नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनल का बड़ा बयान: भारत संग भौगोलिक निकटता को आर्थिक परस्पर-निर्भरता में बदलेगा नेपाल
सारांश
मुख्य बातें
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनल ने 25 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में स्पष्ट किया कि भारत के साथ नेपाल का संबंध अब महज भौगोलिक निकटता तक सीमित नहीं रहेगा — बल्कि इसे संरचित आर्थिक परस्पर-निर्भरता में रूपांतरित किया जाएगा। एशिया सोसाइटी द्वारा 'एशिया की उभरती सदी में नेपाल के भविष्य की दिशा' विषय पर आयोजित कार्यक्रम में खनल ने भारत, चीन और वैश्विक समुदाय के साथ बहुस्तरीय जुड़ाव की रणनीति का विस्तार से खाका पेश किया।
भारत के साथ 'थिक कनेक्टिविटी, थिन बॉर्डर्स' की नीति
विदेश मंत्री खनल ने कहा कि नेपाल ने भारत के साथ 'थिक कनेक्टिविटी और थिन बॉर्डर्स' की नीति अपनाई है, जिसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और लोगों की आवाजाही को सुगम बनाना है। उन्होंने रेखांकित किया कि नेपाल की भारत के पाँच राज्यों — उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम — के साथ 1,700 किलोमीटर से अधिक की खुली सीमा है, जहाँ 40 करोड़ से अधिक लोग निवास करते हैं।
खनल के अनुसार, यह विशाल मानव और आर्थिक कॉरिडोर नेपाल के लिए एक रणनीतिक अवसर है। उन्होंने कहा, 'हम संरचित और पारस्परिक परस्पर-निर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं।'
जलविद्युत और सीमावर्ती SEZ: आर्थिक सहयोग के प्रमुख स्तंभ
खनल ने जलविद्युत को आर्थिक साझेदारी का सबसे बड़ा आधार बताया। उन्होंने कहा कि नेपाल की बारहमासी नदियों में लगभग 43 गीगावाट की आर्थिक रूप से व्यवहार्य जलविद्युत क्षमता है। उनके अनुसार, 2035 तक 28,000 मेगावाट तक उत्पादन बढ़ाकर नेपाल भारत और बांग्लादेश को स्वच्छ बिजली का निर्यात कर सकता है और क्षेत्रीय औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन को गति दे सकता है।
इसके साथ ही, खनल ने सीमा पर विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) स्थापित करने का प्रस्ताव रखा, जो कम लागत की हरित बिजली और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँच के जरिये वैश्विक व भारतीय कंपनियों को आकर्षित कर सकते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि लचीली सप्लाई चेन की तलाश में लगी कंपनियों के लिए यह एक 'संरचनात्मक बढ़त' साबित होगी।
चीन के साथ जुड़ाव: लैंडलॉक्ड से लैंड-लिंक्ड बनने की रणनीति
चीन के साथ संबंधों पर खनल ने कहा कि नेपाल का लक्ष्य उत्तर की ओर केवल सड़कें खोलना नहीं, बल्कि खुद को एक लैंडलॉक्ड से लैंड-लिंक्ड अर्थव्यवस्था में परिवर्तित करना है। नेपाल चीन के साथ सड़कों, सुरंगों, ड्राई पोर्ट्स, विमानन, डिजिटल लिंक और सीमा पार रेल को शामिल करते हुए एक बहुआयामी ट्रांस-हिमालयन कनेक्टिविटी नेटवर्क पर कार्य कर रहा है।
उन्होंने 26 अगस्त की विनाशकारी बाढ़ का उल्लेख करते हुए चीन के साथ हिमालयी विज्ञान — ग्लेशियर निगरानी, आपदा पूर्व चेतावनी, जल विज्ञान और जलवायु अनुकूलन — में गहरे सहयोग की आवश्यकता भी जताई। खनल के अनुसार, चीन के साथ सहयोग 'व्यावहारिक, व्यावसायिक रूप से ठोस और दीर्घकालिक लचीलेपन' पर आधारित होगा।
दोनों पड़ोसियों में प्रतिस्पर्धा नहीं, अवसर देखता है नेपाल
भारत और चीन के साथ नेपाल की कनेक्टिविटी को अक्सर दो एशियाई महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धी प्रयासों के रूप में देखा जाता है। हालाँकि, खनल ने इस नजरिये को स्पष्ट रूप से खारिज किया। उन्होंने कहा, 'हम अपने उत्तरी और दक्षिणी कॉरिडोर को प्रतिस्पर्धी दिशा के रूप में नहीं देखते — हम नेपाल को दुनिया के दो सबसे बड़े बाजारों से जुड़ा हुआ देखते हैं, जहाँ लगभग तीन अरब लोग रहते हैं।'
यह ऐसे समय में आया है जब भारत और चीन दोनों नेपाल में अपने आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव को मजबूत करने में जुटे हैं। नेपाल की 'विकासात्मक स्वायत्तता' की नीति इसी संतुलन को साधने का प्रयास है।
वैश्विक साझेदारी, डिजिटल हब और प्रवासी पूँजी
खनल ने अमेरिका, यूरोप, जापान, आसियान और खाड़ी देशों के साथ साझेदारी को गहरा करने की भी बात कही। उन्होंने डिजिटल सेवाओं को नेपाल की वैश्विक आर्थिक भूमिका विस्तार का एक और माध्यम बताया — तर्क दिया कि स्वच्छ बिजली और ठंडी जलवायु का लाभ उठाकर नेपाल फिनटेक और एआई सैंडबॉक्स सहित एक विश्वसनीय डिजिटल हब बन सकता है।
गौरतलब है कि नेपाल के 50 लाख से अधिक प्रवासी नागरिकों को भी खनल ने एक रणनीतिक आर्थिक संपत्ति बताया। सरकार उन्हें केवल रेमिटेंस के स्रोत के रूप में नहीं, बल्कि उनकी पूँजी और विशेषज्ञता को उत्पादक क्षेत्रों में लगाने के साधन के रूप में देखना चाहती है।
खनल ने कहा कि नेपाल का स्पष्ट राष्ट्रीय लक्ष्य अगले 10 वर्षों में मध्यम-आय का दर्जा और 2050 तक उच्च-आय, विकसित देश का दर्जा हासिल करना है — और बहुस्तरीय जुड़ाव की यही रणनीति उस लक्ष्य की बुनियाद है।