दक्षिण कोरिया-अमेरिका परमाणु वार्ता: यूरेनियम संवर्धन और परमाणु पनडुब्बी पर सोल में अहम चर्चा
सारांश
मुख्य बातें
दक्षिण कोरिया और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच सुरक्षा और परमाणु ऊर्जा सहयोग को लेकर उच्च स्तरीय वार्ता बुधवार, 3 जून को सोल में दूसरे और अंतिम दिन भी जारी रही। इन वार्ताओं के केंद्र में शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए यूरेनियम संवर्धन और परमाणु ईंधन पुनर्प्रसंस्करण की दक्षिण कोरियाई माँग है, साथ ही पारंपरिक हथियारों से लैस परमाणु-चालित पनडुब्बियों के विकास का प्रस्ताव भी है।
वार्ता की पृष्ठभूमि
यह बातचीत पिछले वर्ष अक्टूबर में दोनों देशों के नेताओं के बीच हुए शिखर सम्मेलन में तय समझौते को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से हो रही है। उस समझौते के तहत अमेरिका ने दक्षिण कोरिया के नागरिक परमाणु उपयोग के लिए यूरेनियम संवर्धन और पुनर्प्रसंस्करण प्रक्रियाओं को समर्थन देने पर सहमति जताई थी। सोल की पारंपरिक हथियारों से लैस परमाणु-चालित पनडुब्बियों के विकास की योजना भी इसी सहयोग का हिस्सा है।
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल
रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व राजनीतिक मामलों की उप विदेश मंत्री एलिसन हूकर कर रही हैं। उनके साथ राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के वरिष्ठ निदेशक एवन कनापथी और अमेरिकी राष्ट्रीय परमाणु सुरक्षा प्रशासन के उप प्रशासक मैथ्यू नापोली सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हैं।
123 एग्रीमेंट में संशोधन की संभावना
वार्ता में विशेष रूप से 2015 के मौजूदा द्विपक्षीय परमाणु ऊर्जा सहयोग समझौते (123 एग्रीमेंट) में संशोधन की संभावना पर विचार हो रहा है। वर्तमान व्यवस्था के तहत दक्षिण कोरिया को यूरेनियम संवर्धन और परमाणु ईंधन पुनर्प्रसंस्करण की अनुमति केवल अमेरिकी सहमति के बाद ही मिलती है। सोल अब ‘पूर्व-अनुमति’ की व्यवस्था की माँग कर रहा है, जिससे दीर्घकालिक और पूर्व-स्वीकृत सहयोग संभव हो सके।
एलिसन हूकर का बयान
मंगलवार की बैठक में दोनों देशों ने परमाणु-संचालित पनडुब्बी कार्यक्रम पर भी चर्चा की। हूकर ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, ‘दक्षिण कोरिया के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार वाई सुंग-लाक के साथ मुलाक़ात में द्विपक्षीय परमाणु सहयोग को आगे बढ़ाने पर चर्चा की।’ उन्होंने यह भी कहा कि आर्थिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं।
बाधाएँ और आगे की राह
यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब दोनों देशों के बीच 350 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश से जुड़ी विधायी प्रक्रिया में देरी हुई है, जिससे सुरक्षा समझौतों की प्रगति धीमी पड़ी है। इसके अलावा, दक्षिण कोरिया में अमेरिकी ई-कॉमर्स कंपनी कूपांग के साथ कथित भेदभाव को लेकर अमेरिकी पक्ष की चिंताओं को भी वार्ता में बाधा माना जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यह वार्ता एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा संतुलन और परमाणु ऊर्जा सहयोग के भविष्य के लिए निर्णायक साबित हो सकती है।