मैनचेस्टर विश्वविद्यालय की रिपोर्ट: चीन के हरित उद्योग वैश्विक निम्न-कार्बन बदलाव में दे रहे योगदान
सारांश
मुख्य बातें
मैनचेस्टर विश्वविद्यालय (ब्रिटेन) के शोधकर्ताओं द्वारा 17 अगस्त 2026 को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन द्वारा हरित उद्योगों को दिए जा रहे व्यापक सरकारी समर्थन ने बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और सौर ऊर्जा जैसी प्रौद्योगिकियों की लागत में उल्लेखनीय कमी की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस लागत-कटौती से ये तकनीकें वैश्विक स्तर पर अधिक सुलभ हुई हैं, जो निम्न-कार्बन अर्थव्यवस्था की दिशा में दुनिया के परिवर्तन को गति दे रही हैं।
रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
रिपोर्ट के अनुसार, चीन इस सदी की शुरुआत से ही विभिन्न नीतिगत उपायों के ज़रिए हरित उद्योगों को प्रोत्साहित करता रहा है। इसमें घरेलू माँग को बढ़ावा देने के साथ-साथ सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, हाइड्रोजन ऊर्जा, बैटरी और इलेक्ट्रिक वाहन जैसी प्रासंगिक प्रौद्योगिकियों की उत्पादन लागत घटाना शामिल है। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि चीन का यह औद्योगिक विकास केवल उसकी अपनी अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक हरित परिवर्तन का एक महत्त्वपूर्ण आधार बन चुका है।
ब्रिटेन के लिए सिफारिशें
रिपोर्ट में ब्रिटेन को विशेष रूप से सलाह दी गई है कि वह हरित प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में चीन के साथ अपना सहयोग और गहरा करे। साथ ही, यह सुझाव भी दिया गया है कि ब्रिटेन को वित्तीय सेवाओं में अपनी मज़बूत स्थिति का लाभ उठाकर हरित प्रौद्योगिकी निवेश को सक्रिय रूप से समर्थन देना चाहिए। यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिमी देश चीनी हरित उत्पादों पर व्यापार प्रतिबंधों और शुल्कों को लेकर बहस में उलझे हुए हैं।
वैश्विक संदर्भ और महत्त्व
गौरतलब है कि यूरोपीय संघ और अमेरिका ने हाल के वर्षों में चीनी EV और सौर पैनलों पर अतिरिक्त शुल्क लगाए हैं, यह तर्क देते हुए कि चीनी सब्सिडी से अनुचित प्रतिस्पर्धा होती है। मैनचेस्टर विश्वविद्यालय की यह रिपोर्ट उस बहस में एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है — यह तर्क देते हुए कि चीन की हरित औद्योगिक नीति वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के अनुकूल है, न कि उनके विरुद्ध।
आगे की राह
रिपोर्ट के निष्कर्ष ऐसे समय में सामने आए हैं जब दुनिया भर की सरकारें 2050 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए हरित प्रौद्योगिकी में निवेश बढ़ा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की विनिर्माण क्षमता और लागत-दक्षता को नज़रअंदाज़ करके वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन को गति देना कठिन होगा। रिपोर्ट का यह संदेश अंतरराष्ट्रीय जलवायु नीति विमर्श में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।