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पाकिस्तान की अफगान निर्वासन नीति पर बढ़ती अंतरराष्ट्रीय आलोचनाएँ

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पाकिस्तान की अफगान निर्वासन नीति पर बढ़ती अंतरराष्ट्रीय आलोचनाएँ

सारांश

पाकिस्तान की ‘अवैध विदेशी पुनर्वास योजना’ ने वैश्विक स्तर पर आलोचनाओं का सामना किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह नीति मानव जीवन को राजनीतिक लाभ से नीचे रख रही है। जानें इसके पीछे के तथ्य और इसके संभावित प्रभाव।

मुख्य बातें

आईएफआरपी पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना बढ़ी है।
20 लाख से अधिक अफगान शरणार्थियों को पाकिस्तान से वापस भेजा गया।
इस नीति के अंतर्गत मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।
महिलाएं और बच्चे इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।
संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान से कार्रवाई की अपील की है।

लंदन, 18 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। पाकिस्तान की ‘अवैध विदेशी पुनर्वास योजना’ (आईएफआरपी) पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचनाएँ बढ़ती जा रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, यह नीति व्यापक स्तर पर जबरन निर्वासन का एक उदाहरण बन गई है, जहाँ राजनीतिक लाभ को मानव जीवन से ऊपर रखा गया है।

यूके आधारित समाचार पत्र एशियन लाइट की रिपोर्ट के अनुसार, अक्टूबर 2023 में आरंभ हुई इस योजना के अंतर्गत 2026 की शुरुआत तक 20 लाख से अधिक अफगान शरणार्थियों को पाकिस्तान से वापस भेजा गया है। इनमें से अनेक के पास वैध दस्तावेज भी थे।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि इस अभियान के दौरान मनमानी गिरफ्तारियों, वसूली और लोगों को दबाव डालकर देश छोड़ने के लिए मजबूर करने जैसे अनेक गंभीर आरोप सामने आए हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र ने इस नीति को अपारदर्शी और भेदभावपूर्ण बताते हुए इसकी कड़ी निंदा की है।

रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी 2026 तक किए गए एक साल के आकलन में यह पाया गया कि 10 लाख से अधिक अफगान वापस भेजे गए, जबकि उनके पास बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी थी।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी आईएफआरपी की निंदा करते हुए इसे “अवैध और अमानवीय” करार दिया है। मार्च 2025 में, संगठन ने इस योजना को वापस लेने की मांग की थी और कहा था कि यह नीति अफगानों को “अपराधी और आतंकवादी” के रूप में पेश करती है, जबकि वे असली शरणार्थी हैं जो कि तालिबान के शासन के तहत गंभीर खतरों का सामना कर रहे हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह नीति ‘नॉन-रिफाउलमेंट’ के सिद्धांत का उल्लंघन करती है, जिसके तहत किसी भी शरणार्थी को ऐसे स्थान पर वापस नहीं भेजा जा सकता है जहाँ उसे उत्पीड़न, हिंसा या यातना का खतरा हो। यह 1951 शरणार्थी कन्वेंशन और अंतरराष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों के समझौते का भी उल्लंघन है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पाकिस्तान में कई अफगान शरणार्थियों ने पुलिस द्वारा वसूली, मारपीट और रात के समय छापेमारी के दौरान मनमानी गिरफ्तारियों के आरोप लगाए हैं। कई परिवारों को हिरासत से बचने के लिए रिश्वत तक देनी पड़ी।

अप्रैल 2025 से शुरू हुए दूसरे चरण में 2,30,500 अफगान लौटे, जिनमें से 42,800 लोगों को निर्वासित किया गया। इनमें से 70 प्रतिशत बिना दस्तावेज वाले, 19 प्रतिशत अफगान नागरिक कार्ड धारक और 11 प्रतिशत प्रूफ ऑफ रजिस्ट्रेशन कार्ड धारक थे।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस संकट का सबसे ज्यादा असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ा है, जिन्हें परिवार से अलग होना पड़ा, लौटने पर रहने की जगह नहीं मिली और तालिबान के प्रतिशोध का भी खतरा बना हुआ है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस मुद्दे पर चिंता तो जताई है, लेकिन ठोस कार्रवाई सीमित रही है। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (यूएनएचसीआर) ने सीमा पर निगरानी और राहत कार्य बढ़ाने की बात की है तथा पाकिस्तान से जबरन निर्वासन रोकने और 14 लाख शरणार्थियों के पंजीकरण को नवीनीकृत करने की अपील की है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसमें मानवाधिकारों का उल्लंघन और जबरन निर्वासन के आरोप शामिल हैं। यह स्थिति न केवल अफगान शरणार्थियों के लिए, बल्कि पाकिस्तान के लिए भी चिंता का विषय है।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस नीति के क्या परिणाम हो सकते हैं?
इस नीति के परिणामस्वरूप कई अफगान शरणार्थियों को मानवाधिकारों का उल्लंघन झेलना पड़ सकता है, और यह उनके लिए खतरा पैदा कर सकती है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय का इस पर क्या रुख है?
अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस नीति की कड़ी आलोचना कर रहा है और इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन मानता है।
क्या इस नीति से महिलाओं और बच्चों पर असर पड़ा है?
हाँ, इस नीति का सबसे ज्यादा नकारात्मक असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ा है, जिन्हें परिवार से अलग होना पड़ा।
संयुक्त राष्ट्र का इस पर क्या कहना है?
संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान से जबरन निर्वासन रोकने और शरणार्थियों के पंजीकरण को नवीनीकृत करने की अपील की है।
राष्ट्र प्रेस
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