पाकिस्तान में जबरदस्ती धर्म परिवर्तन के खिलाफ कराची में विरोध, 11-सूत्रीय मांगें पेश
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक दिवस (11 अगस्त) के अवसर पर कराची स्थित मजार-ए-कायद के बाहर 'माइनॉरिटी राइट्स मार्च' और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने बड़ा विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने देशभर में धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध बढ़ते भेदभाव, उत्पीड़न और जबरदस्ती धर्म परिवर्तन की कड़ी निंदा की तथा सरकार से ठोस कानूनी कदम उठाने की माँग की। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह प्रदर्शन ऐसे समय में हुआ जब पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों पर हिंसा की घटनाएँ लगातार जारी हैं।
प्रमुख प्रतिभागी और मांगें
इस प्रदर्शन में पाकिस्तान के著名 अधिकार कार्यकर्ता और समुदाय के नेता शामिल हुए, जिनमें शीमा किरमानी, पादरी गजाला शफीक, विनेश आर्य, सज्जल शफीक, नाथन डेनियल और अनवर शेख प्रमुख थे। प्रदर्शनकारियों ने सरकार से जबरदस्ती धर्म परिवर्तन को अपराध घोषित करने और अंतर-धार्मिक विवाहों से जुड़े व्यक्तिगत कानूनों (पर्सनल लॉ) में संशोधन की माँग की, ताकि अल्पसंख्यक जीवनसाथियों और उनके बच्चों के अधिकार सुनिश्चित हो सकें।
पाकिस्तानी अखबार 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने अपनी 11-सूत्रीय मांगें पेश कीं, जिनमें ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग से सुरक्षा और जबरदस्ती धर्म परिवर्तन के विरुद्ध मजबूत कानूनी उपाय शामिल थे।
रोज़गार और सामाजिक समानता की माँग
प्रदर्शनकारियों ने सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों में सभी स्तरों पर अल्पसंख्यकों के लिए 10 प्रतिशत कोटा लागू करने की माँग की। साथ ही, अल्पसंख्यकों को केवल सफाई और कम वेतन वाले कार्यों तक सीमित रखने की प्रथा समाप्त करने और उनके पूजा स्थलों एवं संपत्तियों की सुरक्षा व बहाली सुनिश्चित करने की भी अपील की गई।
इसके अतिरिक्त, प्रदर्शनकारियों ने स्कूली पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकों से भेदभावपूर्ण और नफरत फैलाने वाली सामग्री हटाने की माँग रखी और शिक्षा में सहिष्णुता, शांति तथा धार्मिक विविधता पर अधिक बल देने का आग्रह किया।
संवैधानिक और कानूनी सुधारों की अपील
प्रदर्शनकारियों ने सर्वोच्च न्यायालय के 2014 के फैसले को लागू करने की माँग की, जिसके लिए रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण और राष्ट्रीय व प्रांतीय स्तर पर अल्पसंख्यक अधिकार आयोग गठित करने की बात कही गई। उन्होंने यह भी माँग की कि संविधान और अन्य कानूनों में 'गैर-मुस्लिम' शब्द की जगह विशिष्ट धार्मिक पहचानों का उल्लेख किया जाए।
जिन्ना के वादे और मौजूदा हकीकत
पाकिस्तान प्रत्येक वर्ष 11 अगस्त को 'राष्ट्रीय अल्पसंख्यक दिवस' मनाता है। यह दिन 1947 में संविधान सभा में मोहम्मद अली जिन्ना के उस ऐतिहासिक भाषण की स्मृति में मनाया जाता है, जिसमें उन्होंने धर्म, जाति या पंथ के आधार पर भेदभाव न करने का संकल्प व्यक्त किया था।
पाकिस्तानी अखबार 'डॉन' की एक रिपोर्ट के अनुसार, 'जिन्ना के समान नागरिकता के सिद्धांत और मौजूदा हकीकत के बीच के अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।' रिपोर्ट में कहा गया कि धार्मिक अल्पसंख्यकों को आज भी मॉब लिंचिंग, पूजा स्थलों पर हमलों, जबरन धर्म परिवर्तन और सामाजिक व आर्थिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि 'धर्म की सुरक्षा के लिए बने कानूनों का इस्तेमाल कभी-कभी झूठे आरोपों के ज़रिए हथियार के तौर पर किया जाता है।' आलोचकों का कहना है कि सरकारी समानता की गारंटी और ज़मीनी सच्चाई के बीच की खाई लगातार बनी हुई है।
आगे क्या होगा
यह प्रदर्शन पाकिस्तान में अल्पसंख्यक अधिकारों की माँग को लेकर बढ़ती नागरिक सक्रियता का संकेत है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक ठोस कानूनी सुधार नहीं होते और 2014 के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को लागू नहीं किया जाता, तब तक 'राष्ट्रीय अल्पसंख्यक दिवस' का आयोजन महज औपचारिकता बनकर रह जाएगा।