रुबियो का बड़ा बयान: ईरान-इजरायल संघर्ष में चीन ने नहीं दी कोई सैन्य मदद, होर्मुज पर मांगा समर्थन
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने 3 जून को हाउस एप्रोप्रियेशन्स सबकमेटी की सुनवाई में स्पष्ट किया कि हाल के क्षेत्रीय संकट के दौरान चीन द्वारा ईरान को किसी भी प्रकार की सैन्य सहायता दिए जाने का कोई सबूत अमेरिका के पास नहीं है। उन्होंने बीजिंग से होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन की स्वतंत्रता बहाल करने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों का समर्थन करने की अपील भी की।
रुबियो का दो-टूक बयान
सांसदों को संबोधित करते हुए रुबियो ने कहा, ‘मैं कहूंगा कि चीन ने ईरान को किसी भी तरह की सहायता नहीं दी है और न ही उसने हमारे अभियानों या हमारी काम करने की क्षमता में कोई बाधा डाली है।’ विदेश मंत्री ने स्वीकार किया कि ईरान के पास चीन में निर्मित कुछ सैन्य उपकरण मौजूद हैं और दोनों देशों के बीच लंबे समय से रणनीतिक संबंध हैं, लेकिन हालिया संघर्ष के दौरान बीजिंग की ओर से ऐसी कोई गतिविधि नहीं देखी गई जिसने युद्ध के मैदान का संतुलन बदला हो।
चीन के ‘सावधानीपूर्ण’ रवैये पर वॉशिंगटन का आकलन
रुबियो ने चीन के रुख को ‘सावधानीपूर्ण’ करार दिया। उनके अनुसार, तेहरान के साथ व्यापक रणनीतिक रिश्तों के बावजूद बीजिंग ने इस संकट में सीधे तौर पर शामिल होने से दूरी बनाए रखी है। गौरतलब है कि यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर है और वैश्विक शक्तियों की भूमिका को लेकर अटकलें तेज़ हैं।
होर्मुज पर UN प्रस्ताव और बीजिंग से अपील
रुबियो ने बताया कि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव का समर्थन कर रहा है, जिसका उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुए संकट का समाधान निकालना है। दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। उन्होंने कहा, ‘अगर वास्तव में वे जलडमरूमध्य को बंद किए जाने के खिलाफ हैं, तो उन्हें इस प्रस्ताव का समर्थन करना चाहिए या कम से कम इससे दूरी बनाते हुए वीटो का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।’
चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा असर
विदेश मंत्री ने तर्क दिया कि स्थिरता बहाल करने के प्रयासों का समर्थन करने के मजबूत आर्थिक कारण चीन के पास हैं, क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर अत्यधिक निर्भर है। उन्होंने कहा कि समय बीतने के साथ ईरान की इन गतिविधियों का नकारात्मक असर चीनी अर्थव्यवस्था पर पड़ना शुरू हो जाएगा। रुबियो ने यह भी खुलासा किया कि हाल ही में चीन जा रहे एक जहाज को इस संकट के दौरान निशाना बनाया गया था, जो क्षेत्रीय समुद्री मार्गों की अस्थिरता को रेखांकित करता है।
भारत के लिए क्यों मायने रखता है
यह घटनाक्रम भारत के लिए भी रणनीतिक महत्व रखता है, क्योंकि भारत और चीन — दोनों ही खाड़ी क्षेत्र से आने वाले ऊर्जा संसाधनों के सबसे बड़े आयातकों में शामिल हैं। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है, तो इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों, शिपिंग लागत और पूरे एशिया की सप्लाई चेन पर पड़ सकता है। आने वाले दिनों में UN सुरक्षा परिषद में चीन का रुख इस संकट की दिशा तय करने में निर्णायक साबित हो सकता है।