मध्य पूर्व संघर्ष ने दुनिया को सबसे बड़ा ऊर्जा झटका दिया: यूएन महासचिव गुटेरेस
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने 23 जून 2026 को कहा कि मध्य पूर्व संघर्ष ने दुनिया को अब तक का सबसे बड़ा ऊर्जा झटका दिया है। उनके अनुसार, यह संकट केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं रहा — कई विकासशील देशों पर कर्ज का बोझ बढ़ा, खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ी और आर्थिक विकास की रफ्तार थम गई।
गुटेरेस का बयान: ऊर्जा से परे बहुआयामी संकट
गुटेरेस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी राय साझा करते हुए लिखा, 'कई विकासशील देशों के लिए यह सिर्फ ऊर्जा संकट नहीं है, बल्कि यह कर्ज, खाद्य सुरक्षा और विकास से जुड़ा एक बड़ा झटका भी है।' उन्होंने आगे कहा, 'कोई भी शांति समझौता निश्चित रूप से आवश्यक राहत देगा, लेकिन इसके प्रभाव लंबे समय तक बने रहने की संभावना है।'
यह बयान ऐसे समय में आया है जब संघर्ष की समाप्ति के बाद भी वैश्विक ऊर्जा बाज़ार अस्थिरता से जूझ रहे हैं और विकासशील देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं।
संघर्ष का घटनाक्रम: हमले से संघर्षविराम तक
28 फरवरी को अमेरिका-इज़रायल के संयुक्त हमले में ईरान के कई शहरों को भारी नुकसान पहुँचा। जवाबी कार्रवाई में तेहरान ने खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया और ड्रोन हमलों की जद में कई ऊर्जा संयंत्र भी आए।
इस बीच पाकिस्तान, कतर और तुर्की जैसे देशों ने मध्यस्थता की कोशिश की। चालीस दिन बाद अस्थायी संघर्षविराम से कुछ राहत मिली, लेकिन हवाई हमले फिर शुरू हो गए। अंततः 107 दिन बाद जी7 में डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर से शांति की उम्मीद जगी।
शांति समझौते पर फ्रांस के वर्साय पैलेस में हस्ताक्षर किए गए, जबकि ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से हस्ताक्षर किए। स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में दोनों पक्ष मध्यस्थों के साथ मिले और 60 दिनी समझौता रोडमैप पर सहमति बनी।
ऊर्जा क्षेत्र पर असर: होर्मुज से वैश्विक बाज़ार तक
संघर्ष के दौरान समुद्री नौवहन लगभग ठप हो गया था। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर आवाजाही रोक दी, तो अमेरिकी नाकेबंदी के कारण एलपीजी, कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों का परिवहन बाधित हो गया। इसका असर वैश्विक तेल वितरण और ऊर्जा बाज़ारों पर पड़ा। कई देशों को तेल और गैस की खपत नियंत्रित करने के आपातकालीन उपाय करने पड़े।
गौरतलब है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग 20% तेल व्यापार गुज़रता है, इसलिए इसकी नाकेबंदी का असर तेल आयात पर निर्भर विकासशील देशों पर सबसे गहरा पड़ा।
विकासशील देशों पर दीर्घकालिक प्रभाव
गुटेरेस के अनुसार, ऊर्जा मूल्यों में उछाल और आपूर्ति श्रृंखला के टूटने से विकासशील देशों के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ा और बाहरी कर्ज बढ़ा। खाद्य आपूर्ति भी प्रभावित हुई, क्योंकि खाद और कृषि उत्पादों का परिवहन भी बाधित रहा। यह ऐसे समय में आया जब कई देश कोविड के बाद की आर्थिक चुनौतियों से उबरने की कोशिश कर रहे थे।
आगे की राह
वर्साय समझौते और बर्गेनस्टॉक रोडमैप के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नज़र इस बात पर है कि 60 दिनी रोडमैप के तहत ऊर्जा आपूर्ति बहाली और क्षतिपूर्ति के प्रावधान कितनी तेज़ी से लागू होते हैं। गुटेरेस की चेतावनी स्पष्ट है — शांति समझौता राहत की शुरुआत है, अंत नहीं।