पीएम मोदी का इजरायल दौरा: भारत-इजरायल रिश्तों का नया अध्याय
सारांश
Key Takeaways
- पीएम मोदी का इजरायल दौरा नौ साल बाद हो रहा है।
- यह यात्रा भारत-इजरायल संबंधों में महत्वपूर्ण मोड़ है।
- द्विपक्षीय व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
- भारत का रणनीतिक संतुलन फिलिस्तीन के समर्थन के साथ है।
- आर्थिक और तकनीकी सहयोग में वृद्धि का अनुमान है।
नई दिल्ली, २५ फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा, जो नौ वर्षों के बाद हो रही है, कई मायनों में महत्वपूर्ण है। दोनों देश रणनीतिक साझेदारी की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। इस यात्रा को केवल एक द्विपक्षीय कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि यह भारत-इजरायल संबंधों की एक लंबी ऐतिहासिक यात्रा का हिस्सा माना जा सकता है, जो वैचारिक दूरी से रणनीतिक साझेदारी की ओर बढ़ी है।
जब इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू कहते हैं कि यह दौरा ऐतिहासिक होगा और राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग इसका स्वागत करने को उत्सुक हैं, तो नई दिल्ली और तेल अवीव रक्षा, तकनीक और व्यापार में सहयोग को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की बात कर रहे हैं। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि यह रिश्ता किन महत्वपूर्ण चरणों से गुजरा है।
1948 में इजरायल के गठन के बाद भारत ने संतुलित और सतर्क रुख अपनाया। स्वतंत्र भारत की विदेश नीति पर गुटनिरपेक्ष आंदोलन और अरब देशों के साथ ऊर्जा और प्रवासी भारतीयों से जुड़े हितों का गहरा प्रभाव था। 1949 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इजरायल की सदस्यता के सवाल पर समर्थन नहीं दिया। हालांकि, 1950 में भारत ने औपचारिक रूप से इजरायल को मान्यता दी, लेकिन पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित करने में चार दशक लग गए। 1992 में भारत ने इजरायल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए।
1990 के दशक के बाद से रक्षा सहयोग इस रिश्ते का मुख्य आधार बन गया। कारगिल संघर्ष के दौरान इजरायल से मिली त्वरित सैन्य सहायता ने दोनों देशों के बीच भरोसे को मजबूत किया। इसके बाद ड्रोन, मिसाइल सिस्टम, रडार और निगरानी तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा।
21वीं सदी के दूसरे दशक में यह संबंध और गहरा हो गया। 2017 में पीएम मोदी इजरायल का दौरा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने, जिसे प्रतीकात्मक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण माना गया। उस यात्रा ने यह दर्शाया कि भारत अब अपने पश्चिम एशिया नीति ढांचे में ‘डि हायफनेशन’ अपना रहा है।
आर्थिक संबंध भी इसी अवधि में मजबूत हुए। 1992 में लगभग 20 करोड़ डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार अब कई अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। कृषि, जल प्रबंधन और उच्च तकनीक के क्षेत्रों में इजरायल की विशेषज्ञता का उपयोग भारत के विभिन्न राज्यों में किया जा रहा है। माइक्रो-इरिगेशन और जल संरक्षण परियोजनाएं इसका उदाहरण हैं। स्टार्टअप और नवाचार के क्षेत्र में सहयोग भविष्य के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
पीएम मोदी की वर्तमान यात्रा उस समय हो रही है जब पश्चिम एशिया क्षेत्र अस्थिरता और पुनर्संरचना के दौर से गुजर रहा है। क्षेत्रीय तनाव, वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव और नई आर्थिक गलियारों की अवधारणा ने भारत के लिए इस क्षेत्र के महत्व को और बढ़ा दिया है। भारत एक ओर इजरायल के साथ रणनीतिक और तकनीकी साझेदारी को मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर फिलिस्तीन के समर्थन की पारंपरिक नीति को भी बनाए रखे हुए है। यह संतुलन भारत की विदेश नीति की विशेषता बनकर उभरा है।
ऐतिहासिक संदर्भों में यह स्पष्ट है कि भारत-इजरायल संबंध वैचारिक दूरी, व्यावहारिक सहयोग और अब व्यापक रणनीतिक भागीदारी के चरणों से गुजरे हैं। पीएम मोदी की यह यात्रा उसी विकसित होते संबंध का नया अध्याय है, और इजरायल भी इसे मानता है।