क्वेटा में सैन्य कार्रवाई: माशवानी जनजाति के 300 परिवार बेघर, भोजन-पानी का संकट गहराया
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के क्वेटा जिले में जारी सैन्य अभियान के कारण माशवानी जनजाति के करीब 300 परिवार अपने पुश्तैनी घर छोड़ने पर मजबूर हो गए हैं। 7 नवंबर 2026 को सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, विस्थापित परिवार बारिश और कड़ाके की ठंड में भोजन, आश्रय और साफ पीने के पानी जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह मानवीय संकट क्वेटा के दक्षिण-पश्चिम में स्थित पंजपाई क्षेत्र के किली मोहम्मद खैल गांव से शुरू हुआ।
मुख्य घटनाक्रम
स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बुधवार को किली मोहम्मद खैल इलाके में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और हथियारबंद लोगों के बीच झड़प हुई, जिसमें फ्रंटियर कॉर्प्स (FC) का एक जवान कथित तौर पर मारा गया। रिपोर्टों के मुताबिक, इस दौरान पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने भारी हथियारों का इस्तेमाल किया, जिससे कई घरों को नुकसान पहुंचा। एक निकटवर्ती अफगान शरणार्थी शिविर के पास भी गोलीबारी की आवाजें सुनी गईं, जिसके बाद पूरे इलाके को घेर लिया गया और वहाँ के निवासियों को क्षेत्र खाली करने के निर्देश दिए गए।
विस्थापित लोगों में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल हैं। परिवारों का कहना है कि उनके पास अपने बच्चों के साथ जाने के लिए कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं है और वे अनिश्चितता में जी रहे हैं कि अपने घर वापस लौटने का अवसर मिलेगा भी या नहीं।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
पख्तूनख्वा नेशनल अवामी पार्टी ने इस विस्थापन की कड़ी निंदा की है। पार्टी ने अपने बयान में कहा, 'सुरक्षा के नाम पर लोगों को उनके घरों और पुश्तैनी इलाकों से बेदखल करना खुला अन्याय और दमन है।' पार्टी ने सरकार से मांग की है कि विस्थापित परिवारों को भोजन, आश्रय और स्वास्थ्य सेवाएं तत्काल उपलब्ध कराई जाएं और उनकी सुरक्षित तथा सम्मानजनक वापसी सुनिश्चित की जाए।
पार्टी का यह भी कहना है कि आतंकवाद और उग्रवाद से निपटना राज्य की जिम्मेदारी है, लेकिन इस प्रक्रिया में निर्दोष नागरिकों को सामूहिक सजा नहीं दी जानी चाहिए।
व्यापक संकट: बलूचिस्तान में बढ़ता विस्थापन
गौरतलब है कि क्वेटा की यह घटना बलूचिस्तान में बड़े पैमाने पर हो रहे विस्थापन की एक कड़ी भर है। ग्वादर जिले के शादी कौर इलाके के किसानों ने भी ऐसी ही शिकायतें उठाई हैं — उनका आरोप है कि सुरक्षा कारणों का हवाला देकर लगाए गए प्रतिबंधों के चलते वे अपने घरों और खेती की जमीन तक नहीं पहुँच पा रहे। जमीन मालिकों, किसानों और बटाईदारों को अपने बागों और तैयार फसलों से वंचित किया जा रहा है, जिससे करोड़ों रुपये मूल्य की कृषि संपत्ति खतरे में है।
मानवाधिकार संगठनों की चेतावनी
पिछले महीने मानवाधिकार संगठन बलूच यकजेहती कमेटी (BYC) ने भी पाकिस्तानी अधिकारियों पर आरोप लगाया था कि पूरे बलूचिस्तान में हजारों परिवारों को जबरन विस्थापित किया जा रहा है और उनसे उनके पुश्तैनी घर, आजीविका और जमीन पर रहने का अधिकार छीना जा रहा है। बीवाईसी ने कहा कि जेहरी, सरावान, कलंद, जिवानी, नोशकी, चागई, खरान, मंड, दाश्त, मस्तुंग सहित दर्जनों क्षेत्रों में लोगों को पैतृक घर छोड़ने पड़े हैं और कई और इलाकों को खाली करने के नोटिस दिए जा चुके हैं।
संगठन ने चेतावनी दी कि 'यह सूची लगातार लंबी होती जा रही है और किसी को नहीं पता कि अगला नंबर किस बस्ती का होगा।' यह ऐसे समय में सामने आया है जब बलूचिस्तान में सुरक्षा अभियानों और नागरिक विस्थापन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ रही है।
आगे क्या होगा
फिलहाल पाकिस्तान सरकार की ओर से विस्थापित परिवारों की राहत या पुनर्वास के संदर्भ में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। मानवाधिकार संगठन और स्थानीय राजनीतिक दल तत्काल हस्तक्षेप की माँग कर रहे हैं, जबकि सर्दियों के करीब आने के साथ विस्थापित परिवारों की स्थिति और विकट होने की आशंका है।