खार्ग द्वीप: अमेरिका और ईरान के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति, पूर्व राजनयिक वीणा सिकरी
सारांश
Key Takeaways
- खार्ग द्वीप पर नियंत्रण के लिए अमेरिका और ईरान की जंग जारी है।
- वीणा सिकरी ने इसे आसान नहीं बताया है।
- अमेरिका की सैन्य ताकत के बावजूद, ईरान के जवाबी हमले संभव हैं।
- भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर रणनीतियाँ विकसित की हैं।
- चीन और रूस की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
नई दिल्ली, 1 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा कि वे "ईरान का तेल अपने नियंत्रण में लेना" चाहते हैं और खार्ग द्वीप पर भी अपना नियंत्रण स्थापित कर सकते हैं। यह वही द्वीप है जहाँ से ईरान का अधिकतर तेल निर्यात होता है। वहीं, ईरान भी इस पर अपने वर्चस्व को खोने के लिए तैयार नहीं है। क्या अमेरिका की मंशा पूरी करना इतना आसान है?
भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीणा सिकरी के अनुसार, यह प्रक्रिया सहज नहीं है।
उन्होंने राष्ट्र प्रेस को बताया, "यह सच है कि ईरान का 90 प्रतिशत निर्यात इसी द्वीप से होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान सप्लाई घटा देगा, लेकिन यह भी सच है कि इससे उसकी खुद की आमदनी पर विपरीत असर पड़ेगा। दोनों देशों को नुकसान होगा।"
एक सवाल के जवाब में कि क्या इसे 'सीमित' युद्ध के रूप में देखा जा सकता है, सिकरी ने कहा, "नहीं, यह सीमित युद्ध नहीं है। हाल ही में इस्फाहान पर 900 किलोग्राम का बम गिराया गया।"
उन्होंने बताया कि वर्तमान संघर्ष के दो चरण हो सकते हैं: खार्ग द्वीप पर 'ग्राउंड फोर्सेस' का होना है, जो 90 प्रतिशत निर्यात का स्रोत है। अमेरिका इस पर कब्जे की योजना बना रहा है। बुधवार को ट्रंप देश के नाम संबोधन देंगे। लोग जानना चाहते हैं कि वे क्या घोषणा करेंगे, क्या वे ईरान में अपनी सेना तैनात करेंगे।
सिकरी ने अमेरिका की सैन्य ताकत के बारे में कहा, "उनके गल्फ में 40 हजार सैनिक हैं, 3 हजार पैराटूपर्स, दो बड़ी नौकाएँ हैं, और अच्छी संख्या में नौसेना के जवान हैं। 50 हजार सैनिक इस क्षेत्र में तैनात हैं, इसलिए यह संभव है कि वे किसी हमले की योजना बना रहे हों।"
क्या होर्मुज अब अन्य देशों के लिए एक चोक प्वाइंट बन गया है? इस पर सिकरी ने कहा, "यह एक गंभीर चोक प्वाइंट है। गल्फ या अन्य देशों के ईंधन, पेट्रोलियम उत्पाद, गैस यहीं से जाते हैं। यहाँ ईरान की सेना तैनात है और उन्होंने इसका उपयोग भी किया है।"
सिकरी ने कहा कि ईरान की "दाम बढ़ाओ, समय खींचो" रणनीति प्रभावी साबित हो रही है, खासकर तब जब अमेरिका लंबा युद्ध नहीं चाहता। उन्होंने कहा, "ईरान ने अपने हमलों को जारी रखा है और अमेरिकी बेस पर भी हमला किया है।"
क्या अमेरिका के भीतर बढ़ती युद्ध लागत और टैक्सपेयर्स पर बोझ ट्रंप के फैसलों को प्रभावित कर सकता है? इसका उत्तर देते हुए सिकरी ने कहा, "यह सच है कि संघर्ष का नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। 60 प्रतिशत लोग युद्ध के खिलाफ हैं।"
भारत को इस स्थिति में अपनी ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीति के स्तर पर क्या रणनीति अपनानी चाहिए? इस पर वीणा सिकरी ने कहा कि भारत ने अपनी तैयारी पूरी कर ली है। हमारी सरकार ईरान के साथ अच्छे संबंध रखती है।
चीन और रूस जैसे देशों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। क्या वे ईरान को अप्रत्यक्ष समर्थन दे रहे हैं? इस पर सिकरी ने कहा, "चीन चुप है, लेकिन रूस से तकनीकी मदद मिल रही है।"