राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने कोरियाई प्रायद्वीप में स्थायी शांति का संकल्प दोहराया, ट्रंप-प्योंगयांग वार्ता में सोल की भूमिका पर जोर
सारांश
मुख्य बातें
दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने बुधवार, 2 सितंबर को इंचियोन में आयोजित 'पीसफुल यूनिफिकेशन एडवाइजरी काउंसिल' की अमेरिकी इकाई की बैठक में कोरियाई प्रायद्वीप में स्थायी शांति व्यवस्था स्थापित करने की अपनी प्रतिबद्धता एक बार फिर दोहराई। उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच संवाद पुनः आरंभ कराने में सोल को सक्रिय भूमिका निभानी होगी। यह बैठक ऐसे समय हुई जब अमेरिका का उत्तर कोरिया के प्रति रवैया अपेक्षाकृत नरम होता दिख रहा है।
मुख्य घटनाक्रम
राष्ट्रपति ली ने इंचियोन में एकीकरण पर राष्ट्रपति की सलाहकार संस्था की बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि दोनों कोरियाई देश अनावश्यक टकराव में अपनी ऊर्जा बर्बाद कर रहे हैं, जिसे उन्होंने एक "दुर्भाग्यपूर्ण" और "दुखद" वास्तविकता बताया। उन्होंने जोर देकर कहा कि 1950-1953 के कोरियाई युद्ध के बाद से चले आ रहे युद्धविराम समझौते को एक ठोस शांति संधि से बदला जाना चाहिए।
ली ने कहा, 'घरेलू राजनीति में बदलाव या अंतरराष्ट्रीय स्थिति में परिवर्तन के कारण तनाव को फिर से बढ़ने से रोकने के लिए, हमें संघर्ष और टकराव पर आधारित युद्धविराम समझौते को सहयोग और समृद्धि पर आधारित शांति व्यवस्था से बदलना चाहिए।'
लिबरेशन डे भाषण से जुड़ा संदर्भ
गौरतलब है कि 15 अगस्त को 'लिबरेशन डे' के भाषण में राष्ट्रपति ली ने प्रस्ताव दिया था कि दोनों कोरियाई देश अपने दशकों पुराने युद्ध को समाप्त करने और प्योंगयांग के परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित करने के व्यावहारिक तरीकों पर बातचीत आरंभ करें। उसी भाषण में उन्होंने अपनी तीन-सूत्रीय कार्य-योजना प्रस्तुत की थी — समावेशी, स्थिर और जिम्मेदार दृष्टिकोण — जिसे उन्होंने बुधवार की बैठक में भी दोहराया।
ली ने कहा, 'समावेशी शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए, दक्षिण और उत्तर कोरिया को एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए। शांति तब शुरू होती है जब वे अपने मतभेदों का सम्मान करते हैं, न कि तब जब सभी एक जैसा सोचते हैं।'
ट्रंप-उत्तर कोरिया वार्ता और सोल की भूमिका
राष्ट्रपति ली ने इस बात पर विशेष बल दिया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्योंगयांग के बीच फिर से शुरू हुई बातचीत का लाभ उठाकर सोल को अंतर-कोरियाई संबंधों में लंबे समय से चली आ रही दरार को पाटने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा, 'चूंकि राष्ट्रपति ट्रंप के दृढ़ संकल्प से कोरियाई प्रायद्वीप की स्थिति में बदलाव की संभावना बनी है — चाहे वह कितनी भी छोटी क्यों न हो — इसलिए हमें अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच विश्वास बनाने और बातचीत फिर से शुरू करने पर रचनात्मक चर्चा के लिए माहौल तैयार करना चाहिए।'
क्षेत्रीय और वैश्विक महत्व
राष्ट्रपति ली ने इस पहल को केवल दो कोरियाई देशों का आंतरिक मामला नहीं बताया। उनके अनुसार, 'कोरियाई प्रायद्वीप में शांति सुनिश्चित करना केवल हमारे लिए ही मुद्दा नहीं है। यह पूर्वोत्तर एशिया की सुरक्षा और दुनिया में शांति सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण कार्य है।' यह ऐसे समय में आया है जब पूर्वोत्तर एशिया में भू-राजनीतिक तनाव कई मोर्चों पर एक साथ बढ़ रहा है।
आलोचकों का कहना है कि जब तक उत्तर कोरिया अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर ठोस रियायत नहीं देता, तब तक किसी भी शांति ढाँचे की व्यावहारिक सफलता संदिग्ध रहेगी। फिर भी, ली की यह पहल दक्षिण कोरिया की नई सरकार की उस रणनीतिक प्राथमिकता को दर्शाती है जिसमें कूटनीति को टकराव पर तरजीह दी जा रही है।