अमेरिका-ईरान शांति समझौते में लेबनान का जिक्र, फिर भी IDF बोली — 'दक्षिणी लेबनान नहीं छोड़ेंगे'
सारांश
मुख्य बातें
इज़रायल डिफेंस फोर्सेस (IDF) ने 18 जून 2026 को स्पष्ट किया कि वह दक्षिणी लेबनान से अपनी सैन्य तैनाती नहीं हटाएगी — यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका-ईरान शांति समझौते में सभी मोर्चों पर युद्धविराम का उल्लेख किया गया है, जिसमें लेबनान भी शामिल है। IDF ने दक्षिणी लेबनान में अपनी तैनाती का अद्यतन नक्शा जारी कर यह संकेत दिया कि ज़मीनी स्थिति राजनयिक दस्तावेज़ों से भिन्न बनी हुई है।
समझौते में क्या लिखा है
पैलेस ऑफ वर्साय में हस्ताक्षरित एमओयू के पहले बिंदु में स्पष्ट उल्लेख है कि दोनों देश और उनके सहयोगी तत्काल प्रभाव से युद्ध रोकेंगे और आगे एक-दूसरे के खिलाफ सैन्य कार्रवाई नहीं करेंगे। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ को सोशल प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट किया, जिसमें स्पष्ट लिखा था कि लेबनान समेत सभी मोर्चों पर लड़ाई खत्म होगी। समझौते पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भी दस्तखत हैं।
IDF का रुख और नया नक्शा
IDF ने जो अद्यतन नक्शा जारी किया है, उसमें दक्षिणी लेबनान में बनाए गए सुरक्षा क्षेत्र को दर्शाया गया है। सेना के अनुसार, यह तैनाती इज़रायली सीमा से लेबनान के अंदर करीब 10 किलोमीटर तक पूर्व से पश्चिम तक फैली हुई है। गौरतलब है कि अप्रैल में घोषित 'फॉरवर्ड डिफेंस लाइन' की तुलना में IDF अब लेबनान के अंदर और आगे बढ़ चुकी है — इसमें नबातिह के आसपास का इलाका भी शामिल है।
IDF की दलील
सेना ने कहा कि उसके जवान तय किए गए इलाकों में मौजूद रहेंगे और इज़रायल के उत्तरी हिस्से की सीमावर्ती बस्तियों को संभावित खतरों से बचाने का काम जारी रखेंगे। IDF ने यह भी कहा कि वह "ऑपरेशनल जरूरतों" के तहत इस क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखेगी।
लेबनानी सेना को चेतावनी
IDF ने लेबनानी सेना से अपील की है कि वह इस सुरक्षा क्षेत्र के पास अपनी गतिविधियों का समन्वय करे और बिना समन्वय के इस इलाके में प्रवेश न करे, क्योंकि वहाँ सैन्य अभियान अभी जारी हैं। यह चेतावनी इस बात का संकेत है कि ज़मीन पर तनाव अभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है।
आगे क्या
अमेरिका-ईरान समझौते और IDF के रुख के बीच यह अंतर आने वाले दिनों में कूटनीतिक दबाव का केंद्र बन सकता है। विश्लेषकों के अनुसार, इज़रायल का यह कदम दर्शाता है कि वह किसी भी बाहरी समझौते को अपनी सुरक्षा नीति पर प्राथमिकता देने को तैयार नहीं है।