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बलूचिस्तान में पाक सेना की पकड़ कमज़ोर, 'ऑपरेशन अल-अज्म' के बावजूद बलूच विद्रोहियों का दबदबा

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बलूचिस्तान में पाक सेना की पकड़ कमज़ोर, 'ऑपरेशन अल-अज्म' के बावजूद बलूच विद्रोहियों का दबदबा

सारांश

पूरी ताकत झोंकने के बावजूद पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान में विद्रोह दबाने में नाकाम है। 'ऑपरेशन शाबान' और 'ऑपरेशन अल-अज्म' जैसे बड़े अभियानों के बाद भी बलूच लड़ाकों की समन्वित हमले करने की क्षमता बरकरार है — और आर्थिक शोषण से उपजा जन-असंतोष इस विद्रोह को और गहरा बना रहा है।

मुख्य बातें

पाकिस्तान एक साथ अफगानिस्तान सीमा , पीओके और बलूचिस्तान — तीन मोर्चों पर हिंसा से जूझ रहा है।
6 जुलाई को जियारत के मांगी डैम पंपिंग स्टेशन पर हमले के बाद 'ऑपरेशन शाबान' और 'ऑपरेशन अल-अज्म' शुरू किए गए।
इन अभियानों से उजागर हुआ कि बलूचिस्तान में तैनात पाकिस्तानी सेना की इकाइयाँ कमज़ोर पड़ चुकी हैं।
ग्वादर डीप-वॉटर पोर्ट पर कोस्ट गार्ड की तीसरी बटालियन सहित थल, वायु, नौसेना और ISI सभी बलूचिस्तान में तैनात हैं।
प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद बलूचिस्तान की अधिकांश आबादी गरीबी रेखा से नीचे है — यही विद्रोह की मूल वजह।
स्थानीय जन-असंतोष के कारण सेना के लिए विश्वसनीय खुफिया जानकारी जुटाना लगभग असंभव हो गया है।

पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान में अपनी पूरी ताकत झोंकने के बावजूद विद्रोह पर काबू पाने में नाकाम साबित हो रही है। 3 अगस्त 2025 तक की स्थिति के अनुसार, पाकिस्तान एक साथ तीन मोर्चों पर हिंसा से जूझ रहा है — अफगानिस्तान के साथ सीमा पर तनाव, पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में अशांति, और बलूचिस्तान में बलूच लड़ाकों के साथ गहराता टकराव। सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह बहु-मोर्चीय दबाव पाकिस्तानी सेना की परिचालन क्षमता को गंभीर रूप से कमज़ोर कर रहा है।

ऑपरेशन शाबान और अल-अज्म: सैन्य जवाब की पृष्ठभूमि

6 जुलाई को जियारत के मांगी डैम पंपिंग स्टेशन पर एक पुलिस चौकी पर बलूच विद्रोहियों के हमले के बाद पाकिस्तान की सुरक्षा बलों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने संयुक्त रूप से 'ऑपरेशन शाबान' शुरू किया। इसी समय पाकिस्तानी सेना के जनरल हेडक्वार्टर ने 'ऑपरेशन अल-अज्म' का आगाज़ किया, जिसे बड़े पैमाने पर और खुफिया सूचनाओं पर आधारित बताया गया।

हालाँकि, इन दोनों अभियानों के परिणामों ने यह उजागर कर दिया कि बलूचिस्तान में तैनात पाकिस्तानी सेना की इकाइयाँ अपेक्षा से कहीं अधिक कमज़ोर हो चुकी हैं। पिछले कुछ महीनों में सुरक्षा बलों को कई हमलों में भारी जनहानि उठानी पड़ी है।

बलूच लड़ाकों की बढ़ती क्षमता

रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना की ओर से जबरन गुमशुदगी और न्यायेतर हत्याओं जैसी कथित कार्रवाइयों के बावजूद बलूच लड़ाकों ने न केवल प्रतिरोध जारी रखा है, बल्कि समन्वित और जटिल हमलों को अंजाम देने की अपनी क्षमता भी प्रदर्शित की है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह की दमनकारी नीतियाँ स्थानीय आबादी को और अधिक अलग-थलग कर रही हैं, जिससे विद्रोह की जड़ें और गहरी होती जा रही हैं।

बलूचिस्तान में पाक सेना की तैनाती का विस्तार

पाकिस्तान की लगभग सभी केंद्रीय और प्रांतीय सुरक्षा एवं खुफिया एजेंसियाँ बलूचिस्तान में तैनात हैं। थल सेना, वायु सेना, नौसेना और कोस्ट गार्ड — पाकिस्तानी सेना की सभी शाखाएँ यहाँ मौजूद हैं, जिनमें थल सेना की भूमिका सबसे निर्णायक है।

पश्चिमी बलूचिस्तान में स्थित ग्वादर का डीप-वॉटर पोर्ट प्राथमिक नौसैनिक अड्डे के रूप में कार्य करता है और कराची के बाद पाकिस्तान का दूसरा सबसे बड़ा बंदरगाह है। यहाँ पाकिस्तान कोस्ट गार्ड की तीसरी बटालियन भी तैनात है। इसके अतिरिक्त, पासनी, ओरमारा और जिवानी में तीन छोटे नौसैनिक अड्डे हैं। खुफिया मोर्चे पर इंटर-सर्विस इंटेलिजेंस (ISI) की क्वेटा में व्यापक उपस्थिति है और वह रणनीतिक खुफिया कार्य के लिए उत्तरदायी है।

आर्थिक शोषण और जन-असंतोष: विद्रोह की असली जड़

विश्लेषकों के अनुसार, बलूचिस्तान संकट की जड़ें महज सुरक्षा समस्या में नहीं, बल्कि दशकों के आर्थिक अन्याय में हैं। प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद बलूचिस्तान की अधिकांश आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करती है। बलूच समाज में यह धारणा गहरी जड़ें जमा चुकी है कि पाकिस्तान सरकार उनके संसाधनों का दोहन कर रही है और प्रांत के साथ एक उपनिवेश जैसा व्यवहार कर रही है।

यह ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। पाकिस्तान विरोधी भावना इतनी प्रबल है कि सुरक्षा बलों के लिए स्थानीय स्रोतों से बलूच लड़ाकों के बारे में विश्वसनीय खुफिया जानकारी जुटाना लगभग असंभव हो गया है। सटीक जमीनी सूचना के अभाव में कोई भी सैन्य अभियान अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सकता।

आगे क्या होगा

गौरतलब है कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के नेतृत्व में शुरू किए गए अभियान अब तक स्थायी परिणाम देने में विफल रहे हैं। बहु-मोर्चीय दबाव और घटते जन-समर्थन के बीच बलूचिस्तान में स्थिरता बहाल करना पाकिस्तान के लिए एक दीर्घकालिक चुनौती बनी रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जब तक आर्थिक शोषण और जबरन गुमशुदगी जैसी नीतियाँ जारी हैं — क्योंकि ये नीतियाँ ही बलूच विद्रोहियों की सबसे बड़ी भर्ती एजेंट हैं। ग्वादर बंदरगाह पर अरबों का निवेश और स्थानीय आबादी की गरीबी — यह विरोधाभास ही इस संकट के केंद्र में है। जब तक इस्लामाबाद बलूचिस्तान को उपनिवेश की तरह नहीं, बल्कि साझेदार की तरह देखना शुरू नहीं करता, तब तक कोई भी सैन्य अभियान स्थायी शांति नहीं ला सकता।
RashtraPress
2 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बलूचिस्तान में 'ऑपरेशन अल-अज्म' क्या है?
'ऑपरेशन अल-अज्म' पाकिस्तानी सेना के जनरल हेडक्वार्टर द्वारा बलूचिस्तान में बलूच विद्रोहियों के खिलाफ शुरू किया गया एक बड़ा सैन्य अभियान है, जिसे खुफिया सूचनाओं पर आधारित बताया गया। हालाँकि, रिपोर्टों के अनुसार यह अभियान विद्रोह को नियंत्रित करने में अब तक कारगर नहीं रहा है।
'ऑपरेशन शाबान' क्यों शुरू किया गया?
'ऑपरेशन शाबान' 6 जुलाई को जियारत के मांगी डैम पंपिंग स्टेशन पर एक पुलिस चौकी पर बलूच विद्रोहियों के हमले के जवाब में शुरू किया गया। इसे पाकिस्तान की सुरक्षा बलों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने संयुक्त रूप से संचालित किया।
बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना कमज़ोर क्यों पड़ रही है?
विश्लेषकों के अनुसार, स्थानीय आबादी में पाकिस्तान सरकार के प्रति गहरे असंतोष के कारण सेना के लिए विश्वसनीय खुफिया जानकारी जुटाना लगभग असंभव हो गया है। इसके अलावा, बलूच लड़ाकों ने समन्वित और जटिल हमले करने की अपनी क्षमता बनाए रखी है, जिससे सेना की परिचालन प्रभावशीलता घटी है।
बलूचिस्तान में विद्रोह की मूल वजह क्या है?
प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद बलूचिस्तान की अधिकांश आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। बलूच समाज में यह धारणा व्यापक है कि पाकिस्तान सरकार उनके संसाधनों का शोषण कर रही है और प्रांत के साथ एक उपनिवेश जैसा व्यवहार कर रही है, जिससे पाकिस्तान विरोधी भावना गहरी होती जा रही है।
बलूचिस्तान में पाकिस्तान की कितनी सैन्य उपस्थिति है?
बलूचिस्तान में पाकिस्तान की थल सेना, वायु सेना, नौसेना, कोस्ट गार्ड और ISI सहित सभी प्रमुख सुरक्षा एजेंसियाँ तैनात हैं। ग्वादर डीप-वॉटर पोर्ट पर कोस्ट गार्ड की तीसरी बटालियन है, जबकि पासनी, ओरमारा और जिवानी में तीन छोटे नौसैनिक अड्डे हैं और क्वेटा में ISI की व्यापक उपस्थिति है।
राष्ट्र प्रेस
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