नेपाली विशेषज्ञों की पुष्टि: 26 अगस्त का हिमनद भूस्खलन नेपाल में हुआ, जलवायु परिवर्तन मूल कारण
सारांश
मुख्य बातें
26 अगस्त 2026 को नेपाल में अचानक आए हिमनद भूस्खलन ने मिट्टी और चट्टानों का विशाल सैलाब चीन-नेपाल सीमा की ओर भेज दिया, जिससे भारी जानमाल का नुकसान हुआ। भूविज्ञान, जलवायु और रिमोट सेंसिंग के क्षेत्र के प्रमुख नेपाली विशेषज्ञों ने उपग्रह चित्रों, स्थलीय सर्वेक्षणों और वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि इस आपदा की उत्पत्ति नेपाल की धरती पर हुई थी।
मुख्य घटनाक्रम
त्रिभुवन विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. अमृत शर्मा ने उपग्रह चित्रों और स्थलीय शोध के माध्यम से पुष्टि की कि हिमनद का ढहना नेपाल में हुआ था। उनके अनुसार, तेज गति से खिसकती बर्फ की विशाल मात्रा ने बाढ़ को चरम पर पहुँचा दिया, जो सात मिनट से भी कम समय में चीलोंग पोर्ट तक जा पहुँची। इतनी तीव्र गति के कारण तटवर्ती इलाकों में चेतावनी देने का समय ही नहीं बचा।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
रिमोट सेंसिंग विशेषज्ञ डॉ. बसंत नेउपाने ने इस बात पर जोर दिया कि यद्यपि इस आपदा से चीन भी प्रभावित हुआ, फिर भी चीन ने अपनी विपदा के बावजूद नेपाल को तत्काल सहायता प्रदान की और बचावकर्मी दिन-रात काम करते रहे। उन्होंने इसे पड़ोसी देशों के बीच सहयोग की सच्ची भावना का प्रमाण बताया।
विशेषज्ञों ने सर्वसम्मति से कहा कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन इस आपदा का मूल कारण है। निरंतर कार्बन उत्सर्जन हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की गति को तेज कर रहा है, जिससे दुनिया का यह 'तीसरा ध्रुव' जलवायु आपदाओं के लिए उच्च जोखिम वाला क्षेत्र बनता जा रहा है।
आपदा का व्यापक संदर्भ
यह ऐसे समय में आया है जब हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर पिघलने की दर वैज्ञानिकों की चिंता का केंद्र बनी हुई है। गौरतलब है कि हिमालय में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की घटनाएँ पिछले दो दशकों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ी हैं, और यह भूस्खलन उसी खतरनाक प्रवृत्ति की एक कड़ी है।
विशेषज्ञों ने राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर आपदा प्रतिक्रिया और जलवायु शासन के मूल सिद्धांतों पर ध्यान केंद्रित करने का आह्वान किया। उन्होंने चीन-नेपाल सहयोग को और गहरा करने तथा साझे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के लिए मिलकर काम करने पर जोर दिया।
आम जनता पर असर
चीलोंग पोर्ट क्षेत्र में बाढ़ की असाधारण गति के कारण स्थानीय निवासियों को बचाव का मौका नहीं मिला, जिससे जानमाल का भारी नुकसान हुआ। चीन-नेपाल सीमा पर व्यापार और आवागमन भी बुरी तरह प्रभावित हुआ।
क्या होगा आगे
विशेषज्ञों ने आपदा निवारण और शमन में चीन-नेपाल के बीच संयुक्त वैज्ञानिक सहयोग बढ़ाने की सिफारिश की है। हिमालयी क्षेत्र में अर्ली वार्निंग सिस्टम को और मजबूत करना इस दिशा में सबसे जरूरी कदम माना जा रहा है, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों से बचा जा सके।