लाओस के उपप्रधानमंत्री थोंगसावन फोमविहाने नई दिल्ली पहुँचे, जयशंकर संग 10वीं जॉइंट कमीशन बैठक की करेंगे सह-अध्यक्षता
सारांश
मुख्य बातें
लाओस पीडीआर के उपप्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री थोंगसावन फोमविहाने 1 जून 2026 को भारत के आधिकारिक दौरे पर नई दिल्ली पहुँचे। 1 से 3 जून तक चलने वाला यह दौरा लाओस के किसी वरिष्ठ नेता की भारत की पहली यात्रा है और ऐसे समय में हो रहा है जब दोनों देश अपने राजनयिक संबंधों के 70 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहे हैं।
दौरे का मुख्य एजेंडा
इस यात्रा के केंद्र में 10वीं भारत-लाओस जॉइंट कमीशन मीटिंग है, जिसकी सह-अध्यक्षता थोंगसावन फोमविहाने और भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर संयुक्त रूप से करेंगे। यह बैठक दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा और आगे की दिशा तय करने का प्रमुख तंत्र है।
बैठक में व्यापार, कनेक्टिविटी, विकास साझेदारी, क्षमता निर्माण और क्षेत्रीय मामलों पर विस्तृत चर्चा होने की उम्मीद है। उपप्रधानमंत्री के साथ उनकी पत्नी वडसाना फोमविहाने भी इस दौरे पर हैं।
भारत-लाओस संबंधों की पृष्ठभूमि
भारत ने 1956 में लाओस के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए थे। दोनों देशों के रिश्तों की नींव बौद्ध धर्म, साझी सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक मित्रता पर टिकी है। सात दशकों में यह साझेदारी रक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल प्रौद्योगिकी और विकास सहयोग तक फैल चुकी है।
भारत, लाओस को विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों, छात्रवृत्तियों और तकनीकी सहायता के माध्यम से मानव संसाधन विकास में सहयोग देता आया है। जल संसाधन, कृषि और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में भी भारत ने लाओस में कई विकास परियोजनाओं में योगदान दिया है।
एक्ट ईस्ट नीति में लाओस की भूमिका
भारत की एक्ट ईस्ट नीति के तहत लाओस एक महत्वपूर्ण साझेदार देश है। आसियान का सदस्य होने के नाते लाओस भारत की दक्षिण-पूर्व एशिया केंद्रित क्षेत्रीय रणनीति में अहम भूमिका निभाता है। यह दौरा उसी व्यापक कूटनीतिक ढाँचे का हिस्सा है जिसके तहत भारत दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ अपने संबंध गहरे कर रहा है।
गौरतलब है कि यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब भारत अपनी पड़ोसी-प्रथम और विस्तारित पड़ोस नीति को नई ऊर्जा दे रहा है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस यात्रा से दोनों देशों के बीच लंबे समय से चली आ रही साझेदारी को और मज़बूती मिलेगी।
आगे की राह
जॉइंट कमीशन मीटिंग के नतीजे दोनों देशों के बीच सहयोग के नए रोडमैप की रूपरेखा तय करेंगे। व्यापार और निवेश बढ़ाने के प्रयासों को नई गति देने के साथ-साथ क्षेत्रीय कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर भी सहमति बनने की संभावना है। यह दौरा भारत-लाओस संबंधों को अगले 70 वर्षों के लिए एक नई दिशा देने का अवसर है।