही है। लेबनान के राष्ट्रपति कार्यालय के अनुसार, हिजबुल्लाह ने अमेरिकी प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है, जिसमें इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच ‘पारस्परिक रूप से हमले रोकने’ की व्यवस्था शामिल है।
मुख्य घटनाक्रम
लेबनान स्थित अमेरिकी दूतावास के हवाले से जारी बयान के अनुसार, यह पुष्टि लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बीच हुई टेलीफोन वार्ता के बाद सामने आई। बातचीत में लेबनान की मौजूदा स्थिति और क्षेत्रीय तनाव घटाने के प्रयासों पर चर्चा हुई।
प्रस्ताव के तहत इजरायल बेरूत के दक्षिणी उपनगरों पर हवाई हमले बंद करेगा, जबकि हिजबुल्लाह इजरायल के विरुद्ध अपने हमले रोक देगा। बाद के चरणों में इस संघर्षविराम व्यवस्था का विस्तार पूरे लेबनान तक किए जाने की संभावना है।
ट्रंप-नेतन्याहू सहमति का दावा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका में लेबनान की राजदूत नादा हमादेह मुआवाद को बताया कि उन्हें इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की भी इस प्रस्ताव पर सहमति मिल गई है। राजदूत मुआवाद ने यह जानकारी राष्ट्रपति आउन को दी, जिसके बाद आउन ने हिजबुल्लाह नेतृत्व को घटनाक्रम से अवगत कराया।
दूतावास के अनुसार, मंगलवार और बुधवार को होने वाली वार्ता बैठकों में अब तक हुई प्रगति को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।
लेबनानी संसद की भूमिका
इससे पहले लेबनानी संसद के अध्यक्ष नबीह बेरी ने भी अमेरिकी प्रशासन को संदेश भेजा था कि हिजबुल्लाह इजरायल के साथ तत्काल और पूर्ण संघर्षविराम के लिए तैयार है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बेरी ने यह भरोसा भी दिलाया कि यदि समझौता होता है तो उसके पालन की गारंटी दी जाएगी।
क्षेत्रीय असर और आगे की राह
गौरतलब है कि इजरायल-लेबनान सीमा पर पिछले कई महीनों से सीमित-तीव्रता का संघर्ष जारी है, जिसमें दक्षिणी लेबनान और उत्तरी इजरायल के नागरिक इलाकों पर सीधा असर पड़ा है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि यह प्रस्ताव अमल में आता है, तो यह लंबे समय से तनावग्रस्त इस सीमा पर स्थिरता बहाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
हालाँकि आलोचकों का कहना है कि पहले भी ऐसे समझौतों के पालन को लेकर सवाल उठते रहे हैं, और असली परीक्षा क्रियान्वयन के चरण में होगी।