सावरकर लोकतंत्र को मानते थे सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली: 30,000 दस्तावेजों की रिसर्च में उभरी अलग तस्वीर
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय-अमेरिकी विद्वान श्रीधर डी. दामले ने भारत, ब्रिटेन और अमेरिका के अभिलेखागारों में एक दशक से अधिक की गहन शोध के बाद विनायक दामोदर सावरकर की एक ऐसी तस्वीर प्रस्तुत की है, जो उनकी प्रचलित राजनीतिक छवि से काफी भिन्न है। दामले का कहना है कि 30,000 से अधिक पृष्ठों के ऐतिहासिक दस्तावेज़ दर्शाते हैं कि समकालीन सरकारें, राजनयिक और पुलिस सावरकर को किस दृष्टि से देखते थे। यह शोध उन्हें एक ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में सामने लाती है, जिनके विचारों में लोकतंत्र, वैज्ञानिक सोच और समाज सुधार केंद्रीय भूमिका में थे।
दस्तावेज़ों का खज़ाना और रिसर्च की पृष्ठभूमि
84 वर्षीय दामले ने 2010 में इस विषय पर शोध आरंभ किया था। उन्होंने हजारों पृष्ठों का अध्ययन किया, जिनमें ब्रिटिश खुफिया विभाग के रिकॉर्ड, अमेरिकी राजनयिक दस्तावेज़, प्रतिबंधित साहित्य, न्यायालयीन अभिलेख और भारतीय पुलिस की फाइलें सम्मिलित हैं। दामले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर दीर्घकालिक शोधकार्य के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं और अब सावरकर पर एक विस्तृत जीवनी लिख रहे हैं।
दामले के अनुसार, उनकी रिसर्च का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ 1906 का है, जो सावरकर के लंदन प्रवास के काल का है। इसकी एक प्रति ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा ज़ब्त किए गए कागज़ातों में बची रह गई थी, जो बाद में दामले को शिकागो विश्वविद्यालय में माइक्रोफिल्म पर प्राप्त हुई।
1906 के दस्तावेज़ में लोकतांत्रिक भारत की परिकल्पना
दामले के अनुसार, इस दस्तावेज़ में एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत की स्पष्ट कल्पना की गई थी — जहाँ कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हों, सरकारी पदों पर नियुक्ति योग्यता के आधार पर हो और प्रत्येक व्यक्ति को एक मत का अधिकार हो। यह भी उल्लेखित था कि भविष्य के भारत में राष्ट्रपति या राजा का निर्णय संविधान सभा पर छोड़ा जाना चाहिए।
दामले ने दस्तावेज़ के हवाले से बताया, 'भारत आज़ाद होगा, वहाँ लोकतंत्र होगा, एक व्यक्ति का एक वोट होगा, कानून के सामने सभी बराबर होंगे और नौकरी योग्यता के आधार पर मिलेगी।' उनके अनुसार, यह दस्तावेज़ सावरकर को समझने की कुंजी है क्योंकि सार्वजनिक विमर्श में उन्हें प्रायः केवल हिंदुत्व, विभाजन और महात्मा गांधी की हत्या से जुड़ी बहसों के संदर्भ में देखा जाता है।
याचिकाएँ, मुकदमा और गांधी हत्याकांड
दामले ने अंडमान की सेल्युलर जेल से ब्रिटिश अधिकारियों को लिखी गई सावरकर की याचिकाओं की प्रचलित व्याख्या पर भी प्रश्न उठाए। उनका तर्क है कि इन याचिकाओं को तत्कालीन जेल-व्यवस्था और ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू की गई कानूनी श्रेणी के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। दामले के अनुसार, सावरकर ने एक कैदी के रूप में अपने विधिक अधिकारों की माँग की थी और इससे संबंधित सभी छह दस्तावेज़ उपलब्ध हैं। ब्रिटिश अधिकारियों ने उनकी माँगें अस्वीकार कर दी थीं।
महात्मा गांधी की हत्या के मामले में दामले की रिसर्च का एक बड़ा हिस्सा संलग्न है। ट्रायल कोर्ट ने सावरकर को इस मामले में दोषमुक्त कर दिया था। दामले बताते हैं कि वॉशिंगटन में उन्हें एक अमेरिकी राजनयिक रिकॉर्ड मिला, जिसमें दर्ज है कि मुकदमे के प्रारंभिक चरण में सरकार के मुख्य वकील ने अमेरिकी राजदूत से कहा था कि सावरकर के विरुद्ध पर्याप्त आधार न होने के कारण उनके शीघ्र रिहा होने की संभावना है। उनके शब्दों में: 'दफ्तरी ने अमेरिकी राजदूत से कहा था कि सावरकर बहुत जल्द रिहा हो जाएंगे, क्योंकि उनके खिलाफ कोई पर्याप्त आधार नहीं है।' दामले का कहना है कि आर्काइव के दस्तावेज़ गांधी हत्या में सावरकर की व्यक्तिगत भूमिका निर्धारित करने के प्रयासों पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं।
अज्ञेयवाद, विज्ञान और समाज सुधार
दामले की रिसर्च सावरकर के एक ऐसे पक्ष को भी उजागर करती है, जिस पर सामान्यतः कम चर्चा होती है। उनके अनुसार, सावरकर अज्ञेयवादी और तर्कवादी थे। वे धार्मिक ग्रंथों को अपरिवर्तनीय नहीं, बल्कि मानव-रचित मानते थे। दामले ने कहा, 'उनका मानना था कि सभी धर्म इंसानों ने बनाए हैं और सभी धार्मिक ग्रंथ भी इंसानों द्वारा ही लिखे गए हैं।'
सामाजिक सुधार के क्षेत्र में दामले ने सावरकर के छुआछूत-विरोधी अभियान, अंतरजातीय विवाह के समर्थन और मराठी भाषा में आधुनिक शब्दों के निर्माण का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, सावरकर का मानना था कि अल्पसंख्यकों को समान नागरिकता, धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकार मिलने चाहिए, साथ ही वे एक संयुक्त भारतीय राष्ट्र का अंग रहें।
लोकतंत्र पर व्यक्तिगत अनुभव और आगे की राह
दामले ने अपनी एक व्यक्तिगत स्मृति साझा की। 14 जनवरी 1960 को, तब छात्र रहते हुए, वे सावरकर से मिले थे। उन्होंने सावरकर से पूछा था कि उन्होंने केरल की चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त किए जाने की आलोचना क्यों की थी। दामले के अनुसार, सावरकर का उत्तर था: 'सरकार चलाने की सभी व्यवस्थाओं में लोकतंत्र सबसे बेहतर तरीका है' — और यदि लोकतंत्र स्वीकार किया गया है, तो सरकार बदलने का माध्यम चुनाव होना चाहिए, न कि कोई अन्य तरीका। सावरकर का यह भी मत था कि स्वतंत्र भारत में गुप्त राजनीतिक संगठनों और राजनीतिक हिंसा का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
रिसर्च पूरी होने के बाद दामले अपने संकलित दस्तावेज़ ऑनलाइन उपलब्ध कराना चाहते हैं, ताकि छात्र, पत्रकार और आम पाठक भी उन्हें देख सकें। मुंबई CID से जुड़ी सामग्री, जिसमें 1950 की गिरफ्तारी से संबंधित चार पृष्ठों का दस्तावेज़ शामिल है, अभी भी प्रतीक्षित है। दामले के शब्दों में: 'समस्या अभी भी ब्यूरोक्रेसी की है।' उनकी आने वाली किताब में राष्ट्रीय सुरक्षा, चीन को लेकर सावरकर की चेतावनियाँ और तिब्बत परिवर्तन के निहितार्थों पर भी प्रकाश डाला जाएगा।