खालिस्तानी उग्रवाद सिख हितों के लिए बोझ, पश्चिम में आंदोलन से समुदाय अलग-थलग: खालसा वॉक्स रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
खालसा वॉक्स की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिमी देशों की राजधानियों में खालिस्तानी उग्रवाद को लगातार बढ़ावा दिया जाना सिख समुदाय के व्यापक हितों के विरुद्ध है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस आंदोलन के कारण समुदाय मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ रहा है, उस पर संदेह बढ़ रहा है और युवाओं के कट्टरपंथीकरण, नशीले पदार्थों तथा गैंग नेटवर्क जैसी गंभीर चुनौतियों से ध्यान भटक रहा है। रिपोर्ट के कुछ निष्कर्षों में इन नेटवर्कों का संबंध अलगाववादी गतिविधियों के वित्तपोषण से भी कथित तौर पर जोड़ा गया है।
डॉक्यूमेंट्री 'फाइंडिंग खालिस्तान' की पृष्ठभूमि
रिपोर्ट के मुताबिक, कनाडा के ब्रैम्पटन स्थित सभा मंदिर में कांसुलर शिविर के दौरान खालिस्तान समर्थक उग्र तत्वों ने श्रद्धालुओं पर लाठी-डंडों और झंडों से हमला किया था। इस घटना के करीब दो साल बाद कनाडा के पत्रकार डेनियल बोर्डमैन अनजाने में इस पूरे मामले के केंद्र में आ गए। कनाडाई सार्वजनिक प्रसारक सीबीसी ने जिस तरह इस हिंसा की कवरेज की, उसी से दो साल तक चली एक वैश्विक पड़ताल की शुरुआत हुई।
इसी पड़ताल के नतीजे के रूप में डॉक्यूमेंट्री 'फाइंडिंग खालिस्तान' सामने आई है। यह डॉक्यूमेंट्री बंटवारे के बाद के खून-खराबे और अस्सी के दशक में पंजाब में भड़के उग्रवाद से लेकर पश्चिम में आज सक्रिय इसके बंद दायरे वाले समर्थक समूहों तक, आंदोलन के पूरे सफर को सामने रखती है।
खालिस्तान आंदोलन की मानवीय कीमत
रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि खालिस्तान आंदोलन की वजह से पहले भी भारी मानवीय कीमत चुकानी पड़ी है — चाहे वह एयर इंडिया बमकांड हो या पंजाब में सालों तक चला उग्रवाद और हिंसा। रिपोर्ट के अनुसार, 'फाइंडिंग खालिस्तान' ऐसे दौर में आई है जब इस विचारधारा की भारी कीमत से मुंह मोड़ना अब संभव नहीं रहा।
रिपोर्ट में उद्धृत किया गया: 'खालिस्तान सिखों की जायज आकांक्षाओं का प्रतीक नहीं है। यह एक ऐसी राजनीतिक परियोजना है, जो बार-बार हिंसा का रास्ता अपना चुकी है, जिसे बाहर से समर्थन मिलता रहा है और जो गुरुओं की बुनियादी शिक्षाओं के बिल्कुल खिलाफ है।' रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया कि गुरु नानक ने मजहबी कट्टरता और सियासी बंटवारे को नकारा था और श्री गुरु ग्रंथ साहिब में मानव एकता का संदेश — 'ना को बैरी, नहि बेगाना' — बार-बार दोहराया गया है।
सिख समुदाय की बहुसंख्यक राय
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और विदेशों में रहने वाले अधिकांश सिख खालिस्तान आंदोलन को किसी मकसद के बजाय बोझ के रूप में देखते हैं। पंजाब में इसे नगण्य चुनावी समर्थन हासिल है। कनाडा में ब्रिटिश कोलंबिया के पूर्व प्रीमियर उज्जल दोसांझ ने कई बार सार्वजनिक रूप से कहा है कि पाँच प्रतिशत से भी कम कनाडाई सिख इस आंदोलन का समर्थन करते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया, 'इसके बावजूद, मुखर अल्पसंख्यक ने लोगों के मन में 'सिख' को 'खालिस्तानी' के बराबर खड़ा कर दिया है।' यह ऐसे समय में आया है जब कनाडाई सिख समुदाय के आम सदस्य — मेहनती ट्रक चालक, कारोबारी, सैनिक और पेशेवर — यह महसूस कर रहे हैं कि उनकी पहचान उन लोगों द्वारा हथिया ली गई है जो कुछ मामलों में कथित तौर पर संगठित अपराध में लिप्त हैं।
खालसा की विरासत और वर्तमान गतिविधियों का अंतर्विरोध
रिपोर्ट में कहा गया कि 'खालसा की स्थापना दबे-कुचलों की रक्षा के लिए हुई थी, न कि आतंक और धमकी के बल पर एक मजहबी राज्य बनाने के लिए।' मंदिरों पर हमले, आतंकवादियों का महिमामंडन और कनाडा के सामुदायिक केंद्रों में कराए जा रहे तथाकथित 'जनमत संग्रह' का उस आध्यात्मिक और नैतिक विरासत से कोई संबंध नहीं, जिसका ये दावा करते हैं।
गौरतलब है कि यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब भारत-कनाडा संबंधों में खालिस्तान मुद्दे को लेकर लगातार तनाव बना हुआ है। आने वाले समय में यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि कनाडाई नीति-निर्माता और सिख समुदाय के बहुसंख्यक सदस्य इस बहस को किस दिशा में ले जाते हैं।